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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 25. खेड़ा की लड़ाई का अंत पीछे     आगे

इस लड़ाई का अंत विचित्र रीति से हुआ। यह तो साफ था कि लोग थक चुके थे। जो दृढ़ रहे थे, उन्हें पूरी तरह बरबाद होने देने में संकोच हो रहा था। मेरा झुकाव इस ओर था कि सत्याग्रह के अनुरूप इसकी समाप्ति का कोई शोभापद मार्ग निकल आए, तो उसे अपनाना ठीक होगा। ऐसा एक अनसोचा उपाय सामने आ गया। नड़ियाद तालुके के तहसीलदार ने संदेशा भेजा कि अगर अच्छी स्थितिवाले पाटीदार लगान अदा कर दे, तो गरीबों का लगान मुल्तवी रहेगा। इस विषय में मैंने लिखित स्वीकृति माँगी और वह मिल गई। तहसीलदार अपनी तहसील का ही जिम्मेदारी ले सकता था। सारे जिले की जिम्मेदारी तो कलेक्टर ही ले सकता था। इसलिए मैंने कलेक्टर से पूछा। उसका जवाब मिला कि तहसीलदार ने जो कहा है, उसके अनुसार तो हुक्म निकल ही चुका है। मुझे इसका पता नहीं था। लेकिन यदि ऐसा हुक्म निकल चुका हो, तो माना जा सकता है कि लोगों की प्रतिज्ञा का पालन हुआ। प्रतिज्ञा में यही वस्तु थी, अतएव इस हुक्म से हमने संतोष माना।

फिर भी इस प्रकार की समाप्ति से हम प्रसन्न न हो सके। सत्याग्रह की लड़ाई के पीछे जो एक मिठास होती है, वह इसमें नहीं थी। कलेक्टर मानता था कि उसने कुछ किया ही नहीं। गरीब लोगों को छोड़ने की बात कहीं जाती थी, किंतु वे शायद ही छूट पाए। जनता यह करने का अधिकार आजमा न सकी कि गरीब में किसकी गिनती की जाए। मुझे इस बात का दु:ख था कि जनता में इस प्रकार की शक्ति रह नहीं गई थी। अतएव लड़ाई की समाप्ति का उत्सव तो मनाया गया, पर इस दृष्टि से मुझे वह निस्तेज लगा। सत्याग्रह का शुद्ध अंत तभी माना जाता है, जब जनता में आरंभ की अपेक्षा अंत में अधिक तेज और शक्ति पाई जाए। मैं इसका दर्शन न कर सका। इतने पर भी इस लड़ाई के जो अदृश्य परिणाम निकले, उसका लाभ तो आज भी देखा जा सकता है और उठाया जा रहा है। खेड़ा की लड़ाई से गुजरात के किसान-समाज की जागृति का और उसकी राजनीतिक शिक्षा का श्रीगणेश हुआ।

विदुषी डॉ. बेसेंट के 'होम रूल' के तेजस्वी आंदोलन ने उसका स्पर्श अवश्य किया था, लेकिन कहना होगा कि किसानों के जीवन में शिक्षित समाज का और स्वयंसेवकों का सच्चा प्रवेश तो इस लड़ाई से ही हुआ। सेवक पाटीदारों के जीवन में ओतप्रोत हो गए थे। स्वयंसेवकों को इस लड़ाई में अपनी क्षेत्र की मर्यादाओं का पता चला। इससे उनकी त्यागशक्ति बढ़ी। इस लड़ाई में वल्लभभाई ने अपने आपको पहचाना। यह एक ही कोई ऐसा-वैसा परिणाम नहीं है। इसे हम पिछले साल संकट निवारण के समय और इस साल बारडोली में देख चुके है। इससे गुजरात के लोक जीवन में नया तेज आया, नया उत्साह उत्पन्न हुआ। पाटीदारों को अपनी शक्ति को जो ज्ञान हुआ, उसे वे कभी न भूले। सब कोई समझ गए कि जनता की मुक्ति का आधार स्वयं जनता पर, उसकी त्यागशक्ति पर है। सत्याग्रह ने खेड़ा के द्वारा गुजरात में अपनी जड़े जमा ली। अतएव यद्यपि लड़ाई के अंत से मैं प्रसन्न न हो सका, तो भी खेड़ा की जनता में उत्साह था। क्योंकि उसने देख लिया थी कि उसकी शक्ति के अनुपात में उसे कुछ मिल गया है और भविष्य में राज्य की ओर से होनेवाले कष्टों के निवारण का मार्ग उसके हाथ लग गया है। उनके उत्साह के लिए इतना ज्ञान पर्याप्त था। किंतु खेड़ा की जनता सत्याग्रह का स्वरूप पूरी तरह समझ नहीं सकी थी। इस कारण उसे कैसे कड़वे अनुभव हुए, सो हम आगे देखेंगे।


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