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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 26. एकता की रट पीछे     आगे

जिन दिनों खेड़ा का आंदोलन चल रहा था, उन दिनों यूरोप का महायुद्ध भी जारी था। वाइसरॉय ने उसके सिलसिले में नेताओं को दिल्ली बुलाया था। मुझसे आग्रह किया गया था कि मैं भी उसमें हाजिर होऊँ। मैं बता चुका हूँ कि लॉर्ड चेम्सफर्ड के साथ मेरी मित्रता थी।

मैंने निमंत्रण स्वीकार किया और मैं दिल्ली गया। किंतु इस सभा में सम्मिलित होते समय मेरे मन में एक संकोच था। मुख्य कारण तो यह था कि इस सभा में अलीभाइयों को, लोकमान्य को और दूसरे नेताओं को निमंत्रित नहीं किया गया था। उस समय अलीभाई जेल में थे। उनसे मैं एक-दो बार ही मिला था। उनके बारे में सुना बहुत था। उनकी सेवावृति और बहादुरी की सराहना सब कोई करते थे। हकीम साहब के संपर्क में मैं नहीं आया था। स्व. आचार्य रुद्र और दीनबंधु एंड्रूज के मुँह से उनकी बहुत प्रशंसा सुनी थी। कलकत्ते में हुई मुस्लिम लीग की बैठक के समय श्वेब कुरेशी और बारिस्टर ख्वाजा से मेरी जान-पहचान हुई थी। डॉ. अंसारी, डॉ. अब्दुर रहमान के साथ भी जानपहचान हो चुकी थी। मैं सज्जन मुसलमानों की संगति के अवसर ढूँढ़ता रहता था और जो पवित्र तथा देशभक्त माने जाते थे, उनसे जान-पहचान करके उनकी भावना को जानने की तीव्र इच्छा मुझ में रहती थी। इसलिए वे अपने समाज में मुझे जहाँ कहीं ले जाते वहाँ बिना किसी आनाकानी के मैं चला जाता था।

इस बात को तो मैं दक्षिण अफ्रीका में ही समझ चुका था कि हिंदु-मुसलमानों के बीच सच्चा मित्रभाव नहीं है। मैं वहाँ ऐसे एक भी उपाय को हाथ से जाने न देता था, जिससे दोनों के बीच की अनबन दूर हो। झूठी खुशामद करके अथवा स्वाभिमान खोकर उनको अथवा किसी और को रिझाना मेरे स्वभाव में न था। लेकिन वही से मेरे दिल में यह बात जमी हई थी कि मेरी अहिंसा की कसौटी और उसका विशाल प्रयोग इस एकता के सिलसिले में ही होगा। आज भी मेरी यह राय कायम है। ईश्वर प्रतिक्षण मुझे कसौटी पर कस रहा है। मेरा प्रयोग चालू है।

इस प्रकार के विचार लेकर मैं बंबई बंदर पर उतरा था। इसलिए मुझे इन दोनों भाइयों से मिलकर प्रसन्नता हुई। हमारा स्नेह बढ़ता गया। हमारी जान-पहचान होने के बाद तुरंत ही अलीभाइयों को सरकार ने जीते-जी दफना दिया। मौलाना मुहम्मदअली को जब इजाजत मिलती, तब वे बैतूल या छिंदवाड़ा जेल से मुझे लंबे लंबे पत्र लिखा करते थे। मैंने उनसे मिलने की इजाजत सरकार से माँगी थी, पर वह मिल न सकी।

अलीभाइयों की नजरबंदी के बाद मुसलमान भाई मुझे कलकत्ते मुस्लिम लीग की बैठक में लिवा ले गए थे। वहाँ मुझ से बोलने को कहा गया। मैं बोला। मैंने मुसलमानों को समझाया कि अलीभाइयों को छुड़ाना उनका धर्म है।

इसके बाद वे मुझे अलीगढ कॉलेज में भी ले गए थे। वहाँ मैंने मुसलमानों को देश के लिए अख्तियार करने की दावत दी।

अलीभाइयों को छुड़ाने के लिए मैंने सरकार से पत्र-व्यवहार शुरू किया। उसके निमित्त से इन भाइयों की खिलाफत-संबंधी हलचल का अध्ययन किया। मुसलमानों के साथ चर्चाएँ की। मुझे लगा कि अगर मैं मुसलमानों का सच्चा मित्र बनना चाहता हूँ तो मुझे अलीभाइयों को छुड़ाने में और खिलाफत के प्रश्न को न्यायपूर्वक सुलझाने में पूरी मदद करनी चाहिए। खिलाफत का सवाल मेरे लिए सरल था। मुझे उसके स्वतंत्र गुण-दोष देखने की जरूरत नहीं थी। मुझे लगा कि अगर उसके संबंध में मुसलमानों की माँग नीति-विरुद्ध न हो, तो मुझे उनकी मदद करनी चाहिए। धर्म के प्रश्न में श्रद्धा सर्वोपरि होती है। यदि एक ही वस्तु के प्रति सब की एक सी श्रद्धा हो, तो संसार में एक ही धर्म रह जाए। मुझे मुसलमानों की खिलाफत संबंधी माँग नीति-विरुद्ध प्रतीत नहीं हुई, यही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज ने इस माँग को स्वीकार किया था, इसलिए मुझे तो उनसे वचन पालन करवाने का भी प्रयत्न करना था। वचन ऐसे स्पष्ट शब्दों में था कि मर्यादित माँग के गुण-दोष जाँचने का काम अपनी अंतरात्मा को प्रसन्न करने के लिए ही करना था।

चूँकि मैंने खिलाफत के मामले में मुसलमानों का साथ दिया था, इसलिए इस संबंध में मित्रों और आलोचकों ने मेरी काफी आलोचना की है। उन सब पर विचार करने के बाद जो राय मैंने बनाई और जो मदद दी या दिलाई, उसके बारे में मुझे कोई पश्चाताप नहीं है, न उसमें मुझे कोई सुधार ही करना है। मुझे लगता है कि आज भी ऐसा सवाल उठे, तो मेरा व्यवहार पहले की तरह ही होगा।

इस प्रकार के विचार लेकर मैं दिल्ली गया। मुसलमानों के दु:ख की चर्चा मुझे वाइसरॉय से करनी थी। खिलाफत के प्रश्न ने अभी पूर्ण स्वरूप धारण नहीं किया था।

दिल्ली पहुँचते ही दीनबंधु एंड्रूज ने एक नैतिक प्रश्न खड़ा कर दिया। उन्हीं दिनों इटली और इग्लैंड के बीच गुप्त संधि होने की जो चर्चा अंग्रेजी अखबारों में छिड़ी थी, उसकी बात कहकर दीनबंधु ने मुझ से कहा, 'यदि इंग्लैंड ने इस प्रकार की गुप्त संधि किसी राष्ट्र के साथ की हो, तो आप इस सभा में सहायक की तरह कैसे भाग ले सकते हैं?' मैं इन संधियों के विषय में कुछ जानता नहीं था। दीनबंधु का शब्द मेरे लिए पर्याप्त था। इस कारण को निमित्त बनाकर मैंने लॉर्ड चेम्सफर्ड को पत्र लिखा कि सभा में सम्मिलित होते हुए मुझे संकोच हो रहा है। उन्होंने मुझे चर्चा के लिए बुलाया। उनके साथ और बाद में मि. मेंफी के साथ मेरी लंबी चर्चा हुई। उसका परिणाम यह हुआ कि मैंने सभा में सम्मिलित होना स्वीकार किया। थोड़े में वाइसरॉय की दलील यह थी, 'आप यह तो नहीं मानते कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल जो कुछ करे, उसकी जानकारी वाइसरॉय को होनी चाहिए? मैं यह दावा नहीं करता कि ब्रिटिश सरकार कभी भूल करती ही नहीं। कोई भी ऐसा दावा नहीं करता। किंतु यदि आप स्वीकार करते है कि उसका अस्तित्व संसार के लिए कल्याणकारी है, यदि आप यह मानते है कि उसके कार्यों से इस देश को कुल मिलाकर कुछ लाभ हुआ है, तो क्या आप यह स्वीकार नहीं करेंगे कि उसकी विपत्ति के समय उसे मदद पहुँचना प्रत्येक नागरिक का धर्म है? गुप्त संधि के विषय में आपने समाचार पत्रों में जो देखा है, वही मैंने भी देखा है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता यह मैं आपसे विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ। अखबारों में कैसी कैसी गप्पे आती है, यह तो आप जानते ही है। क्या अखबार में आई हुई एक निंदाजनक बात पर आप ऐसे समय राज्य का त्याग कर सकते है? लड़ाई समाप्त होने पर आपको जितने नैतिक प्रश्न उठाने हो उठा सकते है और जितनी तकरार करनी हो उतनी कर सकते हैं।'

यह दलील नई नहीं थी। लेकिन जिस अवसर पर और जिस रीति से यह पेश की गई, उसमें मुझे नई-जैसी लगी और मैंने सभा में जाना स्वीकार कर लिया। खिलाफत के बारे में यह निश्चय हुआ कि मैं वाइसरॉय को पत्र लिखकर भेजूँ।


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