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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 28. मृत्यु-शय्या पर पीछे     आगे

रंगरूटों की भरती के काम में मेरा शरीर काफी क्षीण हो गया। उन दिनों मेरे आहार में मुख्यतः सिकी हुई और कुटी मूँगफली, उसके साथ थोड़ा गुड़, केले वगैरा फल और दो-तीन नींबू का पानी, इतनी चीजें रहा करती थी। मैं जानता था कि अधिक मात्रा में खाने से मूँगफली नुकसान करती है। फिर भी वह अधिक खा ली गई। उसके कारण पेट में कुछ पेचिश रहने लगी। मैं समय-समय पर आश्रम तो आता ही था। मुझे यह पेचिश बहुत ध्यान देने योग्य प्रतीत न हुई। रात-आश्रम पहुँचा। उन दिनों मैं दवा क्वचित ही लेता था। विश्वास यह था कि एक बार खाना छोड़ देने से दर्द मिट जाएगा। दूसरे दिन सवेरे कुछ भी न खाया था। इससे दर्द लगभग बंद हो चुका था। पर मैं जानता था कि मुझे उपवास चालू ही रखना चाहिए अथवा खाना ही हो तो फल के रस जैसी कोई चीज लेनी चाहिए।

उस दिन कोई त्यौहार था। मुझे याद पड़ता है कि मैंने कस्तूरबाई से कह दिया था कि मैं दोपहर को भी नहीं खाऊँगा। लेकिन उसने मुझे ललचाया और मैं लालच में फँस गया। उन दिनों मैं किसी पशु का दूध नहीं लेता था। इससे घी-छाछ का भी मैंने त्याग कर दिया था। इसलिए उसने मुझ से कहा कि आपके लिए दले हुए गेहूँ को तेल में भूनकर लपसी बनाई गई है और खास तौर पर आपके लिए ही पूरे मूँग भी बनाए गए है। मैं स्वाद के वश होकर पिघला। पिघलते हुए भी इच्छा तो यह रखी थी कि कस्तूरबाई को खुश रखने के लिए थोड़ा खा लूँगा, स्वाद भी ले लूँगा और शरीर की रक्षा भी कर लूँगा। पर शैतान अपना निशाना ताक कर ही बैठा था। खाने बैठा तो थोड़ा खाने के बदले पेट भर कर खा गया। इस प्रकार स्वाद तो मैंने पूरा लिया, पर साथ ही यमराज को न्योता भी भेज दिया। खाने के बाद एक घंटा भी न बीता था कि जोर की पेचिश शुरू हो गई।

रात नड़ियाद तो वापिस जाना ही था। साबरमती स्टेशन तक पैदल गया। पर सवा मील का वह रास्ता तय करना मुश्किल हो गया। अहमदाबाद स्टेशन पर वल्लभभाई पटेल मिलनेवाले थे। वे मिले और मेरी पीड़ा ताड़ ली। फिर भी मैंने उन्हें अथवा दूसरे साथियों को यह मालूम न होने दिया कि पीड़ा असह्य थी।

नड़ियाद पहुँचे। वहाँ से अनाथाश्रम जाना था, जो आधे मील से कुछ कम ही दूर था। लेकिन उस दिन यह दूरी मील के बराबर मालूम हुई। बड़ी मुश्किल से घर पहुँचा। लेकिन पेट का दर्द बढ़ता ही जाता था। 15-15 मिनट से पाखाने की हाजत मालूम होती थी। आखिर मैं हारा। मैंने अपनी असह्य वेदना प्रकट की और बिछौना पकड़ा। आश्रम के आम पाखाने में जाता था, उसके बदले दो मंजिले पर कमोड मँगवाया। शरम तो बहुत आई, पर मैं लाचार हो गया था। फूलचंद बापू जी बिजली की गति से कमोड ले आए। चिंतातुर होकर साथियों ने मुझे चारों ओर से घेर दिया। उन्होंने मुझे अपने प्रेम से नहला दिया। पर वे बेचारे मेरे दु:ख में किस प्रकार हाथ बँटा सकते थे? मेरे हठ का पार न था। मैंने डॉक्टर को बुलाने से इनकार कर दिया। दवा तो लेनी ही न थी, सोचा किए हुए पाप की सजा भोगूँगा। साथियों ने यह सब मुँह लटका कर सहन किया। चौबीस बार पाखाने की हाजत हुई होगी। खाना मैं बंद कर ही चुका था, और शुरू के दिनों में तो मैंने फल का रस भी नहीं लिया था। लेने की बिलकुल रुचि न थी।

आज तक जिस शरीर को मैं पत्थर के समान मानता था, वह अब गीली मिट्टी जैसा बन गया। शक्ति क्षीण हो गई। साथियों ने दवा लेने के लिए समझाया। मैंने इनकार किया। उन्होंने पिचकारी लगवाने की सलाह दी। उस समय की पिचकारी विषयक मेरा अज्ञान हास्यास्पद था। मैं यह मानता था कि पिचकारी में किसी-न-किसी प्रकार की लसी होगी। बाद में मुझे मालूम हुआ कि वह तो निर्दोष वनस्पति से बनी औषधि की पिचकारी थी। पर जब समझ आई तब अवसर बीत चुका था। हाजते तो जारी ही थी। अतिशय परिश्रम के कारण बुखार आ गया और बेहोशी भी आ गई। मित्र अधिक घबराए। दूसरे डॉक्टर भी आए। पर जो रोगी उनकी बात माने नहीं, उसके लिए वे क्या कर सकते थे।

सेठ अंबालाल और उनकी धर्मपत्नी दोनों नड़ियाद आए। साथियों से चर्चा करने के बाद वे अत्यंत सावधानी के साथ मुझे मिर्जापुरवाले अपने बंगले पर ले गए। इतनी बात तो मैं अवश्य कह सकता हूँ कि अपनी बीमारी में मुझे तो निर्मल और निष्काम सेवा प्राप्त हुई, उससे अधिक सेवा कोई पा नहीं सकता। मुझे हलका बुखार रहने लगा। मेरा शरीर क्षीण होता गया। बीमारी लंबे समय तक चलेगी, शायद मैं बिछौने से उठ नहीं सकूँगा, ऐसा भी एक विचार मन में पैदा हुआ। अंबालाल सेठ के बंगले में प्रेम से घिरा होने के पर भी मैं अशांत हो उठा और वे मुझे आश्रम ले गए। मेरा अतिशय आग्रह देखकर वे मुझे आश्रम ले गए।

मैं अभी आश्रम में पीड़ा भोग ही रहा था कि इतने में वल्लभभाई समाचार लाए कि जर्मनी पूरी तरह हार चुका है और कमिश्नर ने कहलवाया है कि और रंगरूटों भरती करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह सुनकर भरती की चिंता से मैं मुक्त हुआ और मुझे शांति मिली।

उन दिनों मैं जल का उपचार करता था और उससे शरीर टिका हुआ था। पीड़ा शांत हो गई थी, किंतु किसी भी उपाय से पुष्ट नहीं हो रहा था। वैद्य मित्र और डॉक्टर मित्र अनेक प्रकार की सलाह देते थे, पर मैं किसी तरह दवा पीने को तैयार नहीं हुआ। दो-तीन मित्रों ने सलाह दी कि दूध लेने में आपत्ति हो, तो मांस का शोरवा लेना चाहिए और औषधि के रूप में माँसादि चाहे जो वस्तु ली जा सकती है। इसके समर्थन में उन्होंने आयुर्वेद के प्रमाण दिए। एक ने अंडे लेने की सिफारिस की। लेकिन मैं इनमें से किसी भी सलाह को स्वीकार न कर सका। मेरा उत्तर एक ही था। नहीं।

खाद्याखाद्य का निर्णय मेरे लिए केवल शास्त्रों के श्लोकों पर अवलंबित नहीं था, बल्कि मेरे जीवन के साथ वह स्वतंत्र रीति से जूड़ा हुआ था। चाहे जो चीज खाकर और चाहे जैसा उपचार करके जीने का मुझे तनिक लोभ न था। जिस धर्म का आचरण मैंने अपने पुत्रों के लिए किया, स्त्री के लिए किया, स्नेहियों के लिए किया, उस धर्म का त्याग मैं अपने लिए कैसे करता?

इस प्रकार मुझे अपनी इस लंबी और जीवन की सबसे पहले इतनी बड़ी बीमारी में धर्म का निरीक्षण करने और उसे कसौटी पर चढ़ाने का अलभ्य लाभ मिला। एक रात तो मैंने बिलकुल ही आशा छोड़ दी थी। मुझे ऐसा भास हुआ कि अब मृत्यु समीप ही है। श्री अनसूयाबहन को खबर भिजवाई। वे आई। वल्लभभाई आए। डॉक्टर कानूगा आए। डॉ. कानूगा ने मेरी नाड़ी देखी और कहा, 'मैं खुद तो मरने के कोई चिह्न देख नहीं रहा हूँ। नाड़ी साफ है। केवल कमजोरी के कारण आपके मन में घबराहट है।' लेकिन मेरा मन न माना। रात तो बीती। किंतु उस रात मैं शायद ही सो सका होउँगा।

सवेरा हुआ। मौत न आई। फिर भी उस समय जीने की आशा न बाँध सका और यह समझकर कि मृत्यु समीप है, जितनी देर बन सके उतनी देर तक साथियों से गीतापाठ सुनने में लगा रहा। कामकाज करने की कोई शक्ति रही ही नहीं थी। पढ़ने जितनी शक्ति भी नहीं रह गई थी। किसी के साथ बात करने की भी इच्छा न होती थी। थोड़ी बात करके दिमाग थक जाता था। इस कारण जीने में कोई रस न रह गया था। जीने के लिए जीना मुझे कभी पसंद पड़ा ही नहीं। बिना कुछ कामकाज किए साथियों की सेवा लेकर क्षीण हो रहे शरीर को टिकाए रखने में मुझे भारी उकताहट मालूम होती थी।

यों मैं मौत की राह देखता बैठा था। इतने में डॉ. तलवरकर एक विचित्र प्राणी तो लेकर आए। वे महाराष्ट्री हैं। हिंदुस्तान उन्हें पहचानता नहीं। मैं उन्हें देखकर समझ सका था कि वे मेरी ही तरह 'चक्रम' है। वे अपने उपचार का प्रयोग मुझ पर करने के लिए आए थे। उन्हें डॉ. तलवरकर अपनी सिफारिश के साथ मेरे पास लाए थे। उन्होंने ग्रांट मेंडिकल कॉलेज में डॉकटरी का अध्ययन किया था, पर वे डिग्री नहीं पा सके थे। बाद में मालूम हुआ कि वे ब्रह्मसमाजी है। नाम उनका केलकर है। बड़े स्वतंत्र स्वभाव के है। वे बरफ के उपचार के बड़े हिमायती है। मेरी बीमारी की बात सुनकर जिस दिन वे मुझ पर बरफ का अपना उपचार आजमाने के लिए आए, उसी दिन से हम उन्हें 'आइस डॉक्टर' के उपनाम से पहचानते है। उपने विचारों के विषय में वे अत्यंत आग्रही है। उनका विश्वास है कि उन्होंने डिग्रीधारी डॉक्टरों से भी कुछ अधिक खोजे की है। अपना यह विश्वास वे मुझ में पैदा नहीं कर सके, यह उनके और मेरे दोनों के लिए दु:ख की बात रही है। मैं एक हद तक उनके उपचारों में विश्वास करता हूँ। पर मेरा खयाल है कि कुछ अनुमानों तक पहुँचने में उन्होंने जल्दी की है।

पर उनकी खोजे योग्य हो अथवा अयोग्य, मैंने उन्हें अपने शरीर पर प्रयोग करने दिए। मुझे बाह्य उपचारों से स्वस्थ होना अच्छा लगता था, सो भी बरफ अर्थात पानी के। अतएव उन्होंने मेरे सारे शरीर पर बरफ घिसनी शुरू की। इस इलाज से जितने परिणाम की आशा वे लगाए हुए थे, उतना परिणाम तो मेरे संबंध में नहीं निकला। फिर भी मैं, जो रोज मौत की राह देखा करता था, अब मरने के बदले कुछ जीने की आशा रखने लगा। मुझे कुछ उत्साह पैदा हुआ। मन के उत्साह के साथ मैंने शरीर में भी कुछ उत्साह का अनुभव किया। मैं कुछ अधिक खाने लगा। रोज पाँच-दस मिनट घूमने लगा। अब उन्होंने सुझाया, 'अगर आप अंडे का रस पीए, तो आप में जितनी शक्ति आई है उससे अधिक शक्ति आने की गारंटी मैं दे सकता हूँ। अंडे दूध के समान ही निर्दोष है। वे मांस तो हरगिज नहीं है। हरएक अंडे में से बच्चा पैदा होता ही है, ऐसा कोई नियम नहीं है। जिनसे बच्चे पैदा होते ही नहीं ऐसे निर्जीव अंडे भी काम में लाए जाते है, इसे मैं आपके सामने सिद्ध कर सकता हूँ।' पर मैं ऐसे निर्जीव अंडे लेने को भी तैयार न हुआ। फिर भी मेरी गाड़ी कुछ आगे बढ़ी और मैं आसपास के कामों में थोड़ा-थोड़ा रस लेने लगा।


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