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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 31. वह सप्ताह ! - 1 पीछे     आगे

दक्षिण में थोड़ी यात्रा करके संभवतः 4 अप्रैल को मैं बंबई पहुँचा। शंकरलाल बैंकर का तार था कि छठी का तारीख मनाने के लिए मुझे बंबई में मौजूद रहना चाहिए।

पर इससे पहले दिल्ली में तो हड़ताल 30 मार्च के दिन ही मनायी जा चुकी थी। दिल्ली में स्व. श्रद्धानंदजी और मरहूम हकीम साहब अजमलखाँ की दुहाई फिरती थी। 6 अप्रैल तक हड़ताल की अवधि बढ़ाने की सूचना दिल्ली देर से पहुँची थी। दिल्ली में उस दिन जैसी हड़ताल हुई वैसी पहले कभी न हुई थी। ऐसा जान पड़ा मानो हिंदू और मुसलमान दोनों एक दिल हो गए है। श्रद्धानंदजी को जामा मस्जिद में निमंत्रित किया गया और वहाँ उन्हें भाषण करने दिया गया। अधिकारी यह सब सहन नहीं कर पाए। रेलवे स्टेशन की तरफ जाते हुए जुलूस को पुलिस ने रोका और गोलियाँ चलाई। कितने ही लोग घायल हुए। कुछ जान से मारे गए। दिल्ली में दमन का दौर शुरू हुआ। श्रद्धानंदजी ने मुझे दिल्ली बुलाया। मैंने तार दिया कि बंबई में छठी तारीख मनाकर तुरंत दिल्ली पहुँचूँगा।

जो हाल दिल्ली का था, वही लाहौर-अमृतसर का भी रहा। अमृतसर से डॉ. सत्यपाल और किचलू के तार आए थे कि मुझे वहाँ तुरंत पहुँचना चाहिए। इन दो भाइयों को मैं उस समय बिलकुल जानता नहीं था। पर वहाँ भी इस निश्चय की सूचना भेजी थी कि दिल्ली होकर अमृतसर पहुँचूँगा।

6 अप्रैल के दिन बंबई में सवेरे-सवेरे हजारों लोग चौपाटी पर स्नान करने गए और वहाँ से ठाकुरद्वार (यहाँ 'ठाकुरद्वार' के स्थान पर 'माधवबाग' पढ़िए। अब तक के अंग्रेजी और गुजराती संस्करण में यह गलती रहती आई है। उस समय गांधीजी के साथ रहनेवाले श्री मथुरादास त्रिकमजी ने इसे सुधरवाया था।) जाने के लिए जुलूस रवाना हुआ। उसमें स्त्रियाँ और बच्चे भी थे। जुलूल में मुसलमान भी अच्छी संख्या ने सम्मिलित हुए थे। इस जुलूस को से मुसलमान भाई हमें एक मजिस्द में ले गए। वहाँ श्रीमति सरोजिनीदेवी से और मुझ से भाषण कराए। वहाँ श्री विट्ठलदास जेराजाणी ने स्वदेशी और हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रतिज्ञा लिवाने का सुझाव रखा। मैंने ऐसी उतावली में प्रतिज्ञा कराने से इनकार किया और जितना हो रहा था उतने से संतोष करने की सलाह दी। की हुई प्रतिज्ञा फिर तोड़ी नहीं जा सकती। स्वदेशी का अर्थ हमें समझना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रतिज्ञा की जिम्मेदार का खयाल हमें रहना चाहिए - आदि बातें कही और यह सूचना की कि प्रतिज्ञा लेने का जिसका विचार हो, वह चाहे तो अगले दिन सवेरे चौपाटी के मैदान पर पहुँच जाए।

बंबई की हड़ताल संपूर्ण थी।

यहाँ कानून की सविनय अवज्ञा की तैयारी कर रखी थी। जिनकी अवज्ञा की जा सके ऐसी दो-तीन चीजें थी। जो कानून रद्द किए जाने लायक थे और जिनकी अवज्ञा सब सरलता से कर सकते थे, उनमें से एक का ही उपयोग करने का निश्चय था। नमक-कर का कानून सबको अप्रिय था। उस कर को रद्द कराने के लिए बहुत कोशिशें हो रही थी। अतएव मैंने सुझाव यह रखा कि सब लोग बिना परवाने के अपने घर में नमक बनाए। दूसरा सुझाव सरकार द्वारा जब्त की हुई पुस्तकें छापने और बेचने का था। ऐसी दो पुस्तकें मेरी ही थी, 'हिंद स्वराज' और 'सर्वोदय'। इन पुस्तकों को छपाना और बेचना सबसे सरल सविनय अवज्ञा मालूम हुई। इसलिए ये पुस्तकें छपाई गई और शाम को उपवास से छूटने के बाद और चौपाटी की विराट सभा के विसर्जित होने के बाद इन्हें बेचने का प्रबंध किया गया।

शाम को कई स्वयंसेवक ये पुस्तकें लेकर बेचने निकल पड़े। एक मोटर में मैं निकला और एक में श्रीमति सरोजिनी नायडू निकलीं। जितनी प्रतियाँ छपाई गई थीं उतनी सब बिक गई। इनको जो कीमत वसूल होती, वह लड़ाई के काम में ही खर्च की जानेवाली थी। एक प्रति का मूल्य चार आना रखा गया था। पर मेरे हाथ पर अथवा सरोजिनीदेवी के हाथ पर शायद ही किसी ने चार आने रखे होगे। अपनी जेब में जो था सो सब देकर किताबें खरीदनेवाले बहुतेरे निकल आए। कोई कोई दस और पाँच के नोट भी देते थे। मुझे स्मरण है कि एक प्रति के लिए 50 रुपए के नोट भी मिले थे। लोगों को समझा दिया गया था कि खरीदनेवाले के लिए भी जेल का खतरा है। लेकिन क्षण भर के लिए लोगों ने जेल का भय छोड़ दिया था।

7 तारीख को पता चला कि जिन किताबों के बेचने पर सरकार ने रोक लगाई थी, सरकारी दृष्टि से वे बेची नहीं गई है। जो पुस्तकें बिकी है वे तो उनकी दूसरी आवृति मानी जाएगी। जब्त की हुई पुस्तकों में उनकी गिनती नहीं हो सकती। सरकारी ओर से कहा गया था कि नई आवृति छपाने, बेचने और खरीदने में कोई गुनाह नहीं है। यह खबर सुनकर लोग निराश हुए।

उस दिन सवेरे लोगों को चौपाटी पर स्वदेशी-व्रत और हिंदू-मुस्लिम एकता का व्रत लेने के लिए इकट्ठा होना था। विट्ठलदास जेराजाणी को यह पहला अनुभव हुआ कि हर सफेद चीज दूध नहीं होती। बहुत थोड़े लोग इकट्ठे हुए थे। इनमें से दो-चार बहनों के नाम मेरे ध्यान में आ रहे है। पुरुष भी थोड़े ही थे। मैंने व्रतों का मसविदा बना रखा था। उपस्थित लोगों को उनका अर्थ अच्छी तरह समझा दिया गया और उन्हें व्रत लेने दिए गए। थोड़ी उपस्थिति से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, दु:ख भी नहीं हुआ। परंतु मैं उसी समय से धूम-धड़क्के के काम और धीमें तथा शांत रचनात्मक काम के बीच का भेद तथा लोगों में पहले काम के लिए पक्षपात और दूसरे के लिए अरुचि का अनुभव करता आया हूँ।

पर इस विषय के लिए एक अलग प्रकरण देना पड़ेगा।

7 अप्रैल की रात को मैं दिल्ली-अमृतसर जाने के लिए रवाना हुआ। 8 को मथुरा पहुँचने पर कुछ ऐसी भनक कान तक आई कि शायद मुझे गिफ्तार करेंगे। मुथरा के बाद एक स्टेशन पर गाड़ी रुकती थी। वहाँ आचार्य गिडवानी मिले। उन्होंने मेरे पकड़े जाने के बारे में पक्की खबर दी और जरूरत हो तो अपनी सेवा अर्पण करने के लिए कहा। मैंने धन्यवाद दिया और कहा कि जरूरत पड़ने पर आपकी सेवा लेना नहीं भूलूँगा।

पलवल स्टेशन आने के पहले ही पुलिस अधिकारी ने मेरे हाथ पर आदेश-पत्र रखा। आदेश इस प्रकार का था : 'आपके पंजाब में प्रवेश करने से अशांति बढ़ने का डर है, अतएव आप पंजाब की सीमा में प्रवेश न करें।' आदेश-पत्र देकर पुलिस में उतर जाने को कहा। मैंने उतरने से इनकार किया और कहा, 'मैं अशांति बढ़ाने नहीं बल्कि निमंत्रण पाकर अशांति घटाने के लिए जाना चाहता हूँ। इसलिए खेद है कि मुझसे इस आदेश का पालन नहीं हो सकेगा।'

पलवल आया। महादेव मेरे साथ थे। उनसे मैंने दिल्ली जाकर श्रद्धानंदजी को खबर देने और लोगों को शांत रखने के लिए कहा। मैंने महादेव से यह भी कहा कि वे लोगों को बता दे कि सरकारी आदेश का अनादर करने के कारण जो सजा होगी उसे भोगने का मैंने निश्चय कर लिया है, साथ ही लोगों को समझाने के लिए कहा कि मुझे सजा होने पर भी उनके शांत रहने में ही हमारी जीत है।

मुझे पलवल स्टेशन पर उतार लिया गया और पुलिस के हवाले किया गया। फिर दिल्ली से आनेवाली किसी ट्रेन के तीसरे दर्जे के डिब्बे में मुझे बैठाया गया और साथ में पुलिस का दल भी बैठा। मथुरा पहुँचने पर मुझे पुलिस की बारक में ले गए। मेरा क्या होगा और मुझे कहाँ ले जाना है, सो कोई पुलिस अधिकारी मुझे बता न सका। सुबह 4 बजे मुझे जगाया और बंबई जानेवाली मालगाड़ी में बैठा दिया गया। दोपहर को मुझे सवाई माधोपुर स्टेशन पर उतारा गया। वहाँ बंबई की डाकगाड़ी में लाहौर से इंस्पेक्टर बोरिंग आए। उन्होंने मेरा चार्ज लिया।

अब मुझे पहले दर्जे में बैठाया गया। साथ में साहब भी बैठे। अभी तक मैं एक साधारण कैदी था, अब 'जेंटलमैन कैदी' माना जाने लगा। साहब ने सर माइकल ओडवायर का बखान शुरू किया। उन्हें मेरे विरुद्ध तो कोई शिकायत है ही नहीं, किंतु मेरे पंजाब जाने से उन्हें अशांति का पूरा भय है, आदि बातें कह कर मुझे स्वेच्छा से लौट जाने और फिर से पंजाब की सीमा पार न करने का अनुरोध किया। मैंने उनसे कह दिया कि मुझसे इस आज्ञा का पालन नहीं हो सकेगा और मैं स्वेच्छा से वापस जाने को तैयार नहीं। अतएव साहब में लाचार होकर कानूनी कार्रवाई करने की बात कहीं। मैंने पूछा, 'लेकिन यह तो कहिए कि आप मेरा क्या करना चाहते है?' वे बोले, 'मुझे पता नहीं है। मैं दूसरे आदेश की राह देख रहा हूँ। अभी तो मैं आपको बंबई ले जा रहा हूँ।'

सूरत पहुँचने पर किसी दूसरे अधिकारी ने मुझे अपने कब्जे में लिया। उसने मुझे रास्ते में कहा, 'आप रिहा कर दिए गए है। लेकिन आपके लिए मैं ट्रेन को मरीन लाइंस स्टेशन के पास रुकवाऊँगा। आप वहाँ उतर जाएँगे, तो ज्यादा अच्छा होगा। कोलाबा स्टेशन पर बड़ी भीड़ होने की संभावना है।' मैंने उससे कहा कि आपका कहा करने में मुझे प्रसन्नता होगी। वह खुश हुआ और उसने मुझे धन्यवाद दिया। मैं मरीन लाइंस पर उतरा। वहाँ किसी परिचित को घोड़ागाड़ी दिखाई दी। वे मुझे रेवाशंकर झवेरी के घर छोड़ गए। उन्होंने मुझे खबर दी, 'आपके पकड़े जाने की खबर पाकर लोग क्रुद्ध हो गए है और पागल-से बन गए है। पायधूनी के पास दंगे का खतरा है। मजिस्ट्रेट और पुलिस वहाँ पहुँच गई है।'

मैं घर पहुँचा ही था कि इतने में उमर सोबानी और अनसूयाबहन मोटर में आए और उन्होंने मुझे पायधूनी चलने को कहा। उन्होंने बताया, 'लोग अधीर हो गए है और बड़े उत्तेजित है। हममें से किसी के किए शांत नहीं हो सकते। आपको दखेंगे तभी शांत होंगे।'

मैं मोटर में बैठ गया। पायधूनी पहुँचते ही रास्ते में भारी भीड़ दिखाई दी। लोग मुझे देखकर हर्षोंमत हो उठे। अब जुलूस बना। 'वन्दे मातरम' और 'अल्लाहो अकबर' के नारो से आकाश गूँज उठा। पायधूनी पर घुड़सवार दिखाई दिए। ऊपर से ईंटों की वर्षा हो रही थी। मैं हाथ जोड़कर लोगों से प्रार्थना कर रहा था कि वे शांत रहे। पर जान पड़ा कि हम भी ईंटों की इस बौछार से बच नहीं पाएँगे।

अब्दुर्रहमान गली में से क्रॉफर्ड मारकेट की ओर जाते हुए जुलूस को रोकने के लिए घुड़सवारों की एक टुकड़ी सामने से आ पहुँची। वे जुलूस को किले की ओर जाने से रोकने की कोशिश कर रहे थे। लोग वहाँ समा नहीं रहे थे। लोगों ने पुलिस की पांत को चीर कर आगे बढ़ने के लिए जोर लगाया। वहाँ हालत ऐसी नहीं कि मेरी आवाज सुनाई पड़ सके। यह देखकर घुड़सवारों की टुकड़ी के अफसर ने भीड़ को तितर-बितर करने का हुक्म दिया और अपने भालों को घुमाते हुए इस टुकड़ी ने एकदम घोड़े दौडाने शुरू कर दिए। मुझे डर लगा कि उनके भाले हमारा काम तमाम कर दे तो आश्चर्य नहीं। पर मेरा वह डर निराधार था। बगल से होकर सारे भाले रेलगाड़ी की गति से सनसनाते हुए दूर निकल जाते थे। लोगों की भीड़ में दरार पड़ी। भगदड मच गई। कोई कुचले गए। कोई घायल हुए। घुड़सवारों को निकलने के लिए कोई रास्ता नहीं था। लोगों के लिए आसपास बिखरने का रास्ता नहीं था। वे पीछे लौटे तो उधर भी हजारों लोग ठसाठस भरे हुए थे। सारा दृश्य भयंकर प्रतीत हुआ। घुड़सवार और जनता दोनों पागल जैसे मालूम हुए। घुड़सवार कुछ देखते ही नहीं थे अथवा देख नहीं सकते थे। वे तो टेढ़े होकर घोड़ो को दौड़ाने में लगे थे। मैंने देखा कि जितना समय इन हजारों के दल को चीरने में लगा, उतने समय तक वे कुछ देख ही नहीं सकते थे।

इस तरह लोगों को तितर-बितर किया गया और आगे बढ़ने से रोका गया। हमारी मोटर को आगे जाने से रोक दिया गया। मैंने कमिश्नर के कार्यालय के सामने मोटर रुकवाई और मैं उससे पुलिस के व्यवहार की शिकायत करने के लिए उतरा।


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