hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 32. वह सप्ताह ! - 2 पीछे     आगे

मैं कमिश्नर ग्रिफिथ साहब के कार्यालय में गया। उनकी सीढ़ी के पास जहाँ देखा वहीं हथियारबंद सैनिकों को बैठा पाया, मानो लड़ाई के लिए तैयार हो रहे हो! बरामदे में भी हलचल मची हुई थी। मैं खबर देकर ऑफिस में पैठा, तो देखा कि कमिश्नर के पास मि. बोरिंग बैठे हुए है।

मैंने कमिश्नर से उस दृश्य का वर्णन किया, जिसे मैं अभी-अभी देखकर आया था। उन्होंने संक्षेप में जवाब दिया, ' मैं नहीं चाहता था कि जुलूस फोर्ट की ओर जाए। वहाँ जाने पर उपद्रव हुए बिना न रहता। और मैंने देखा कि लोग लौटाए लौटनेवाले न थे। इसलिए सिवा घोड़े दौड़ाने के मेरे पास दूसरा कोई उपाय न था।'

मैंने कहा, 'किंतु उसका परिणाम तो आप जानते थे। लोग घोड़ो के पैरा तले दबने से बच नहीं सकते थे। मेरा तो खयाल है कि घुड़सवारों की टुकड़ी भेजने की आवश्यकता ही नहीं थी।'

साहब बोले, 'आप इसे समझ नहीं सकते। आपकी शिक्षा का लोगों पर क्या असर हुआ है, इसका पता आपकी अपेक्षा हम पुलिसवालों को अधिर रहता है। हम पहले से कड़ी कार्रवाई न करे, तो अधिक नुकसान हो सकता है। मैं आपसे कहता हूँ कि लोग आपके काबू में भी रहनेवाले नहीं है। वे कानून को तोड़ने की बात तो झट समझ जाएँगे समझ जाएँगे, लेकिन शांति की बात समझना उनकी शक्ति से परे है। आपके हेतु अच्छे है, लेकिन लोग उन्हें समझेंगे नहीं। वे तो अपने स्वभाव का ही अनुकरण करेंगे।'

मैंने जवाब दिया,' किंतु आपके और मेरे बीच जो भेद है, सो इसी बात में है। मैं कहता हूँ कि लोग स्वभाव से लड़ाकू नहीं, बल्कि शांतिप्रिय है।'

हममें बहस होने लगी।

आखिर साहब ने कहा, 'अच्छी बात है, यदि आपको विश्वास हो जाए कि लोग आपकी शिक्षा को समझे नहीं हैं, तो आप क्या करेंगे?'

मैंने उत्तर दिया, 'यदि मुझे इसका विश्वास हो जाए तो मैं इस लड़ाई को मुल्तवी कर दूँगा।'

'मुल्तवी करने का मतलब क्या? आपने तो मि. बोरिंग से कहा है कि मुक्त होने पर आप तुरंत वापस पंजाब जाना चाहते है!'

'हाँ, मेरा इरादा तो लौटती ट्रेन से ही वापस जाने का था, पर अब आज तो जाना हो ही नहीं सकता।'

'आप धैर्य से काम लेगे तो आपको और अधिक बातें मालूम होगी। आप जानते है, अहमदाबाद में क्या हो रहा है? अमृतसर में क्या हुआ है? लोग सब कहीं पागल से हो गए है। कई स्थानों में तार टूटे है। मैं तो आपसे कहता हूँ कि इस सारे उपद्रव की जवाबदेही आपके सिर पर है।'

मैंने कहा, 'मुझे जहाँ अपनी जिम्मेदारी महसूस होगी, वहाँ मैं उसे अपने ऊपर लिए बिना नहीं रहूँगा। अहमदाबाद में तो लोग थोड़ा भी उपद्रव करे तो मुझे आश्चर्य और दु:ख होगा। अमृतसर के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ कि पंजाब की सरकार में मुझे वहाँ जाने से रोका न होता, तो मैं शांति रक्षा में बहुत मदद कर सकता था। मुझे रोक कर तो सरकार ने लोगों को चिढ़ाया ही है।'

इस तरह हमारी बातचीत होती रही। हमारे मन को मेल मिलनेवाला न था। मैं यह कहकर बिदा हुआ कि चौपाटी पर सभा करने और लोगों को शांति रखने के लिए समझाने का मेरा इरादा है।

चौपाटी पर सभा हुई। मैंने लोगों को शांति और सत्याग्रह की मर्यादा के विषय में समझाया और बतलाया, 'सत्याग्रह सच्चे का हथियार है। यदि लोग शांति न रखेंगे, तो मैं सत्याग्रह की लड़ाई कभी लड़ न सकूँगा।'

अहमदाबाद से श्री अनसूयाबहन को भी खबर मिल चुकी थी कि उपद्रव हुआ है। किसी ने अफवाह फैला दी थी कि वे भी पकड़ी गई हैं। उससे मजदूर पागल हो उठे थे। उन्होंने हड़ताल कर दी थी, उपद्रव भी मचाया, और एक सिपाही का खून भी हो गया था।

मैं अहमदाबाद गया। मुझे पता चला कि नड़ियाद के पास रेल की पटरी उखाड़ने की कोशिश भी हुई थी। वीरगाम में एक सरकारी कर्मचारी का खून हो गया था। अहमदाबाद पहुँचा तब वहाँ मार्शल लॉ जारी था। लोगों में आतंक फैला हुआ था। लोगों ने जैसा किया वैसा पाया और उसका ब्याज भी पाया।

मुझे कमिश्नर मि. प्रेट के पास ले जाने के लिए एक आदमी स्टेशन पर हाजिर था। मैं उसके पास गया। वे बहुत गुस्से में थे। मैंने उन्हें शांति से उत्तर दिया। जो हत्या हुई थी उसके लिए मैंने खेद प्रकट किया। यह भी सुझाया कि मार्शल लॉ की आवश्यकता नहीं है, और पुनः शांति स्थापित करने के लिए जो उपवास करने जरूरी हो, सो करने की अपनी तैयारी बताई। मैंने आम सभा बुलाने की माँग की। यह सभा आश्रम की भूमि पर करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्हें यह बात अच्छी लगी। जहाँ तक मुझे याद है, मैंने रविवार ता. 13 अप्रैल को सभा की था। मार्शल लॉ भी उसी दिन अथवा अगले दिन रद्द हुआ था। इस सभा में मैंने लोगों को उनके दोष दिखाने का प्रयत्न किया। मैंने प्रायश्चित के रूप में तीन दिन के उपवास किए और लोगों को एक उपवास करने की सलाह दी। जिन्होंने हत्या वगैरा में हिस्सा लिया हो, उन्हें मैंने सुझाया कि वे अपना अपराध स्वीकार कर लें।

मैंने अपना धर्म स्पष्ट देखा। जिन मजदूरों आदि के बीच मैंने इतना समय बिताया था, जिनकी मैंने सेवा की थी और जिनके विषय में मैं अच्छे व्यवहार की आशा रखता था, उन्होंने उपद्रव में हिस्सा लिया, यह मुझे असह्य मालूम हुआ और मैंने अपने को उनके दोष में हिस्सेदार माना।

जिस तरह मैंने लोगों को समझाया कि वे अपना अपराध स्वीकार कर ले, उसी तरह सरकार को भी गुनाह माफ करने की सलाह दी। दोनों में से किसी एक ने भी मेरी बात नहीं सुनी। न लोगों ने अपने दोष स्वीकार किए, न सरकार ने किसी को माफ किया।

स्व. रमणभाई आदि नागरिक मेरे पास आए और मुझे सत्याग्रह मुल्तवी करने के लिए मनाने लगे। पर मुझे मनाने की आवश्यकता ही नहीं रही थी। मैंने स्वयं निश्चय कर लिया था कि जब तक लोग शांति का पाठ न सीख लें, तब तक सत्याग्रह मुल्तवी रखा जाए। इससे वे प्रसन्न हुए।

कुछ मित्र नाराज भी हुए। उनका खयाल यह था कि अगर मैं सब कहीं शांति की आशा रखूँ और सत्याग्रह की यही शर्त रहे, तो बड़े पैमाने पर सत्याग्रह कभी चल ही नहीं सकता। मैंने अपना मतभेद प्रकट किया। जिन लोगों में काम किया गया है, जिनके द्वारा सत्याग्रह करने की आशा रखी जाती है, वे यदि शांति का पालन न करे, तो अवश्य ही सत्याग्रह कभी चल नहीं सकता। मेरी दलील यह थी कि सत्याग्रही नेताओं को इस प्रकार की मर्यादित शांति बनाए रखने की शक्ति प्राप्त करनी चाहिए। अपने इन विचारों को मैं आज भी बदल नहीं सका हूँ।


>>पीछे>> >>आगे>>