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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 36. खिलाफत के बदले गोरक्षा? पीछे     आगे

अब थोड़ी देर के लिए पंजाब के हत्याकांड को छोड़ दें।

कांग्रेस की तरफ से पंजाब की डायरशाही की जाँच चल रही थी। इतने में एक सार्वजनिक निमंत्रण मेरे हाथ में आया। उसमें स्व. हकीम साहब और भाई आसफअली के नाम थे। उसमें यह लिखा भी था कि सभा में श्रद्धानंदजी उपस्थित रहनेवाले है। मुझे कुछ ऐसा खयाल है कि वे उप-सभापति थे। यह निमंत्रण दिल्ली में खिलाफत के संबंध में उत्पन्न परिस्थिति का विचार करनेवाली और संधि के उत्सव में सम्मिलित होने या न होने का निर्णय करनेवाली हिंदू-मुसलमानों की एक संयुक्त सभा में उपस्थित होने का था। मुझे कुछ ऐसा याद है कि यह सभा नवंबर महीने में हुई थी।

इस निमंत्रण में यह लिखा था कि सभा में केवल खिलाफत के प्रश्न की ही चर्चा नहीं होगी, बल्कि गोरक्षा के प्रश्न पर भी विचार होगा और यह कि गोरक्षा साधने का यह एक सुंदर अवसर बनेगा। मुझे यह वाक्य चुभा। इस निमंत्रण-पत्र का उत्तर देते हुए मैंने लिखा कि मैं उपस्थित होने की कोशिश करूँगा और यह भी लिखा कि खिलाफत और गोरक्षा को एकसाथ मिलाकर उन्हें परस्पर सौदे का सवाल नहीं बनाना चाहिए। हर प्रश्न का विचार उसके गुण-दोष की दृष्टि से किया जाना चाहिए।

मैं सभा में हाजिर रहा। सभा में उपस्थिति अच्छी थी। पर बाद में जिस तरह हजारों लोग उमड़ते थे, वैसा दृश्य वहाँ नहीं था। इस सभा में श्रद्धानंदजी उपस्थित थे। मैंने उनके साथ उक्त विषय पर चर्चा कर ली। उन्हें मेरी दलील जँची और उसे पेश करने का भार उन्होंने मुझ पर डाला। हकीम साहब के साथ भी मैंने बात कर ली थी। मेरी दलील यह थी कि दोनों प्रश्नें पर उनके अपने गुण-दोष की दृष्टि से विचार करना चाहिए। यदि खिलाफत के प्रश्न में सार हो, उसमें सरकार की ओर से अन्याय हो रहा हो तो हिंदुओं को मुसलमानों का साथ देना चाहिए और इस प्रश्न के साथ गोरक्षा के प्रश्न को नहीं जोड़ना चाहिए। अगर हिंदू ऐसी कोई शर्त करते है, तो वह उन्हें शोभा नहीं देगा। मुसलमान खिलाफत के लिए मिलनेवाली मदद के बदले में गोवध बंद करे, तो वह उनके लिए भी शोभास्पद न होगा। पड़ोसी और एक ही भूमि के निवासी होने के नाते तथा हिंदुओं की भावना का आदर करने की दृष्टि से यदि मुसलमान स्वतंत्र रूप से गोवध बंद करे, तो यह उनके लिए शोभा की बात होगी। यह उनका फर्ज है और एक स्वतंत्र प्रश्न है। अगर यह फर्ज है और मुसलमान इसे फर्ज समझे, तो हिंदू खिलाफत के काम में मदद दे या न दें, तो भी मुसलमानों को गोवध बंद करना चाहिए। मैंने अपनी तरफ से यह दलील पेश की कि इस तरह दोनों प्रश्नें का विचार स्वतंत्र रीति से किया जाना चाहिए और इसलिए इस सभा में तो सिर्फ खिलाफत के प्रश्न की ही चर्चा मुनासिब है।

सभा को मेरी दलील पसंद पड़ी। गोरक्षा के प्रश्न पर सभा में चर्चा नहीं हुई। लेकिन मौलाना अब्दुलबारी ने कहा, 'हिंदू खिलाफत के मामले में मदद दे चाहे न दे, लेकिन चूँकि हम एक ही मुल्क के रहनेवाले है इसलिए मुसलमानों को हिंदुओं के जज्बात की खातिर गोकुशी बंद करनी चाहिए।' एक समय तो ऐसा मालूम हुआ कि मुसलमान सचमुच गोवध बंद कर देंगे।

कुछ लोगों की यह सलाह थी कि पंजाब के सवाल को भी खिलाफत के साथ जोड़ दिया जाए। मैंने इस विषय में अपना विरोध प्रकट किया। मेरी दलील यह थी कि पंजाब का प्रश्न स्थानीय है, पंजाब के दु:ख की वजह से हम हुक्मत से संबंध रखनेवाले संधिविषयक उत्सव से अलग नहीं रह सकते। इस सिलसिले में खिलाफत के सवाल के साथ पंजाब को जोड़ देने से हम अपने सिर अविवेक का आरोप ले लेंगे। मेरी दलील सबको पसंद आई।

इस सभा में मौलाना हसरत मोहानी भी थे। उनसे मेरी जान-पहचान तो हो ही चुकी थी। पर वे कैसे लड़वैया है, इसका अनुभव मुझे यहीं हुआ। यहीं से हमारे बीच मतभेद शुरू हुआ और कुई मामलों में वह आखिर तक बना रहा।

कई प्रस्तावों में एक प्रस्ताव यह भी था कि हिंदू-मुसलमान सबको स्वदेशी-व्रत का पालन करना चाहिए और उसके लिए विदेशी कपड़े का बहिष्कार करना चाहिए। खादी का पुनर्जन्म अभी नहीं हुआ था। मौलाना हसरत मोहानी को यह प्रस्ताव जँच नहीं रहा था। यदि अंग्रेजी हुकूमत खिलाफत के मामले में इंसाफ न करे, तो उन्हें उससे बदला लेना था। इसलिए उन्होंने सुझाया कि यथासंभव हर तरह के ब्रिटिश माल का बहिष्कार करना चाहिए। मैंने हर तरह के ब्रिटिश माल के बहिष्कार की आवश्यकता और अयोग्यता के बारे में अपनी वे दलीलें पेश की, जो अब सुपरिचित हो चुकी है। मैंने अपनी अहिंसा-वृति का भी प्रतिपादन किया। मैंने देखा कि सभा पर मेरी दलीलों का गहरा असर पड़ा है। हसरत मोहानी की दलीलें सुनकर लोग ऐसा हर्षनाद करते थे कि मुझे लगा, यहाँ मेरी तूती की आवाज कोई नहीं सुनेगा। पर मुझे अपना धर्म चूकना और छिपाना नहीं चाहिए, यह सोचकर मैं बोलने के लिए उठा। लोगों ने मेरा भाषण बहुत ध्यान से सुना। मंच पर तो मुझे संपूर्ण समर्थन मिला और मेरे समर्थन में एक के बाद एक भाषण होने लगे। नेतागण यह देख सके कि ब्रिटिश माल के बहिष्कार का प्रस्ताव पास करने से एक भी हेतु सिद्ध नहीं होगा। हाँ, हँसी काफी होगी। सारी सभा में शायद ही कोई ऐसा आदमी देखने में आता था, जिसके शरीर पर कोई-न-कोई ब्रिटिश वस्तु न हो। इतना तो अधिकांश लोग समझ गए कि जो बात सभा में उपस्थित लोग भी नहीं कर सकते, उसे करने का प्रस्ताव पास होने के लाभ के बदले हानि ही होगी।

मौलाना हसरत मोहानी ने अपने भाषण में कहा, 'हमें आपके विदेशी वस्त्र बहिष्कार से संतोष हो ही नहीं सकता। कब हम अपनी जरूरत का सब कपड़ा पैदा कर सकेंगे और कब विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार होगा? हमें तो ऐसी चीज चाहिए, जिसका प्रभाव ब्रिटिश जनता पर तत्काल पड़े। आपका बहिष्कार चाहे रहे, पर इससे ज्यादा तेज कोई चीज आप हमें बताइए।' मैं यह भाषण सुन रहा था। मुझे लगा कि विदेशी वस्त्र के बहिष्कार के अलावा कोई दूसरी नई चीज सुझानी चाहिए। उस समय मैं यह तो स्पष्ट रूप से जानता था कि विदेशी वस्त्र का बहिष्कार तुरंत नहीं हो सकता। यदि हम चाहें तो संपूर्ण रूप से खादी उत्पन्न करने की शक्ति हममें है, इस बात को जिस तरह मैं बाद में देख सका, वैसे उस समय नहीं देख सका था। अकेली मिल तो दगा दे जाएगी, यह मैं उस समय भी जानता था। जब मौलाना साहब ने अपना भाषण पूरा किया, तब मैं जवाब देने के लिए तैयार हो रहा था।

मुझे कोई उर्दू या हिंदी शब्द तो नहीं सूझा। ऐसी खास मुसलमानों की सभा में तर्कयुक्त भाषण करने का मेरा यह पहला अनुभव था। कलकत्ते में मुस्लिम लीग की सभा में मैं बोला था, किंतु वह तो कुछ मिनटों का और दिल को छूनेवाला भाषण था। पर यहाँ तो मुझे विरुद्ध मतवाले समाज को समझाना था। लेकिन मैंने शरम छोड़ दी थी। मुझे दिल्ली के मुसलमानों के सामने उर्दू में लच्छेदार भाषण नहीं करना था, बल्कि अपनी मंशा टूटीफूटी हिंदी में समझा देनी थी। यह काम मैं भली भाँति कर सका। यह सभा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण थी कि हिंदी-उर्दू ही राष्ट्रभाषा बन सकती है। अगर मैंने अंग्रेजी में भाषण किया होता, तो मेरी गाड़ी आगे न बढ़ती, और मौलाना साहब ने जो चुनौती मुझे दी उसे देने को मौका न आया भी होता और आया भी होता तो मुझे उसका जवाब न सूझता।

उर्दू या हिंदी शब्द ध्यान में न आने से मैं शरमाया, पर मैंने जवाब तो दिया ही। मुझे 'नॉन-कोऑपरेशन' शब्द सूझा। जब मौलाना भाषण कर रहे थे तब मैं यह सोच रहा था कि मौलाना खुद कई मामलों में जिस सरकार का साथ दे रहे है, उस सरकार के विरोध की बात करना उनके लिए बेकार है। मुझे लगा कि जब तलवार से सरकार का विरोध नहीं करना है, तो उसका साथ न देने में ही सच्चा विरोध है। और फलतः मैंने 'नॉन-कोऑपरेशन' शब्द का प्रयोग पहली बार इस सभा में किया। समर्थन में अपनी दलीलें दी। उस समय मुझे इस बात का कोई खयाल न था कि इस शब्द में किन-किन बातों का समावेश हो सकता है। इसलिए मैं तफसील में न जा सका। मुझे तो इतना ही कहने की याद है :

'मुसलमान भाइयों ने एक और भी महत्वपूर्ण निश्चय किया है। ईश्वर न करे, पर यदि कहीं सुलह की शर्तें उनके खिलाफ जाए, तो वे सरकार की सहायता करना बंद कर देगी। मेरे विचार में यह जनता का अधिकार है। सरकारी उपाधियाँ धारण करने अथवा सरकारी नौकरियाँ करने के लिए हम बँधे हुए नहीं है। जब सरकार के हाथों खिलाफत जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक प्रश्न के संबंध में हमें नुकसान पहुँचता है, तब हम उसकी सहायता कैसे कर सकते है? इसलिए अगर खिलाफत का फैसला हमारे खिलाफ हुआ, तो सरकारी सहायता न करने का हमें हक होगा।'

पर इसके बाद इस वस्तु का प्रचार होने में कई महीने बीत गए। यह शब्द कुछ महीनों तक तो इस सभा में ही दबा रहा। एक महीने बाद जब अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तो वहां मैंने असहयोग के प्रस्ताव का समर्थन किया। उस समय तो मैंने यही आशा रखी थी कि हिंदू-मुसलमानों के लिए सरकार के खिलाफ असहयोग करने का अवसर नहीं आएगा।


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