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कविता

देखा मोरे अँगने
आद्याप्रसाद सिंह प्रदीप


(1)

निमियाँ कइ पेड़वा मोहरवा प सरसइ।
अमवाँ के बउरा से रस कन बरसइ।
पेड़ कचनार सोहइ हमरे दुउरवा।
घुरवा पइ फरा थइके कोहँड़ा भुअरवा।
लउकी अउ तोरी-सेम लटकइँ ओरउता।
देखा मोरे अँगने भरी बा सुनरउता।।

 

(2)
 

अँगना मा एक ओर तुलसी कइ बिरवा।
गगरी कइ पनियाँ हराथइ तन-पिरवा।
मटिया कइ दियना अउ घियना कइ बाती।
आरती उतारी तउ जुड़ाय मोरि छाती।।
हउवा झकोरइ जइसे चलथै परउता।
देखा मोरे अँगने भरी बा सुनरउता।।

(3)

 

गइया भँइसिया भरावैं दूध-कछरी।
तलवा तलरिया माँ कूदइँ रोज मछरी।
सरिया मा बछरू, दुअरवा पइ लरिका।
सँझवा सबेरवाँ जपथै, सब हरि का।।
दुख काटइ जड़ी बूटी, जइसे सरउता।।
देखा मोरे अँगने भरी बा सुनरउता।।

 

(4)

कुँअना के पनियाँ मा अमरित धारा।
गंगा कइ नेह भरा वहिमा निहारा।
गेनवाँ गुलाब खिलइ, सजी बा कियारी।
रितुवन कै राजा-रानी सुषमा नियारी।
मन रहइ निरमल, तउ गंगा कठउता।
देखा मोरे अँगने भरी बा सुनरउता।।

 


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