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कविता

भोर
निलय उपाध्याय


सरग के पार नदी में
छप-छप
नहातिया एगो मेहरारू

सोना के थरिया में अछत-दूब लेके
पुरइन के पतई प खाड़ होई
खाड़ होई
महावर से रचल पाँव

घूघ हटाई आ राँभे लागी गाय
घूघ हटाई
आ नाद प दउर जइहें बैल

झाड़ू उठाई
झक-झक साफ करी घर
चूड़ी बजाई... जगाई -
उठऽहो
जाय के बा तहरा
पहाड़ के ओह पार...

 


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हिंदी समय में निलय उपाध्याय की रचनाएँ