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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 3
साहित्य शास्त्र : सिद्धांत और व्यवहार पक्ष

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम प्रेम आनंद स्वरूप है पीछे     आगे

काव्य की उस भूमि में जहाँ आनंद अपनी पूर्णावस्था को प्राप्त दिखाई पड़ता है, प्रवर्तक भाव 'प्रेम' रहता है। इसी भाव के विविधा प्रकार के आलम्बनों और उद्दीपनों का चित्रण इस भूमि के विभाव पक्ष में पाया जाता है। दीप्ति, माधुर्य और कोमलता के नाना रूप यहाँ मिलते हैं। बाहर नयनाभिराम रूपरेखा, विकसित वर्ण वैचित्र्य, विभूति, प्रभूति, चमक दमक, शीतल स्निग्ध छाया; कलकंठ स्वर स्पंदित, सौरभ समन्वित  समीर, स्मित आनन, चपल भू विलास, हास परिहास, संगीत सज्जा, वीणा की झंकार इत्यादि हैं तो भीतर सौन्दर्य की मादक अनुभूति, प्रेमोल्लास स्वप्न, स्मृति विस्मृति, व्रीडा क्रीड़ा, दर्शन पिपासा, उत्कंठा, मुग्धता इत्यादि। 
    इस भूमि के मनस या आभ्यन्तर पक्ष की खाली उलझन हमारे पुराने आचार्य सुलझा गए हैं। यद्यपि प्रेम दशा के भीतर सुखात्मक और दु:खात्मक दोनों प्रकार के भाव पाए जाते हैं; पर कान में 'प्रेमानंद' शब्द ही पड़ता है, 'प्रेमापन्न' नहीं। इससे, प्रेम आनंद स्वरूप है, यह लोकधारणा प्रकट होती है, जो साहित्य मीमांसकों को भी मान्य है। वियोग काल की सारी अश्रुधारा के तल में आनंद की रेखाएँ दिखाई पड़ती रहती हैं। विरह में आनंद नष्ट नहीं हुआ रहता; केवल 'आवृत' रहता है। विरहियों का रोना एक प्रकार हँसना ही है। उनके तीव्र ताप और ज्वाला की जड़ में एक रसमयी शीतलता रहती है। जब तक प्रिय इस जगत् में रहता है, तब तक, कहीं दूर चले जाने पर भी, उसका कहीं पता न रहने पर भी, जो दु:ख और वेदना होती है, वह प्रेम भाव की ही अनुभूति समझी जाती है और साहित्य में विप्रलम्भ ऋंगार के ही अंतर्गत मानी जाती है। 
    बात यह है कि वियोग काल चाहे कितना ही दारुण हो, उसके बीच बीच में मिलने की लालसा जगती रहती है, संयोग की कल्पना के सुख का अनुभव होता रहता है, प्रिय के रूप आदि का ध्‍यान आने पर मन लुब्धा होता रहता है। यह लालसा, यह लुब्धाता आनंद के ढंग की चीज है; दु:ख के ढंग की नहीं। आनंद के रूप में ही प्रेम का उदय होता है और उसका यह रूप भीतर भीतर बराबर बना रहता है। किसी के रूप सौंदर्य और शील सौंदर्य का पहले पहल साक्षात्कार या परिचय होते ही सबसे पहली अनुभूति आनंद की होती है। सबसे पहले हृदय विकसित और लुब्धा होता है। सारांश यह कि प्रेम काल जीवन का आनंद काल ही है। इसी से भक्तगण भक्ति या प्रेम को ही साध्‍य कहा करते हैं। 
    प्रेम वास्तव में 'राग' का ही पूर्ण विकसित रूप है। राग और द्वेष दोनों की स्थिति वासना के रूप में प्रत्येक प्राणी में होती है। वासनात्मक अवस्था में इन दोनों के विषय सामान्य रहते हैं। सामान्यत: सुख देनेवाली या चिरकाल से साथ रहनेवाली वस्तुओं के प्रति राग और दु:ख देनेवाली वस्तुओं के प्रति द्वेष का बीज सबके हृदय क्षेत्र में ढँका रहता है। यही राग जब अंकुरित या व्यक्त होकर किसी व्यक्ति विशेष की ओर पहले पहल उन्मुख होता है, तब 'लुभाना' कहलाता है  और जब उस विशेष में जाकर स्थिर हो जाता है, तब 'प्रेम' कहा जाता है। सीधी बात यह है कि वासनात्मक अवस्था से भावात्मक अवस्था में हुआ आया राग ही 'अनुराग' या प्रेम है। किसी के रूप गुण आदि का उत्कर्ष सुनकर जो 'पूर्वराग' होता है, वह भी उत्‍तेजित 'राग' ही रहता है, प्रेम नहीं। यद्यपि उत्‍तेजना व्यक्ति विशेष के ही उत्कर्ष का परिचय पाकर होती है, पर पूर्व राग की दशा में प्रेम की अनन्यता और पूण्र्ा एकनिष्ठता नहीं रहती, वह पीछे प्राप्त होती है। किसी के प्रति पूर्वराग उत्पन्न होने पर यह संभावना रहती है कि अन्य समय उससे अधिक उत्कर्षवाले किसी दूसरे का परिचय पाकर वह उस पर हो जाय। 
    राग मिलानेवाली वासना है और द्वेष अलग करनेवाली। रासायनिक मूल द्रव्यों के राग से ही पिंड सृष्टि का विकास होता है। राग की अभिव्यक्ति विशेष दाम्पत्य और वात्सल्यभाव में ही होती है जिससे प्राणियों की परंपरा चिरकाल से चलती आ रही है। अत: प्रेम में पालन और रंजन दोनों की प्रवृत्ति प्रत्यक्ष है।
    ('प्रेमा', अप्रैल मई 1932)
[चिन्तामणि, भाग-3]

साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद


 
किसी काव्य का श्रोता या पाठक जिन विषयों को मन में लाकर रति, करुणा, क्रोध, उत्साह इत्यादि भावों तथा सौंदर्य, रहस्य, गांभीर्य आदि भावनाओं का अनुभव करता है, वे अकेले उसी के हृदय से संबंध रखनेवाले नहीं होते; मनुष्य मात्र की भावात्मक सत्ता पर प्रभाव डालनेवाले होते हैं। इसी से उक्त काव्य को एक साथ पढ़ने या सुननेवाले सहस्रों मनुष्य उन्हीं भावों या भावनाओं का थोड़ा बहुत अनुभव कर सकते हैं। जब तक किसी भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यत: सबसे उसी भाव का आलंबन हो सके तब तक उसमें रसोद्बोधान की पूर्ण शक्ति नहीं आती। इसी रूप में लाया जाना हमारे यहाँ 'साधाणीकरण' कहलाता है। यह सिद्धांत यह घोषित करता है कि सच्चा कवि वही है जिसे लोक हृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को देख सके। इसी लोक हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशाहै। 
    किसी काव्य में वर्णित किसी पात्र का किसी कुरूप और दु:शील स्‍त्री पर प्रेम हो सकता है, पर उसी स्‍त्री के वर्णन द्वारा ऋंगार रस का आलंबन नहीं खड़ा हो सकता। अत: ऐसा काव्य केवल भाव प्रदर्शक ही होगा, विभाव विधायक कभी नहीं हो सकता। इसी प्रकार रौद्र रस के वर्णन में जब तक आलंबन का चित्रण इस रूप में न होगा कि वह मनुष्य मात्र के क्रोध का पात्र हो सके, तब तक यह वर्णन भाव प्रधान मात्र रहेगा, उसका विभाव पक्ष या तो शून्य अथवा अशक्त होगा। पर भाव और विभाव दोनों पक्षों के सामंजस्य के बिना पूरी और सच्ची रसानुभूति नहीं हो सकती। केवल भाव प्रदर्शक काव्यों में भी होता यह है कि पाठक या श्रोता अपनी ओर से अपनी भावना के अनुसार आलंबन का आरोप किए रहता है।
    काव्य का विषय सदा 'विशेष' होता है, 'सामान्य' नहीं, वह 'व्यक्ति' सामने लाता है, 'जाति' नहीं। यह बात आधुनिक कला समीक्षा के क्षेत्र में पूर्णतया स्थिर हो चुकी है। अनेक व्यक्तियों के रूपगुण आदि के विवेचन द्वारा कोई वर्ग या जाति ठहराना, बहुत सी बातों को लेकर कोई सामान्य सिद्धांत प्रतिपादित करना, यह सब तर्क और विज्ञान का काम हैनिश्चयात्मिका बुद्धि का व्यवसाय है। काव्य का काम है कल्पना में 'बिम्ब' (lmages) या मूर्त भावना उपस्थित करना, बुद्धि के सामने कोई विचार (Concept) लाना नहीं। 'बिम्ब' जब होगा तब विशेष या व्यक्ति का ही होगा, सामान्य या जाति का नही। । 1
    इस सिद्धांत का तात्पर्य यह है कि शुद्ध काव्य की उक्ति सामान्य तथ्य कथन या सिद्धांत के रूप में नहीं होती। कविता वस्तुओं और व्यापारों का बिम्ब ग्रहण कराने का प्रयत्न करती है, अर्थ ग्रहण मात्र से उसका काम नहीं चलता। बिम्ब ग्रहण जब होगा तब विशेष या व्यक्ति का ही होगा, सामान्य या जाति का नहीं। जैसे, यदि कहा जाय कि क्रोध से मनुष्य बावला हो जाता है तो यह काव्य की उक्ति न होगी। काव्य की उक्ति तो किसी क्रुद्धा मनुष्य के उग्र वचनों और उन्मत्ता चेष्टाओं को कल्पना में उपस्थित भर कर देगी। कल्पना में जो कुछ उपस्थित होगा वह व्यक्ति या वस्तु विशेष ही होगा। सामान्य या 'जाति' की तो मूर्त भावना हो ही नहीं सकती। 2 
    अब यह देखना चाहिए कि हमारे यहाँ विभावन व्यापार में जो 'साधाणीकरण' कहा गया है, उसके विरुद्धा तो यह सिद्धांत नहीं जाता। विचार करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि दोनों में कोई विरोध नहीं पड़ता। विभावादिक साधारणतया प्रतीत होते हैं, इस कथन का अभिप्राय यह नहीं है कि रसानुभूति के समय श्रोता या पाठक के मन में आलंबन आदि विशेष व्यक्ति या विशेष वस्तु की मूर्त भावना के रूप  
 
  1. अभिव्यंजनावाद (Expressionism) के प्रवर्तक क्रोचे (Benedetto Croce) ने कला के बोध   पक्ष और तर्क के बोध पक्ष को इस प्रकार अलग अलग दिखाया है(क़) Intutive knowledge—knowledge obtained through the imagination, knowledge of the individual or individual things. (ख)  Logical knowledge—knowledge obtained through the intellect; knowledge of the universal knowledge of the relations between individual things.                 —Aesthetics by Benedetto Croce.
  2. साहित्य शास्त्र में नैयायिकों की बातें ज्यों की त्यों ले लेने से काव्य के स्वरूप निर्णय में जो बाधा पड़ी है, उसका एक उदाहरण 'शक्तिग्रह' का प्रसंग है। उसके अंतर्गत कहा गया है कि संकेतग्रह 'व्यक्ति' का नहीं होता है, 'जाति' का होता है। तर्क में भाषा के संकेत पक्ष (Symbolic aspect) से ही काम चलता है जिसमें अर्थग्रहण मात्र पर्याप्त होता है। अत: न्याय में तो जाति का संकेतग्रह कहना ठीक है। पर काव्य में भाषा के प्रत्यक्षीकरण (Presentative aspect) से काम लिया जाता है जिसमें शब्द द्वारा सूचित वस्तु का बिंब  ग्रहण होता हैअर्थात् उसकी मूर्ति कल्पना में खड़ी हो जाती है। काव्य मीमांसा के क्षेत्र में न्याय का यह हाथ बढ़ाना डॉ‑सतीशचंद्र विद्याभूषण को भी खटका है। उन्होंने कहा हैIt is however, to be regretted that during the last 500 years the Nyaya has been mixed up with Law, Rhetoric, etc. and thereby has hampered the growth of those branches of knowledge upon which it has grown up as a sort of parasite.
—Introduction (The Nyaya Sutras)
में न आकर सामान्यत: व्यक्ति मात्र या वस्तु मात्र (जाति) के अर्थ संकेत के रूप में आते हैं। 'साधाणीकरण' का अभिप्राय यह है कि पाठक या श्रोता के मन में जो व्यक्ति विशेष या वस्तु विशेष आती है, वह जैसे काव्य में वर्णित 'आश्रय' के भाव का आलंबन होती है, वैसे ही सब सहृदय पाठकों या श्रोताओं के भाव का आलंबन हो जाती है। जिस व्यक्ति विशेष के प्रति किसी भाव की व्यंजना कवि या पात्र  करता है, पाठक या श्रोता की कल्पना में यह व्यक्ति विशेष उपस्थित रहता है। हाँ कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक या श्रोता की मति या संस्कार के कारण वर्णित व्यक्ति विशेष के स्थान पर कल्पना में उसी के समन धर्मवाली कोई मूर्ति विशेष आ जाती है, जैसेयदि किसी पाठक या श्रोता का किसी सुंदरी से प्रेम है तो ऋंगार रस की फुटकल उक्तियाँ सुनने के समय रह रहकर आलंबन रूप में उसकी प्रेयसी की मूर्ति ही उसकी कल्पना में आएगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह कल्पित मूर्ति भी विशेष ही होगीव्यक्ति की ही होगी।
    कल्पना में मूर्ति तो विशेष ही की होगी, पर वह मूर्ति ऐसी होगी जो प्रस्तुत भाव का आलंबन हो सके, जो उसी भाव को पाठक या श्रोता के मन में भी जगाए जिसकी व्यंजना आश्रय अथवा कवि करता है। इससे सिद्ध हुआ कि साधारणीकरण आलंबनत्व धर्म का होता है। व्यक्ति तो विशेष ही रहता है पर उसमें प्रतिष्ठा ऐसे सामान्य धर्म की रहती है जिसके साक्षात्कार से सब श्रोताओं या पाठकों के मन में एक ही भाव का उदय थोड़ा या बहुत होता है। तात्पर्य यह है कि आलंबन रूप में प्रतिष्ठित व्यक्ति समन प्रभाववाले कुछ धार्मों की प्रतिष्ठा के कारण, सबके भावों का आलंबन हो जाता है। 'विभावादि सामान्य रूप में प्रतीत होते हैं'इसका तात्पर्य यही है कि रसमग्न पाठकों के मन में यह भेदभाव नहीं रहता कि यह आलंबन मेरा है या दूसरे का। थोड़ी देर के लिए पाठक या श्रोता का हृदय लोक का सामान्य हृदय हो जाता है। उसका अपना हृदय अलग नहीं रहता। 
    'साधाणीकरण' के प्रतिपादन में पुराने आचार्यों ने श्रोता या पाठक और आश्रय (भाव व्यंजना करनेवाला पात्र) के तादात्म्य की अवस्था का ही विचार किया है जिसमें आश्रय किसी काव्य या नाटक के पात्र के रूप में आलंबन रूप किसी दूसरे पात्र के प्रति किसी भाव की व्यंजना करता है और श्रोता (या पाठक) उसी भाव का रस रूप में अनुभव करता है। पर रस की एक नीची अवस्था और है जिसका हमारे यहाँ के साहित्य ग्रंथों में विवेचन नहीं हुआ है। उसका भी विचार करना चाहिए। किसी भाव की व्यंजना करनेवाला, कोई क्रिया या व्यापार करनेवाला पात्र भी शील की दृष्टि से श्रोता (या दर्शक) के किसी भाव का, जैसेश्रद्धा, भक्ति, घृणा, रोष, आश्चर्य, कुतूहल या अनुराग काअालंबन होता है। इस दशा में श्रोता या दर्शक उसी भाव का अनुभव नहीं करता जिसकी व्यंजना पात्र अपने आलंबन के प्रति करता है, बल्कि व्यंजना करनेवाले उस पात्र के प्रति किसी और ही भाव का अनुभव करता है। यह दशा भी एक प्रकार की रस दशा ही हैयद्यपि इसमें आश्रय के साथ तादात्म्य और उसके आलंबन का साधारणीकरण नहीं रहता, जैसेक़ोई क्रोधी या क्रूर प्रकृति का पात्र यदि किसी निरपराध या दीन पर क्रोध की प्रबल व्यंजनाकर रहा है तो श्रोता या दर्शक के मन में क्रोध का रसात्मक संचार न होगा, बल्किक्रोध प्रदर्शित करनेवाले उस पात्र के प्रति अश्रद्धा, घृणा आदि का भाव जागेगा। ऐसीदशा में आश्रय के साथ तादात्म्य या सहानुभूति न होगी, बल्कि श्रोता या पाठक उक्त पात्र के शील द्रष्टा या प्रकृति द्रष्टा के रूप में प्रभाव ग्रहण करेगा। और यह प्रभाव भी रसात्मक ही होगा पर इस रसात्मकता को हम मध्‍यम कोटि का ही मानेंगे।
    जहाँ पाठक या दर्शक किसी काव्य या नाटक में सन्निविष्ट पात्र या आश्रय के शील द्रष्टा के रूप में स्थित होता है वहाँ भी पाठक या दर्शक के मन में कोई न कोई भाव थोड़ा बहुत अवश्य जगा रहता है। अंतर इतना ही पड़ता है कि उस पात्र का आलंबन पाठक या दर्शक का आलंबन नहीं होता बल्कि वह पात्र पाठक या दर्शक के किसी भाव का आलंबन रहता है। इस दशा में भी एक प्रकार का तादात्म्य और साधारणीकरण होता है। तादात्म्य कवि के उस अव्यक्त भाव के साथ होता है जिसके अनुरूप वह पात्र का स्वरूप संघटित करता है। जो स्वरूप कवि अपनी कल्पना में लाता है उसके प्रति उसका कुछ न कुछ भाव अवश्य ही रहता है। वह उसके किसी भाव का आलंबन अवश्य होता है। अत: पात्र का स्वरूप कवि के जिस भाव का आलंबन रहता है, पाठक या दर्शक के भी उसी भाव का आलंबन प्राय: हो जाता है। जहाँ कवि किसी वस्तु (जैसे हिमालय, विंधयाटवी) या व्यक्ति का केवल चित्रण करके छोड़ देता है वहाँ कवि ही आश्रय के रूप में रहता है। उस वस्तु या व्यक्ति का चित्रण वह उसके प्रति कोई भाव रखकर ही करता है। उसी के भाव के साथ पाठक या दर्शक का तादात्म्य रहता है, उसी का आलंबन पाठक या दर्शक का आलंबन हो जाता है। 
    आश्रय की जिस भाव व्यंजना को श्रोता या पाठक का हृदय कुछ भी अपना न सकेगा, उसका ग्रहण केवल शील वैचित्र्य के रूप में होगा और उसके द्वारा घृणा, विरक्ति, अश्रद्धा, क्रोध, आश्चर्य, कुतूहल इत्यादि में से ही कोई भाव उत्पन्न होकर अपरितुष्ट दशा में रह जाएगा। उस भाव की तुष्टि तभी होगी जब कोई दूसरा पात्र आकर उसकी व्यंजना वाणी और चेष्टा द्वारा उस बेमेल या अनुपयुक्त भाव की व्यंजना करनेवाले प्रथम पात्र के प्रति करेगा। इस दूसरे पात्र की भाव व्यंजना के साथ श्रोता या दर्शक की पूर्ण सहानुभूति होगी। अपरितुष्ट भाव की आकुलता का अनुभव प्रबंध काव्यों, नाटकों और उपन्यासों के प्रत्येक पाठक को थोड़ा बहुत होगा। जब कोई असामान्य दुष्ट अपनी मनोवृत्ति की व्यंजना किसी स्थल पर करता है तब पाठक के मन में बार बार यही आता है कि उस दुष्ट के प्रति उसके मन में जो घृणा या क्रोध है उसकी भरपूर व्यंजना, वचन या क्रिया द्वारा कोई पात्र आकर करता। क्रोधी परशुराम तथा अत्याचारी रावण की कठोर बातों का जो उत्तर लक्ष्मण और अंगद देते हैं उससे कथा श्रोताओं की अपूर्व तुष्टि होती है। 
    इस संबंध में सबसे अधिक ध्‍यान देने की बात यह है कि शील विशेष के परिज्ञान से उत्पन्न भाव की अनुभूति और आश्रय के साथ तादात्म्य दशा की अनुभूति (जिसे आचार्यों ने रस कहा है) दो भिन्न कोटि की रसानुभूतियाँ हैं। प्रथम में श्रोता या पाठक अपनी पृथ्क सत्ता अलग सँभाले रहता है, द्वितीय में अपनी पृथक् सत्ता का कुछ क्षणों के लिए विसर्जन कर आश्रय की भावात्मक सत्ता में मिल जाता है। उदात्त वृत्तिवाले आश्रय की भाव व्यंजना में भी यह होगा कि जिस समय तक पाठक या श्रोता तादात्म्य की दशा में पूर्ण रसमग्न रहेगा उस समय तक भाव व्यंजनाकरने वाले आश्रय को अपने से अलग रखकर उसके शील  आदि की ओर दत्ताचित्त नरहेगा। उस दशा के आगे पीछे ही वह उसकी भावात्मक सत्ता से अपनी भावात्मक सत्ताको अलग कर उसके शील सौंदर्य की भावना कर सकेगा। भाव व्यंजना करनेवाले किसी पात्र या आश्रय के शील सौंदर्य की भावना जिस समय रहेगी, उस समय वही श्रोता या पाठक का आलंबन रहेगा और उसके प्रति श्रद्धा भक्ति या प्रीति टिकी रहेगी।
    हमारे यहाँ के आचार्यों ने श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य दोनों में रस की प्रधानता रखी है, इसी से दृश्य काव्य में भी उनका लक्ष्य तादात्म्य और साधारणीकरण की ओर रहता है। पर यूरोप के दृश्य काव्यों में शील वैचित्र्य या अंत:प्रकृति वैचित्र्य की ओर ही प्रधान लक्ष्य रहता है जिसके साक्षात्कार से दर्शक को आश्चर्य और कुतूहल मात्र की अनुभूति होती है। अत: इस वैचित्र्य पर थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। वैचित्र्य के साक्षात्कार से केवल तीन बातें ही हो सकती हैं
    1. आश्चर्यपूर्ण प्रसादन, 2. आश्चर्यपूर्ण अवसादन, और 3. कुतूहल मात्र।
    आश्चर्यपूर्ण प्रसादन शील के चरम उत्कर्ष अर्थात् सात्तिवक आलोक के साक्षात्कार से होता है। भरत का राम की पादुका लेकर विरक्त रूप में बैठना, राजा हरिश्चंद्र का अपनी रानी से आधा कफन माँगना, नागानंद नाटक में जीमूतवाहनका भूखे गरुड़ से अपना मांस खाने के लिए अनुरोध करना इत्यादि शील वैचित्र्य के ऐसे दृश्य हैं जिनसे श्रोता या दर्शक के हृदय में आश्चर्य मिश्रित श्रद्धा या भक्ति का संचार होता है। इस प्रकार के उत्कृष्ट शील वाले पात्रों की भाव व्यंजना को अपनाकर वह उसमें लीन भी हो सकता है। ऐसे पात्रों का शील विचित्र होने पर भी भाव व्यंजना के समय उनके साथ पाठक या श्रोता का तादात्म्य हो सकताहै।
    आश्चर्यपूर्ण अवसादन शील के अत्यंत पतन अर्थात् तामसी घोरता के साक्षात्कार से होता है। यदि किसी काव्य या नाटक में हूण सम्राट मिहिरकुल पहाड़ की चोटी पर से गिराए जाते हुए मनुष्य के तड़पने, चिल्लाने आदि की भिन्न भिन्न चेष्टाओं पर भिन्न भिन्न ढंग से आह्लाद की व्यंजना करे तो उसके आह्लाद में किसी श्रोता या दर्शक का हृदय योग न देगा बल्कि उसकी मनोवृत्ति की विलक्षणता और घोरता पर स्तम्भित, क्षुब्धा या कुपित होगा। इसी प्रकार दु:शीलता की और और विचित्रताओं के प्रति श्रोता की आश्चर्य मिश्रित विरक्ति, घृणा आदि जगेगी।
    जिन सात्तिवकी और तामसी प्रकृतियों की चरम सीमा का उल्लेख ऊपर हुआ है। सामान्य प्रकृति से उनकी आश्चर्यजनक विभिन्नता केवल उनकी मात्रा में होती है। वे किसी वर्ग विशेष की सामान्य प्रकृति के भीतर समझी जा सकती है, जैसे भरत आदि की प्रकृति शीलवानों की प्रकृति के भीतर और मिहिरकुल की प्रकृति क्रूरों की प्रकृति के भीतर मानी जा सकती है। पर कुछ लोगों के अनुसार ऐसी अद्वितीय प्रकृति भी होती है जो किसी वर्ग विशेष की भी प्रकृति के भीतर नहीं होती। ऐसी प्रकृति के साक्षात्कार से न स्पष्ट प्रसादन होगा, न स्पष्ट अवसादनएक प्रकार का मनोरंजन या कुतूहल ही होगा। ऐसी अद्वितीय प्रकृति के चित्रण को डंटन (Theodore Watts Danton) ने कवि की नाटकीय या निरपेक्ष दृष्टि (Dramatic or absolute Vision) का सूचक और काव्यकला का चरम उत्कर्ष कहा है। उनका कहना है कि साधारणत: कवि या नाटककार भिन्न भिन्न पात्रों की उक्तियों की कल्पना अपने ही को उनकी परिस्थिति में अनुमन करके किया करते हैं। वे वास्तव में यह अनुमन करते हैं कि यदि हम उनकी दशा में होते तो कैसे वचन मुँह से निकालते। तात्पर्य यह है कि उनकी दृष्टि सापेक्ष होती है, वे अपनी ही प्रकृति के अनुसार चरित्र चित्रण करते हैं। पर निरपेक्ष दृष्टिवाले नाटककार एक नवीन नर प्रकृति की सृष्टि करते हैं। नूतन निर्माणवाली कल्पना उन्हीं की होती है।
    डंटन ने निरपेक्ष दृष्टि को उच्चतम शक्ति तो ठहराया पर उन्हें संसार भर में दो ही तीन कवि उक्त दृष्टि से संपन्न मिले जिनमें मुख्य शेक्सपियर हैं। पर शेक्सपियर के नाटकों में कुछ विचित्र अंत:प्रकृति के पात्रों के होते हुए भी अधिकांश ऐसे पात्र हैं जिनकी भाव व्यंजना के साथ पाठक या दर्शक का पूरा तादात्म्य रहता है। 'जूलियस सीजर' नाटक में अंटोनियो के लंबे भाषण से जो क्षोभ उमड़ा पड़ता है उसमें किसका हृदय योग न देगा? डंटन के अनुसार शेक्सपियर की दृष्टि की निरपेक्षता के उदाहरणों में हैमलेट का चरित्र चित्रण है। पर विचारपूर्वक देखा जाए तो हैमलेट की मनोवृत्ति भी ऐसे व्यक्ति की मनोवृत्ति है जो अपनी माता का घोर विश्वासघात और जघन्य शीलच्युति देख अर्ध्दविक्षिप्त सा हो गया हो। परिस्थिति के साथ उसके वचनों  का सामंजस्य उसकी बुद्धि की अवस्था का द्योतक है। अत: उसका चरित्र भी एक वर्ग विशेष के चरित्र के भीतर आ जाता है। उसके बहुत से भाषणों को प्रत्येक सहृदय व्यक्ति अपनाता है। उदाहरण के लिए आत्मग्लानि और क्षोभ से भरे हुए वे वचन जिनके द्वारा वह स्‍त्री जाति की भर्त्सना करता है। अत: हमारे देखने में ऐसी मनोवृत्ति का प्रदर्शन जो किसी दशा में किसी की हो ही नहीं सकती, केवल ऊपरी मनबहलाव के लिए खड़ा किया हुआ कृत्रिम तमाशा ही होगा। पर डंटन साहब के अनुसार ऐसी मनोवृत्ति का चित्रण नूतन सृष्टिकारिणी कल्पना का सबसे उज्ज्वल उदाहरण होगा। 
    'नूतन सृष्टि निर्माणवाली कल्पना' की चर्चा जिस प्रकार यूरोप में चलती आ रही है, उसी प्रकार भारतवर्ष में भी। पर हमारे यहाँ यह कथन अर्थवाद के रूप मेंक़वि और कवि कर्म की स्तुति के रूप में ही गृहीत हुआ, शास्‍त्रीय सिद्धांतया विवेचन के रूप में नहीं। यूरोप में अलबत यह एक सूत्र सा बनकर काव्य समीक्षा के क्षेत्र में भी जा घुसा है। इसके प्रचार का परिणाम वहाँ यह हुआ कि कुछ रचनाएँइस ढंग की भी हो चलीं जिनमें कवि ऐसी अनुभूतियों की व्यंजना की नकल करताहै जो न वास्तव में उसकी होती हैं और न किसी की हो सकती हैं। इस नूतन सृष्टि निर्माण के अभिनय के बीच 'दूसरे जगत् के पंछियों' की उड़ान शुरू हुई। शेली के पीछे पागलपन की नकल करनेवाले बहुत से खड़े हुए थे; वे अपनी बातों का ऐसा रूप रंग बनाते थे जो किसी और दुनिया का लगे या कहीं का न जान पड़े। 1
    यह उस प्रवृत्ति का हद से बाहर पहुँचा रूप है, जिसका आरंभ यूरोप में एक प्रकार से पुनरुत्थान काल (Renaissance) के साथ ही हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि उस काल के पहले के काव्य की रचना काल को अखंड अनंत और भेदातीत मनकर तथा लोक को एक सामान्य सत्ता समझकर की जाती थी। रचना करनेवाले यह ध्‍यान रखकर नहीं लिखते थे कि इस काल के आगे आनेवाला काल कुछ और प्रकार का होगा अथवा इस वर्तमन काल का स्वरूप सर्वत्रा एक ही नहीं है क़िसी जन समूह के बीच पूर्ण सभ्य काल है, किसी के बीच उससे कुछ कम, किसी जन समुदाय के बीच कुछ असभ्य काल है, किसी के बीच उससे बहुत अधिक। इसी प्रकार उन्हें इस बात की ओर ध्‍यान देने की आवश्यकता नहीं होती थी कि लोक भिन्न भिन्न व्यक्तियों से बना होता है जो भिन्न भिन्न रुचि और प्रवृत्ति के होते हैं। 'पुनरुत्थान काल' से धीरे धीरे इस तथ्य की ओर ध्‍यान बढ़ता गया प्राचीनों की भूल प्रकट होती गई। अंत में इशारे पर ऑंख मूँदकर दौड़नेवाले बड़े बड़े पंडितों ने पुनरुत्थान की कालधारा को मथकर 'व्यक्तिवाद' रूपी नया रत्न निकाला। फिरक्याथा? शिक्षित समाज में व्यक्तिगत विशेषताएँ देखने दिखाने की चाह बढ़ने लगी।  
   1. After Shelley's music began to captivate the world certain poets set to work upon the theory that between themselves and the other portion of the human race, there is a wide gulf fixed. Their theory was that they were to sing, as far as possible, like birds of another world. It might also be said that the poetic atmosphere became that of the supreme place of wonder.
—Bedlam
           Bailey Dobell and Smith were not Bedlamites,  but men of common sense. They only affected madness. The country from which the followers of Shelly sing to our lower world was named "Nowhere’’.
–Poetry and Rennaissance of wonder by Theodte watts Dunton.
    काव्यक्षेत्र में किसी 'वाद' का प्रचार धीरेधीरे उसकी सारसत्ता को ही चर जाता है। कुछ दिनों में लोग कविता न लिखकर 'वाद' लिखने लगते हैं। कला या काव्य के क्षेत्र में, 'लोक' और 'व्यक्ति' की उपर्युक्त धारणा कहाँ तक संगत है, इस पर थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। लोक के बीच जहाँ बहुत सी भिन्नताएँ देखने में आती हैं, वहाँ कुछ अभिन्नताएँ भी पाई जाती हैं। एक मनुष्य की आकृति से दूसरे मनुष्य की आकृति नहीं मिलती, पर सब मनुष्यों की आकृतियों को एक साथ लें तो एक ऐसी सामान्य आकृति भावना भी बँधती है जिसके कारण हम सबको मनुष्य कहते हैं। इसी प्रकार सबकी रुचि और प्रकृति में भिन्नता होने पर भी कुछ ऐसी अंतर्भूतियाँ हैं जहाँ पहुँचने पर अभिन्नता मिलती है । वे अंतर्भूतियाँ नर समष्टि की रागात्मिका प्रकृति के भीतर हैं। लोक हृदय की यह सामान्य अंतर्भूमि परखकर हमारे यहाँ 'साधाणीकरण' सिद्धांत की प्रतिष्ठा की गई है। वह सामान्य अंतर्भूमि कल्पित या कृत्रिम नहीं है। काव्य रचना की रुढ़ि या परंपरा, सभ्यता के न्यूनाधिाक विकास, जीवन व्यापार के बदलनेवाले बाहरी रूप रंग इत्यादि पर यह स्थित नहीं है, इसकीनींवगहरीहै। इसका संबंध हृदय के भीतरी मूल देश से है, उसका सामान्य वासनात्मक सत्ता सेहै। 
    जिस 'व्यक्तिवाद' का ऊपर उल्लेख हुआ है, उसने स्वच्छंदता के आंदोलन (Romantic Movement)के उत्तरकाल से बड़ा ही विकृत रूप धारण किया। यह 'व्यक्तिवाद' यदि पूर्ण रूप से स्वीकार किया जाए तो कविता लिखना व्यर्थ ही समझिए। कविता इसीलिए लिखी जाती है कि एक ही भावना सैकड़ों, हजारों क्या लाखों दूसरे आदमी ग्रहण करें। जब एक के हृदय के साथ दूसरे के हृदय की कोई समनता ही नहीं, तब एक के भावों को दूसरा क्यों और कैसे ग्रहण करेगा? ऐसी अवस्था में तो यही संभव है कि हृदय द्वारा मार्मिक या भीतरी ग्रहण की बात ही छोड़ दी जाए, व्यक्तिगत विशेषता के वैचित्र्य द्वारा ऊपरी कुतूहल मात्र उत्पन्न कर देना ही बहुत समझा जाए, हुआ भी यही। और हृदयों से अपने हृदय की भिन्नता और विचित्रता दिखाने के लिए बहुत से लोग एक एक काल्पनिक हृदय निर्मित करके दिखाने लगे। काव्यक्षेत्र 'नकली हृदयों' का एक कारखाना हो गया। 
    ऊपर जो कुछ कहा गया उससे जान पड़ेगा कि भारतीय काव्य दृष्टि भिन्न भिन्न विषयों के भीतर से 'सामान्य' उद्धाटन की ओर बराबर रही है। किसी न किसी 'सामान्य' के प्रतिनिधि होकर ही 'विशेष' हमारे यहाँ के काव्यों में आते रहे हैं। पर योरपीय काव्य दृष्टि इधर बहुत दिनों से विरल विशेष के विधान की ओर रही है। हमारे यहाँ कवि उस सच्चे तार की झंकार सुनाने में ही संतुष्ट रहे जो मनुष्य मात्र के हृदय के भीतर से होता हुआ गया है। पर उन्नीसवीं शताब्दी के बहुत से विलायती कवि ऐसे हृदयों के प्रदर्शन में लगे जो न कहीं होते हैं और न हो सकते हैं। सारांश यह है कि हमारी वाणी भावक्षेत्र के बीच 'भेदों के अभेद' को ऊपर करती रही और उनकी वाणी झूठे सच्चे विलक्षण भेद खड़े करके लोगों को चमत्कृत करने में लगी।
    'कल्पना' और 'व्यक्तिवाद' की पाश्चात्य समीक्षा क्षेत्र में इतनी अधिक मुनादी हुई कि काव्य के और सब पक्षों से दृष्टि हटकर इन्हीं दो पर जा जमी। 'कल्पना' काव्य का बोधपक्ष है। कल्पना में आई हुई रूप व्यापार योजना का कवि या श्रोता को अंत:साक्षात्कार या बोध होता है। पर इस बोधपक्ष के अतिरिक्त काव्य का भावपक्ष भी है। कल्पना को रूप योजना के लिए प्रेरित करनेवाले और कल्पना में आई हुई वस्तुओं में श्रोता या पाठक को रमानेवाले रति, करुणा, क्रोध, उत्साह, आश्चर्य इत्यादि भाव या मनोविकार होते हैं। इसी से भारतीय दृष्टि ने भावपक्ष को प्रधानता दी और रस के सिद्धांत की प्रतिष्ठा की। पर पश्चिम में 'कल्पना', 'कल्पना' की पुकार के सामने धीरे धीरे समीक्षकों का ध्‍यान भावपक्ष से हट गया और बोधपक्ष पर ही भिड़ गया। काव्य की रमणीयता उस हलके आनंद के रूप में ही मानी जाने लगी जिस आनंद के लिए हम नई नई, सुंदर, भड़कीली और विलक्षण वस्तुओं को देखने जाते हैं। इस प्रकार कवि तमाशा दिखानेवाले के रूप में और श्रोता या पाठक तटस्थ तमाशबीन के रूप में समझे जाने लगे। केवल देखने का आनंद कुछ विलक्षण को देखने का कुतूहल मात्र होताहै।
    'व्यक्तिवाद' ही को ले उड़ने से जो परिणाम हुआ है उसका कुछ आभास ऊपर दिया जा चुका है। 'कल्पना' और 'व्यक्तित्व' पर एकदेशीय दृष्टि रखकर पश्चिम में कई प्रसिद्ध 'वादों' की इमारतें खड़ी हुईं। इटली निवासी क्रोसे (Benedetto Croce) ने अपने 'अभिव्यंजनावाद' के निरूपण में बड़े कठोर आग्रह के साथ कला की अनुभूति को ज्ञान या बोध स्वरूप ही माना है। उन्होंने उसे स्वयंप्रकाश ज्ञान (Intuition) प्रत्यक्ष ज्ञान तथा बुद्धि व्यवसाय सिद्ध या विचारप्रसूत ज्ञान से भिन्न केवल कल्पना में आई हुई वस्तु व्यापार योजना का ज्ञान मात्र माना है। वे इस ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान और विचार प्रसूत ज्ञान दोनों से सर्वथा निरपेक्ष स्वतंत्र और स्वत: पूर्ण मनकर चले हैं। वे इस निरपेक्षता को बहुत दूर तक घसीट ले गए हैं। भावों या मनोविकारों तक को उन्होंने काव्य की उक्ति का विधायक अवयव नहीं माना है। पर न चाहने पर भी अभिव्यंजना या उक्ति के अनभिव्यक्त पूर्व रूप में भावों की सत्ता उन्हें स्वीकार करनी पड़ी है। उससे अपना पीछा वे छुड़ा नहीं सके है। । 1
    काव्य समीक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति की ऐसी दीवार खड़ी हुई, 'विशेष' के स्थान पर सामान्य या विचार सिद्ध ज्ञान के आ घुसने का इतना डर समाया कि कहीं कहीं आलोचना भी काव्य रचना के ही रूप में होने लगी। कला की कृति की परीक्षा केलिए विवेचन पद्धाति का त्याग सा होने लगा। हिन्दी की मासिक पत्रिकाओं में समालोचना  
     1.   Matter is emotivity not aesthetically elaborated  i.e. impression. Form is elaboration and expression...Sentiments or impressions pass by means of words from the obscure region of the Soul into the clarity of the contemplative spirits.
—Aesthetic
के नाम पर आजकल जो अद्भुत और रमणीय शब्द योजना मात्र कभी कभी देखने में आया करती है, वह इसी पाश्चात्य प्रवृत्ति का अनुकरण है। पर यह भी समझ रखना चाहिए कि यूरोप में साहित्य संबंधी आंदोलनों की आयु बहुत थोड़ी होती है। कोई आंदोलन दस बारह वर्ष से ज्यादा नहीं चलता। ऐसे आंदोलनों के कारण वहाँ इस बीसवीं शताब्दी में आकर कार्यक्षेत्र के बीच बड़ी गहरी गड़बड़ी और अव्यवस्था फैली। काव्य की स्वाभाविक उमंग के स्थान पर नवीनता के लिए आकुलता मात्र रह गई। कविता चाहे हो, चाहे न हो, कोई नवीन रूप या रंग ढंग अवश्य खड़ा हो। पर कोरी नवीनता केवल मरे हुए आंदोलन का इतिहास छोड़ जाए तो छोड़ जाए, कविता नहीं खड़ी कर सकती। केवल नवीनता और मौलिकता की बढ़ी चढ़ी सनक में सच्ची कविता की ओर ध्‍यान कहाँ तक रह सकता है? कुछ लोग तो नए नए ढंग की उच्छृंखलता, वक्रता, असंबद्धाता, अनर्गलता इत्यादि का ही प्रदर्शन करने में लगे। थोड़े से ही सच्ची भावनावाले कवि प्रकृति मार्ग पर चलते दिखाई पड़ने लगे। समालोचना की अधिकतर हवाई ढंग से होने लगी। 1
    यूरोप में इधर पचास वर्ष के भीतर 'रहस्यवाद', 'कलावाद', 'व्यक्तिवाद' इत्यादि जो अनेक 'वाद' चले थे, वे अब वहाँ मरे हुए आन्दोलन समझे जाते हैं। इन नाना 'वादों' से ऊबकर लोग अब फिर साफ हवा में आना चाहते हैं। किसी कविता के संबंध में किसी 'वाद' का नाम लेना अब फैशन के खिलाफ माना जाने लगा है। अब कोई वादी समझे जाने में कवि अपना मन नहीं समझते। 2
(द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथावली 1933 ई.)
[चिन्तामणि भाग-1]
 
 
      1   Wherever attempts at sheer newness in poetry were made, they merely ended in dead movements...Cricism became more dogmatic and unreal, poetry more eccentric and chastic.
—"A Survey of Modernist poetry" by Laura Riding and Robert Graves (1927)
     2.   The modernist poet does not have to issue a programme declaring his intentions toward the reader or to issue an announcement of tactics. He does not have to call himself an individualist (as the Imagist poet did) or a mystic (as the poet of Anglo-lrish dead movement did) or a naturalist (as the poet of the Georgian dead movement did).        —Ibid


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