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कविता

कहाँ समाए मैलापन
सुरजन परोही


नदियों का मीठा पानी
समुद्र में समाकर-खारा
नदियाँ - समुद्र-बीच
मैली होती गईं

दुनिया अपना मैला
साफ करते-करते
नदियों को मैला करती रही

हम सब
सूरीनाम के होते हुए भी
सरनामी नहीं
भारतीय हैं -

देश, धर्म, जाति के
मैले से हम-सब सने हुए हैं
फिर चाहे
जिस जाति और धर्म के हों
मतभेद हमारा मैला है

 


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