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कविता

मेरे घर में है घोर अँधेरा
सुरजन परोही


जलता है मेरा टूटा हुआ दिल
वही बन के आँसू निकल रही है
मेरे घर में है घोर अँधेरा
चिराग औरों की महफिल में जल रहे हैं

जिन चरणों में शीश झुकाया
वही चरण कुचल दिया मुझे
मिला केवल धोखा ही धोखा
हम उसी के इशारों पर चल रहे हैं

कब जवानी आई कब बुढ़ापा
हमेशा आँसू पीकर जीते रहे
जब हँसने की बारी आई
तो देखा कि दिन ढल रहा है

जिन के आगे हाथ बढ़ाया
उसने मेरा हाथ ही काट दिया
आते वक्त ये भी न बोल सके
कि हम दोनों हाथ मल रहे हैं

आकाश को काले बादल ढँकने जा रहे
अनादर के बोझ से धरती का हो रहा पतन
सत्पुरूषों और सद्ग्रंथों के प्रति उपेक्षा नहीं
दुराचरणों ने रुतार की तेजी से घेरा है वतन

सदाचरण और सद्व्यवहार से कोसों दूर है
क्षीण होने का पथ, हमारी नजरों से दूर नहीं
मंदिर तीर्थ स्थान और श्रेष्ठ परंपरा
प्रलय सागर की लहरों से अब दूर नहीं

सांत्वना का मार्ग, धर्म-संस्कृति, मान-सम्मान
विश्वास के कंधों पर चढ़कर नीति विरुद्ध चलते हैं
इस धरती पर घोर अंधकार का पर्दा डालकर
कल्याण कारक साधनों को धीरे-धीरे कुचलते हैं

मत भूल, अपनी आँखों से अपनी करतूत देख
भोला है तू, बरबाद करने के बाद, खुद बरबाद हो जाता है
देशभक्ति धर्म को रसातल की ओर ढकेलकर
दुखगर्जी के बाजारों में, खुद सस्ते में बिक जाता है

 


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