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कविता

दुनियावालों को राह दिखाता चल
सुरजन परोही


         चल चल चल चल, सूरज तू चल
         दुनियावालों को राह दिखाता चल

सुबह शाम होता जा रहा
कितने अभी तक ठोकर खा रहा
मरते दम तक आँसू बहा रहा
कितने अपनी जान गँवा रहा
क्या इसी को बलिदान कहते, तो न देखा आनेवाला कल

          चल चल चल चल, सूरज तू चल
          दुनियावालों को राह दिखाता चल

हमें लड़ना है तो हम लड़ेंगे
जीना है तो सुख से जिएँगे
अपने अधिकार पर मर मिटेंगे
बैर किसी से कभी न करेंगे
तमाम जातियों में रहते, कमर कसकर तू जा सँभल

          चल चल चल चल, सूरज तू चल
          दुनियावालों को राह दिखाता चल

कुत्ता बिल्ली की आँखें खुल जाती हैं
हमार आँख खुली, पर देख न पाते हैं
सीना तानकर वह इठलाते हैं
और सूरज पर मिथ्या आरोप लगाते हैं
कीचड़ में वर्षों से पड़ा, अब से छोड़ दे वह दल-दल

          चल चल चल चल, सूरज तू चल
          दुनियावालों को राह दिखाता चल

 


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