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कविता

कोयल की मीठी बोली
सुरजन परोही


कोयल की मीठी बोली
हम समझ नहीं पाते
कौए की तीखी बोली से
हम तो रूठ नहीं जाते

सबकी अपनी-अपनी बोली
अपनी-अपनी अस्मिता है
यही शक्ति से तो आज
सभ्यता धर्म संस्कृति टिकी है

हम भारती तो नहीं
लेकिन बीज वहीं का है
सूरीनाम के वातावरण में पला
वेदों का ज्ञान वहीं का है

 


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