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कविता

बड़ा विनिमय
अशोक गुप्ता


दो व्यक्तियों के बीच में
एक
न्यूनतम दूरी तय करने वाला शब्द है,
'आप'।

इस शब्द में तय है
बस सरसरी निगाह से देखने की अनुमति,
छूना इस में मना है
छू कर भीगना, असंभव।
मैंने आजीवन
अपने पिता को 'आप' ही कहा
और, करता रहा यह प्रण अपने आपसे
कि

मेरे बच्चे हमेशा
मुझे तुम ही कहेंगे,
तुम ही कहेगी मुझसे मेरी पत्नी
ठीक वैसे ही
जैसे आजन्म
मैं कहता रहा अपनी माँ को,
'तुम',
छूता रहा, और भीगता रहा,
उसके चले जाने के बरसों बाद भी।

मेरा एक मित्र है,
मैं पढ़ता हूँ उसके चेहरे पर अक्सर एक अस्वीकार
मेरे उसे तुम कहे जाने पर,
लेकिन मैं क्या करूँ
एक दोस्त गँवा कर
बदले में
एक काम का आदमी जुटा लेना
मुझे घाटा लगता है।
आखिर तब काम बन जाने पर
मैं किसके सामने ठठाऊँगा
अभी,
काम न बनने पर
मैं रो तो सकता हूँ उस 'तुम' की परिधि में,
भीग तो सकता हूँ।

आप कह कर
शब्द विनिमय कर लेने के बाद
पलट कर चल देना
कोई चिह्न नहीं छोड़ता,
न हर्ष
न विषाद,
तुम कह कर तुम सुनना
बड़ा विनिमय होता है।

 


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