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कविता

बंद मुट्ठी वाले लोग
अशोक गुप्ता


सबकी मुट्ठियाँ अभी तक बंद हैं
जैसे
वह अभी अभी पैदा हुए हों,
अभी अभी पैदा होना कोई बुरी बात नहीं है,

जब मैं जूते पहन रहा था
घर से निकल कर बाहर जाने के लिए
जूते के भीतर से निकल आया था
एक
बड़ा सा कॉकरोच,
उसे देख कर अचानक कौन चीखा था ?
किसे शक हुआ था,
जूते के भीतर से खुद के ही बाहर आने का।

उस शाम
फिर किसी ने मुझसे कोई बात नहीं की थी
तब भी नहीं,
जब मैंने पहन ली थी उल्टी कमीज
और यह सबने देखा था।
क्या यह, उनकी
मुट्ठियाँ बंद होने का असर था...?

शोर से,
मैं भी घबराता हूँ उन्हीं की तरह
लेकिन
मेरी घबराहट का कारण जरा फर्क है
मुझे
यह थोड़ी लगता है, कि शोर से
आस्तीन के भीतर का साँप जाग जाएगा
बल्कि, मैं तो कहता हूँ
कि शोर से, उस साँप को ढाँपा जा सकता है।

बंद मुट्ठी वाले लोग,
ठहाका नहीं लगा सकते
कभी नहीं पहन सकते,
उल्टी कमीज
कभी नहीं सोच सकते, कि क्या हर्ज है, अगर
किसी स्त्री के साथ बैठ कर दारू पी ली जाय
उनके शब्दकोष में बहुत से शब्द
दर्ज नहीं भी होते शायद
स्त्री... साथ...
इन जैसे शब्दों के गिने-चुने अर्थ, उनकी मुट्ठी में होते है।

कौन जाने,
और न जाने क्या क्या होगा
उनकी बंद मुट्ठियों में...

 


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