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कविता

चाह रहा हूँ
भरत प्रसाद


सौ-सौ चेहरे मेरे मुँह पर
सौ-सौ कातिल मेरी आँखें,
साँस-साँस में मेरे भीतर,
सौ-सौ विष का ज्वार उमड़ता।
खुद से खुद की ढोल पीटता
खुद से खुद की पीठ ठोंकता,
खुद ही अपनी ठकुरसुहाती
चित भी मेरी, पट भी मेरी।

रोएँ जितने खूनी काँटे
मन में प्रतिदिन पनप रहे हैं,
विषधर बुद्धि कुंडली मारे
पसर रही है खाली सिर में
चाह रहा हूँ, खुद को काटूँ
खुद को मोड़ूँ, खुद को तोड़ूँ,
खुद ही खुद में आग लगा दूँ
खुद को खुद से दूर भगा दूँ।

चाह रहा हूँ खुद को मारूँ
खुद को पीटूँ, खुद को जीतूँ,
नोंचनाच लूँ अपना चेहरा,
खुद से खुली बगावत कर दूँ।।

 


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