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कविता

पसीने की एक-एक बूँद
भरत प्रसाद


मेरी आँखों में वह प्यास कहाँ ?
जो बूढ़ी नदी की तरह बहती हुई,
तुम्हारी आँखों का दुख छक कर पी जाए;
इन पुतलियों में मचलती हुई वह बेचैनी कहाँ ?
जो तुम्हारे चेहरे की सख्त लकीरों को देखते ही
दुनिया में कोहराम मचा दे;
अरे, धिक्कार है,
मुझमें तो इतनी भी वेदना शेष नहीं
कि औरत होने के बावजूद
तुम्हारे चट्टानी चेहरे की मानवता को श्रद्धांजलि दे सके।
जबकि देखता हूँ
जगह-बेजगह मुड़-तुड़ गई तुम्हारी शरीर
अपनी भयावह दुर्बलता के बावजूद
मर्दानों जैसी हिम्मत रखती है,
तुम्हारे मुख-मंडल पर सदियों का संताप विलाप करता है,
अंदर ही अंदर
ऐंठकर सूख गई अँतड़ियाँ
क्या तुम्हारी लाचारी का इतिहास बताने के लिए
काफी नहीं ?
आधे से भी आधा पेट खाकर
खून-पसीना एक करने का मुहावरा
आखिर किसके जीवन पर लागू होता है ?
तुम्हारे जीवन को उजड़ा हुआ बंजर प्रदेश
शरीर को जलता हुआ मकान
और आत्मा को, अंधकार में भटक-भटक कर
मर जाने वाला घायल पंक्षी
कौन बनाता है ?
किससे पूछूँ ?
तुम इस समय के लिए हो जरूर,
मगर अफसोस !
यह समय तुम्हारा नहीं है -
इस व्यापारी दौर में जिंदा रहने का
यदि कोई मतलब है, तो सिर्फ इतना ही कि
अपने दोनों हाथ, दोनों पैर और उन्मुक्त मस्तक ही नहीं,
इंकार कर देने वाली आत्मा की भी

चुपचाप गिरवी रख दो।
अपने दिल पर हाथ रखकर कहो कि
चौबीस घंटे में कुछ पल के लिए ही सही
सिर्फ अपने लिए जीती हो, अपने लिए मरती हो,
झूठ-मूठ का ही सही
अपने स्त्री होने पर गर्व करती हो,
और अगाध विश्वास के साथ
दावा कर सकती हो कि
तुम्हारे बगैर मानवता की एक आँख अंधी है।
जी तो करता है
तुम्हें तुम्हारी जगह से हटा दूँ
बहुत पहले से लिखा-लिखाया
तुम्हारा पता-ठिकाना मिटा दूँ
हमेशा के लिए नष्ट कर दूँ - तुम्हारी पुरानी पहचान,
अब पता चला कि यह 'स्त्री' शब्द
आँसुओं में डूबी हुई गुलामी का दूसरा नाम क्यों है ?
उखाड़ फेंको वे सारे संबोधन,
जो तुम्हें तुम्हारे औरतपन से बाहर नहीं निकलने देते,
धूसर चमड़ी पर बहती हुई
पसीने की एक-एक बूँद की कीमत वसूलना
तुम्हें कब आएगा ?
जबकि सारी दुनिया को पता है कि
'सर्वजनहिताय' अपना पसीना नहीं, खून बहाने वाला इनसान
पृथ्वी का सबसे कीमती इनसान होता है।

 


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