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कविता

गंगा का बनारस
भरत प्रसाद


'जन-जन में श्रद्धा से गंगा मैया कही जाने वाली नदी का चेहरा आज पहचानने लायक नहीं रह गया है।'
पछाड़ खा-खाकर
रात-दिन,
खून के आँसू रोती
अँचरा पसार कर प्राण की भीख माँगती
जहर का घूँट पी-पीकर
मौत के एक-एक दिन गिनती;
गूँगी पराजय की मूर्ति बन गई है गंगा
अरे ! तुम्हारे छूते ही गंगा का पानी
काला क्यों हो जाता है ?
तुम्हारे पास जाते ही
गंगा काँपने क्यों लगती है ?
तुम्हारे नहाते-नहाते
गंगा के विषाक्त हो जाने का रहस्य
अब समझ में आया,
तुमने कैसा प्रेम किया ?
कि भीतर-भीतर सड़ गई है गंगा
तुमने कैसी पूजा की ?
कि जन्म-जन्मांतर के लिए दासी बन गई,
तुमने कैसी श्रद्धा की ?
कि मर रही है नदी
कितना भयानक साबित हुआ, तुम्हारा उसे माँ कहना ?
कितना उल्टा पड़ गया, गंगा का माँ होना ?
सिद्ध हो चुका है तुम पर, नदियों की हत्या का इतिहास
यह नदी है या कोई और ?
जो मात खा-खाकर भी
धैर्य खोने का कभी नाम ही नहीं लेती,
पी जाती है हलाहल अपमान,
सह जाती है, अपने पानी का 'पानी उतर जाना'
छिपा जाती है तरंगों में, हाहाकारी विलाप
आखिर यह है कौन ?
जो मर-मिटकर भी
करोड़ों शरीर में प्राण सींचती है;
सदियों से गंगा बनारस के लिए जीती है,

काश, गंगा के लिए बनारस चार दिन भी जी लेता
बनारस बसा हुआ है, गंगा की आत्मा में
मिट्टी में धँसे हुए बरगद के मानिंद
मगर देखो तो
बनारस के लिए गंगा की हैसियत
अहक-अहक कर जीती हुई
बीमार बुढ़िया से भी बदतर है
समूचे शहर का दुख-दर्द धो डालने के लिए
गंगा के पास आँसू ही आँसू हैं,
मगर बनारस की आँखों में
गंगा के लिए आँसुओं का अकाल ही अकाल
रो सको तो जी भर कर रो लेना,
शायद तुम्हारे माथे पर लगा हुआ
गंगा की हत्या का ऐतिहासिक कलंक
थोड़ा-बहुत धुल जाय।

 


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