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कविता

मेरी माटी ! तुझे कैसे पाऊँ ?
भरत प्रसाद


तुम्हारे इतने पास रहकर
और पास आने की अकथ बेचैनी के बावजूद
कितना दूर रह जाता हूँ तुमसे ?
बचपन से आज तक तुम्हारे सिवा
किससे इतना नाता रहा ?
परंतु कैसे झूठ बोलूँ कि ?
मैं सिर्फ तुम्हारे लिए जीता हूँ।
तुम्हें इतना ज्यादा जानने-पहचानने के बावजूद
अभी कहाँ समझ पाया हूँ ?
तुम्हें चाहने को लेकर भी अपनी आँखों पर यकीन नहीं होता,
तुम हमारी माँ जैसी माँओं की माँ हो, मिट्टी !
परंतु तुम्हें उतनी ज्यादे माँ कहाँ मान पाया हूँ ?
अन्न के गर्व से फसलों के झुक जाने का रहस्य तुम्हीं तो हो,
गमकते हुए फूलों में प्रतिदिन हजारों रंग कौन भरता है ?
करोड़ों सालों से कौन दे रहा है,
धरती को अनमोल हरियाली की सौगात ?
पेड़-पौधे तुम्हारे लाख-लाख कृतज्ञ हैं,
अपने वजूद के लिए,
हे प्राणदायिनी ! तुमने इतनी ममता कहाँ से पाई ?
तुम्हारे भीतर छिपा है जड़-चेतन के उत्थान-पतन का इतिहास
तुम्हारे मौन में कैद है मानव-सृष्टि की महागाथा
तुम हो, तो पृथ्वी लाख कठिनाइयों के बावजूद,
लाखों वर्षों से अपने कोने-कोने में जिंदा है।
बदरंग, बेस्वाद, बेजुबान
माटी ! तुम देखने में कितनी मामूली ?
पर जीवन के लिए कितनी अनिवार्य ?
तुम्हें देखकर बार-बार भ्रम होता है
कि छोटा होना क्या वाकई छोटा होना है ?
नीचे रहने का अर्थ क्या सचमुच नीचे रहना है ?
तुम्हारा न हो पाने की विकट पीड़ा में
बेतरह छटपटाता रहता है हृदय
तुम्हारे बगैर निरर्थक होते जाने की तड़प
मैं किससे कहूँ ?

जीवन बीतते जाने का मुझे उतना गम नहीं
जितना कि अपनी स्वार्थपरतावश
तुम्हें हर पल खोते जाने का है।
कूड़ा-करकट से भरी हुई शरीर
एक न एक दिन तुम्हीं में विलीन हो जाएगी -
पता है मुझे
किंतु तुम्हारे आगे कभी
निःशेष कृतज्ञता के साथ नतमस्तक नहीं हो पाया
रात-दिन यही शिकायत रहती है खुद से।

 


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