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आलोचना

करुणा की चित्रलिपि में जीवन का गद्य
पंकज पराशर


महादेवी वर्मा की कविताएँ चर्चा के केंद्र में इतनी अधिक रही है कि आज भी 'अज्ञात प्रियतम', 'नीर भरी दुख की बदली' और 'मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ' जैसे बीज-शब्दों और काव्य-पंक्तियों के इर्द-गिर्द ही आम तौर पर सारी चर्चाएँ केंद्रित होकर रह जाती हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' का प्रथम संस्करण सन 1929 में प्रकाशित हुआ और 1940 में उसका संशोधित और प्रवर्धित संस्करण आचार्य शुक्ल के जीते-जी ही प्रकाशित हुआ था। मगर आचार्य शुक्ल ने महादेवी वर्मा के 1940 तक के साहित्यिक अवदान को महज दो पैराग्राफ में समेट दिया और उसमें भी उनके गद्य-साहित्य का जिक्र नहीं किया। जबकि रामचंद्र शुक्ल ने संशोधित संस्करण की भूमिका में उल्लेख किया है, 'इस संस्करण में समसामयिक साहित्य का अब तक का आलोचनात्मक विवरण दे दिया गया है जिससे आज तक के साहित्य की गतिविधि का पूरा परिचय प्राप्त होगा।'1 बाद की चर्चाओं में भी बहुत दिनों तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना का इतना प्रभाव रहा कि महादेवी वर्मा की क्रांतिकारिता को ढूँढ़ने के लिए भी बहुधा काव्य-लेखन को ही स्रोत मानने पर अधिक जोर रहा। कहना न होगा कि बहुत दिनों तक हिंदी आलोचना में 'मीराँ और महादेवी' की कविता को लेकर तुलनात्मक अध्ययन का सिलसिला चलता रहा।

हिंदी में आलोचना अधिकांशतः काव्य-केंद्रित रही है - यह आरोप अक्सर हिंदी आलोचना पर चस्पाँ किया जाता है। महादेवी वर्मा के प्रसंग में जब हिंदी आलोचना की पड़ताल करते हैं, तो लगता है वाकई आलोचकों ने जाने-अनजाने कविता केंद्रित आलोचना को हिंदी आलोचना का पर्याय समझा। जिसके कारण काव्य-आलोचना के समानांतर कमोबेश आजतक हिंदी में गद्य साहित्य की आलोचना उस परिमाण और प्रतिमान दोनों संदर्भों में संभव नहीं हो पाई। महादेवी वर्मा अपने गद्य लेखन के बारे में कहती हैं, "विचार के क्षणों में मुझे गद्य लिखना ही अच्छा लगता रहा है, क्योंकि उसमें अपनी अनुभूति ही नहीं बाह्य परिस्थितियों के विश्लेषण के लिए भी पर्याप्त अवकाश रहता है। मेरा सबसे पहला निबंध तब लिखा गया था जब मैं सातवीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी, अतः जीवन की वास्तविकता से मेरा परिचय कुछ नवीन नहीं है।"2

चाहे साहित्य का इतिहास हो या समाज का इतिहास, हर क्षेत्र में नई पीढ़ी हमेशा चीजों को नई दृष्टि से देखने का प्रस्ताव करती है। नई दृष्टिसंपन्न नई पीढ़ी भाषा, इतिहास, समाज और राष्ट्र प्रत्येक चीज को उसी रूप में नहीं मान लेती है, जिस रूप में चीजें परंपरा से प्रचलित होती हैं। छायावादी दौर के कवियों में जयशंकर प्रसाद ने इतिहास को उसी रूप में नहीं मान लिया, जिस रूप में अंग्रेज इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की खोज और व्याख्या की थी। अपने नाटकों की भूमिका और कथ्य दोनों में उन्होंने इतिहास को देखने की नई दृष्टि, नई भाषिक शैली और सौंदर्य की खोज एवं उसकी प्रस्तावना की। काव्य-भाषा में छंद को अनिवार्य समझने वाली मानसिकता के बरक्स निराला ने जहाँ एक ओर मुक्त-छंद को प्रस्तावित किया, वहीं 'चतुरी चमार', 'कुल्लीभाट' और 'बिल्लेसुर बकरिहा' जैसी कृतियों की रचना से यह साबित किया कि वाकई 'गद्य जीवन की संग्राम की भाषा है'। महादेवी वर्मा ने एक स्त्री के रूप में सिर्फ यही नहीं लिखा, 'मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ' बल्कि उन्होंने 'श्रृंखला की कड़ियाँ' के निबंधों, 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृति की रेखाएँ' और 'पथ के साथी' के संस्मरणों और 'क्षणदा' के निबंधों में भारतीय स्त्रियों की पराधीनता और विवशता के यथार्थ को जिस कारुणिक भाषा में चित्रित किया है, उसका दूसरा कोई उदाहरण उस कालखंड में नहीं मिलता।

प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में गुलाम भारत के ग्रामीण और किसानों के जीवन-यथार्थ का चित्रण जिस रूप में हुआ है, उसे अनुपमेय माना जाता है। पर यदि हम महादेवी वर्मा के 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृति की रेखाएँ' और 'पथ के साथी' के संस्मरणों में चित्रित ग्रामीण स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा और तत्कालीन जीवन-यथार्थ को देखें, तो लगता है कि प्रेमचंद ने ग्रामीण स्त्रियों के जीवन यथार्थ का जैसा चित्रण किया है, वह एक पुरुष की दृष्टि से देखे हुए यथार्थ की महज ऊपरी परत है। क्योंकि उनके कथा-साहित्य में स्त्रियों का जीवन-यथार्थ पुरुषों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन-यथार्थ का ही एक हिस्सा-सा है। जिसमें स्त्रियों के वैयक्तिक जीवन-यथार्थ, व्यक्तिगत दुख, आकांक्षा और उसकी छटपटाहटों को कम जगह मिली है। 'श्रृंखला की कड़ियाँ' में महादेवी लिखती हैं, 'नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष-स्वभाव द्वारा संभव नहीं।'3 प्रेमचंद चूँकि कथाकार थे इसलिए कथा-साहित्य में पात्रों के बारे में कल्पना से छूट लेकर और उनके स्वरूप और स्वभाव को गढ़ने गुंजाइश थी, लेकिन महादेवी वर्मा ने संस्मरण, रेखाचित्र और निबंध की राह चुनी जिसमें कल्पना और 'गल्प' की कोई गुंजाइश नहीं होती। एक और बात जिसका जिक्र करना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा कि प्रेमचंद की सहानुभूति स्त्रियों के साथ है, परंतु स्वानुभूति प्रेमचंद के पास नहीं है। इसलिए वे एक स्त्री की तरह गुलाम भारत की स्त्रियों की सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक पराधीनता के यथार्थ को समझने में शायद असमर्थ थे।

महादेवी वर्मा की भाषा में स्त्रियों की दशा और पराधीनता को लेकर जो स्वाभाविक आक्रोश और व्यंग्य है, वह लेखिका के संयमित अंदाज के बावजूद किस तरह व्यक्त होता है, देखिए : 'जिस समाज में 64 वर्ष का व्यक्ति 14 वर्ष की पत्नी चाहता है, वहाँ 32 वर्ष की बिट्टो के पुनर्विवाह की समस्या सुलझा लेना टेढ़ी खीर थी। उसके भाग्य से 150 वर्ष की पूर्णायु वाला कोई पुरुष न मिला और उसके जन्म-जन्मांतर के अखंड पुण्य-फल से हमारे 54 वर्ष के बाबा ने उसके उद्धार का बीड़ा उठाया।' 4 कहना न होगा कि बेमेल विवाह का यह जीवंत उदाहरण तत्कालीन स्त्री-जीवन का क्रूर यथार्थ है, कोई गल्प नहीं। 'अतीत के चलचित्र' की वास्तविक नायिका 'बिट्टो' के इस जीवन यथार्थ से लेखिका जहाँ एक ओर आक्रोशित होती हैं, वहीं इसी संस्मरण में आगे जाकर वे बिल्कुल संयत तरीके से समस्या को रेखांकित करती हैं, 'स्त्री जब किसी साधना को अपना स्वभाव और किसी सत्य को अपनी आत्मा बना लेती हैं, तब पुरुष उसके लिए न महत्व का विषय रह जाता है, न भय का कारण, इस सत्य का मान लेना पुरुष के लिए कभी संभव न हो सका। अपनी पराजय को बलात जय का नाम देने के लिए संभवतः वह अनेक विषम परिस्थितियों और संकीर्ण सामाजिक, धार्मिक बंधनों में उसे बांधने का प्रयास करता रहता है। साधारण रूप से वैभव के साधन नहीं, मुट्ठी भर अन्न भी स्त्री के संपूर्ण जीवन से भारी ठहरता है।' 5

महादेवी वर्मा भारतीय स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा को चित्रित करने के लिए गल्प या कथा-कहानी नहीं, जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे जीते-जागते वास्तविक पात्रों का रेखाचित्र और संस्मरण लिखती हैं। जिसमें अधिकांशतः तो वे एक तटस्थ द्रष्टा होती हैं, पर उन पात्रों की स्थिति के लिए जिम्मेदार कारकों पर उनका आक्रोश और व्यंग्य अपनी करुणा और मारकता से इस विधा की ताकत को और अधिक उभार देती है। परतंत्र भारत में जमींदारी और सामंती व्यवस्था की जकड़न में लोगों की आकुलता किस तरह अभिव्यक्त होती है, यह उनकी पुस्तक 'स्मृति की रेखाएँ' में 'गुंगिया' के संदर्भ में देखा जा सकता है। गुंगिया परिवार और समाज की सताई हुई एक वास्तवकि पात्र है, लेकिन वह एक विशाल वाणीविहीन जनसमूह की रूपक भी है। उन विशाल जनसंख्या का रूपक जिन्हें न अक्षर-ज्ञान है, न संचार के साधनों के उपयोग की कला आती है। उन्हें बस इतना पता है कि जब कोई दूर हो तो उस तक चिट्ठी द्वारा अपनी व्यथा-कथा पहुँचाई जा सकती है। पर यह वे नहीं जानते कि संबंधित व्यक्ति तक चिट्ठी पहुँचाने के लिए पते की जरूरत होती है, जिसके बगैर चिट्ठी नहीं पहुँच सकती। मगर उन भलेमानुषों को परदेस गए अपने प्रियजनों की लोकप्रियता के बारे में गजब विश्वास है! महादेवी लिखती हैं, 'वे नगर के नाम से अधिक पता नहीं जानते, यह चाहे यह चाहे विस्मय की बात न हो, पर पत्र लिखने वाले की ख्याति के संबंध में उनका अडिग विश्वास आश्चर्य में डाले बिना नहीं रहता। किसी को विश्वास है कि उसके लाड़ले बेटे के रूप से सब परिचित होंगे। किसी की दृढ़ धारणा है कि उसके कुश्ती लड़ने वाले भतीजे का नगर-भर जानता होगा। कोई मानता है कि उसके भाई जैसे गवैये की ख्याति डाक-घर तक पहुँच गई होगी। कोई मानता है कि उसके साँप-बिच्छू का विष झाड़ने वाले चाचा से डाकिया अनजान नहीं हो सकता। कोई समझती है कि उसके पति का पशु-चिकित्सा-विशारद होना ही उसका पर्याप्त पता है। कोई कहता है कि उसके हनुमान-चालीसा कंठस्थ कर लेने वाले मामा की विद्वता छिपी नहीं रह सकती।'6 ये पात्र नगर में रह रहे अपने परिजनों की वास्तविक स्थिति से भले अनजान हों, लेकिन महादेवी तो जानती हैं, 'इनके प्रिय संबंधियों की दूरदेश के जनसमूह में वही स्थिति है, जो समुद्र में बूँद की होती है, इसे वे न जानते हैं, न मानना चाहते हैं।' 7

महादेवी जानती हैं कि सच क्या है, इसके बावजूद उन्हें न तो इन पात्रों की मूर्खता पर क्रोध आता है और न उन-जैसी अति संवेदनशील लेखिका की दृष्टि में ये ग्रामीण पात्र उपहास हेतु सुपात्रता रखते हैं। रघुवीर सहाय ने भारत की भोली जनता को ध्यान में रखकर अपनी कविता 'स्वाधीन भारत' में लिखा है, 'भाषा ही मेरी एक मुश्किल नहीं रही / एक मेरी मुश्किल है जनता / जिससे मुझे नफरत है सच्ची और निस्संग / जिस पर कि मेरा क्रोध बार-बार न्योछावर होता है।'8 महादेवी वर्मा इन पात्रों के बारे में और भी बड़े फलक पर सोच-विचार करती हैं कि आखिर इन पात्रों को इस दशा में किसने धकेला है? वे लिखती हैं, 'उनकी नासमझी पर कभी हँसी आती है, कभी क्रोध। उनकी विवशता पर कभी झुँझलाहट होती है, कभी ग्लानि। अपने भावों और विचारों के विनिमय के लिए इतने व्याकुल व्यक्तियों को किसने इतना असमर्थ बना डाला? इतने विशाल जन-समूह को वाणीहीन बनाकर जिन्हें अपनी वाग्विदग्धता का अभिमान है, वे कितने निर्लज्ज हैं?'9 ऐसा वे उन विशाल जन-समूह के बारे में लिखने को विवश हैं, जो बोल सकते हैं। इस आधार पर 'गुंगिया' की विवशता और आकुलता की कल्पना की जा सकती है, जिन्हें विधाता ने अभिधा में भी वाणीहीन और मूक बना दिया।

'स्मृति की रेखाएँ' में अनेक ऐसी स्त्रियाँ हैं, जो पुरुषसत्ता और समाजसत्ता के शोषण और उत्पीड़न का शिकार होकर जीने के लिए हरसंभव प्रयास करती हैं। जिनमें से एक भक्तिन हैं, जो बाद में लेखिका की सेविका से सहचरी-सी बन जाती हैं। नागर-समाज की स्त्रियों में जहाँ एक ओर आयु की वास्तविकता पर मिथ्या आवरण डालने का दुराग्रह पाया जाता है, वहीं ग्रामीण समाज की औरतें अपनी आयु की वास्तविकता बताने के मामले में चक्रवृद्धि ब्याज के नियमों को भी मात दे देती हैं। भक्तिन की लेखिका के साथ रहने की शुरुआत अपनी आयु कुछ इस तरह बताती है, 'तुम पचै का का बताई - यहै पचास बरिस से संग रहित है।'10 इस पर लेखिका की टिप्पणी बहुत दिलचस्प है, देखिए, 'इस हिसाब से मैं पचहत्तर की ठहरती हूँ और वह सौ वर्ष की आयु भी पार कर जाती है, इसका भक्तिन को पता नहीं। पता हो भी, तो संभवतः वह मेरे साथ बीते हुए समय में रत्ती भर कम न करना चाहेगी। मुझे तो विश्वास होता जा रहा है कि कुछ वर्ष और बीत जाने पर मेरे साथ बीते समय को खींच कर सौ वर्ष तक पहुँचा देगी, चाहे उसके हिसाब से मुझे डेढ़ सौ वर्ष की असंभव आयु भार क्यों न ढोना पड़े।' 11 भक्तिन का अतीत बेहद दारुण और शोषण-उत्पीड़न की अंतहीन की दास्तान है। स्त्री होकर भी अपनी कर्मठता से जो भक्तिन यानी लछमिन अपने घर में बेहद सख्ती से दरिद्रता का प्रवेश निषेध रखती है, वह पट्टीदारों-रिश्तेदारों के कुचक्रों से हार जाती है। नतीजतन जमींदार के कारिंदे जब लगान न चुका सकने के कारण उसे दिन भर धूप में खड़े रहने की सजा देते हैं, तो वह हारकर धन कमाने के लिए शहर की राह लेती है और लेखिका के घर में सेविका के रूप में आश्रय पाती है।

महादेवी वर्मा ने जिन पात्रों और उनके समाजों के बारे में लिखा है, उसमें सिर्फ स्त्रियाँ ही व्यवस्था और सत्ता की सताई हुई नहीं है, पुरुष भी पीड़ित हैं। इसलिए महादेवी को सिर्फ स्त्रियों के पक्ष में लिखने वाली स्त्रीवादी लेखिका कहना ठीक नहीं होगा। पुरुष-सत्ता, समाज-सत्ता और अर्थ-सत्ता की शिकार भारतीय समाज में सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं, पुरुष भी हैं। अपनी भावुकता और निश्छलता से पुरुषों की विवशता भी लेखिका के हृदय को अपार करुणा से आप्लावित कर देती है। 'बदलू', 'घीसा', 'रामा', 'अलोपी', 'चीनी फेरीवाला', 'जंग बहादुर' और 'ठकुरी बाबा' ऐसे पात्र हैं, जिनकी दशा उसी तरह लेखिका को मर्माहत करती हैं, जैसी कि 'गुंगिया', 'भक्तिन', 'बिबिया', 'सबिया', 'अभागी स्त्री', 'बालिका माँ' या 'बिट्टो'।

छायावादी कविता में शब्द-शक्ति के और रूपों का चाहे जितना दोहन किया गया हो, अभिधा को प्रायः कम ही प्रयोग के लायक समझा गया। कदाचित इसलिए उस दौर के गद्य में भी लक्षणा और व्यंजना पर अधिक जोर देखा जा सकता है। महादेवी वर्मा के संस्मरणों और रेखाचित्रों की भाषा को देखें तो वह अभिधात्मक नहीं, लक्षणा-व्यंजनापरक अधिक है, परंतु उनका कमाल यह है कि इससे भाषा की बोझिलता नहीं, प्रांजलता में वृद्धि होती है। इस वजह से पात्रों के अप्रिय से अप्रिय जीवन-प्रसंगों के चित्रण में भी लेखिका की भाषा बेहद संयत और तटस्थ होती है। उनका व्यंग्य और हास्य क्रोध के स्थान पर करुणा और मार्मिकता को जन्म देती है। जिसके कारण पाठकों का ध्यान सहज ही उन जीवन-स्थितियों के कारणों और घटकों की ओर जाता है। तात्कालिकता के आवरण में शोषण के अंतहीन चक्रों की जन्मदाता सत्ता और व्यवस्था की ओर जाता है। जिसकी शिकार स्त्रियाँ अधिक होती हैं, पर उससे पुरुष भी अछूते नहीं रहते। इसलिए वे भी महादेवी की सहानुभूति और प्रेम के दायरे से बाहर नहीं होते हैं। स्त्रियों को लेकर जो उनकी सोच है, वह महज इसी विंदु से पश्चिम के स्त्रीवादी विमर्श से पृथक नहीं है। जीवन को लेकर अनेक ऐसी चीजें हैं, जिसको लेकर उनकी सोच उस घेरे से सर्वथा अलग है, जो अपने स्त्री-विमर्श के कारण पुरुष-सत्ता के विरोध को पुरुषों के विरोध का पर्याय समझ लेते हैं। 'श्रृंखला की कड़ियाँ' के पहले आलेख में महादेवी वर्मा लिखती हैं, 'महाभारत के समय की कितनी ही स्त्रियाँ अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा कर्तव्य-बुद्धि के लिए स्मरण रहेंगी। उनमें से प्रत्येक संसार-पथ में पुरुष की संगिनी है, छाया मात्र नहीं। छाया का कार्य, आधार में अपने आपको इस प्रकार मिला देना है जिसमें वह उसी के समान जान पड़े, और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर उसके जीवन को अधिक-से-अधिक पूर्ण बनाना।' 12

स्त्रियों की दशा और उत्पीड़न के लिए महादेवी वर्मा आर्थिक गुलामी को एक बड़ा कारक तत्व मानती हैं। हालाँकि पश्चिम में भी स्त्रियों को उत्तराधिकार और संपत्ति का अधिकार शुरू से हासिल नहीं था, लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो भारत में तो यह आज भी स्त्रियों को सहजता से सुलभ नहीं है। इसलिए कोई पुरुष जब यह स्त्री को देता है तो सहजता से नहीं, दानवीरता और जाने-अनजाने देने के दंभ के साथ। पर 'मानुष पेम भयऊ बैकुंठी नाहिं तो काह छार भरि मूठी' की प्रतिमा-सी मैत्रेयी को जब उसके पति याज्ञवल्क्य सब कुछ देकर वन जाने को प्रस्तुत होते हैं, तो मैत्रेयी धन और वैभव के ऐश्वर्य को 'छार भरि मूठी' के समान समझती हुई कहती है, 'यदि ऐश्वर्य से भरी सारी पृथ्वी मुझे मिल जाए तो क्या मैं अमर हो सकूँगी?'13 जाहिर है, धन से अमरता का कोई संबंध नहीं, इसलिए मैत्रेयी को धन से सुविधाएँ तो मिल सकती थीं, अमरत्व नहीं। पर आज की स्त्रियों का काम्य महज अमरत्व नहीं है, न हो सकता है। मनुष्यता से भी एक दर्जा नीचे रहने और जीने का जो अभिशाप स्त्रियाँ धनाभाव और धनार्जन के स्रोतों के अभाव में भोगती हैं, वह अर्थ-सत्ता पर पकड़ के बाद उतनी पीड़ादायी नहीं होगी। इसलिए महादेवी स्पष्टता से अपनी राय प्रकट करती हैं, 'यदि उन्हें अर्थ संबंधी वे सुविधाएँ प्राप्त हो सकें जो पुरुषों को मिलती आ रही हैं तो न उनका जीवन उनके निष्ठुर कुटुंबियों के लिए भार बन सकेगा और न वे गलित अंग के समान समाज से निकाल कर फेंकी जा सकेंगी, प्रत्युत वे अपने शून्य क्षणों को देश के सामाजिक तथा राजनीतिक उत्कर्ष के प्रयत्नों से भर कर सुखी रह सकेंगी।' 14

महादेवी वर्मा स्त्रियों के अर्थ स्वातंत्र्य की आवश्यकता को कई कोणों से परखने का प्रयास करती हैं। दरअसल यह ऐसा मुद्दा है जिसको लेकर आज भी भारतीय समाज में आंतरिक कश-म-कश जारी है कि लड़कियों को नौकरी के लिए घर से निकलना चाहिए कि नहीं। महादेवी सन 1942 में इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रही थीं, जब स्त्री शिक्षा का स्तर देश में बहुत कम था और सार्वजनिक जीवन और सार्वजनिक स्थलों पर मध्यवर्ग की महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम थी। स्त्रियों के लिए आधुनिक शिक्षा सबसे पहली और बुनियादी जरूरत है, जिसके बाद वह अन्य चीजों के बारे में स्वतः जागरूक और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में काफी हद तक सक्षम हो जाती हैं। बाल-विवाह, बेमेल विवाह आदि सामाजिक समस्या से ज्यादा आर्थिक कारणों से उपजी समस्या है। महादेवी वर्मा कहती हैं, 'हम स्त्रियों के विवाह की चिंता इसलिए नहीं करते कि देश या जाति में सुयोग्य माताओं या पत्नियों का अभाव हो जाएगा, वरन इसलिए कि हम उनकी आजीविका का कोई और सुलभ साधन नहीं सोच पाते। माता-पिता चाहे संपन्न हो चाहें दरिद्र, कन्या का कोई उत्तरदायित्व प्रसन्नता से अपने ऊपर नहीं लेना चाहते और न विवाह के अतिरिक्त उससे छुटकारा पाने का मार्ग ही पाते हैं। विधवाओं की भी हमारे निकट एक ही समस्या है। किसी स्त्री के विधवा होते ही प्रश्न उठता है कि उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा कौन करेगा?' 15 आजकल इन समस्याओं में थोड़ी कमी अवश्य आई है, पर ये निर्मूल नहीं हुई हैं। अजीब विडंबना है कि शहरी समाज की आधुनिक शिक्षा प्राप्त और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्रियों के पिता को भी आज दहेज न देना पड़ता हो, उनकी लड़कियाँ दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का शिकार न हो रही हो, ऐसा नहीं है। आज तो सीधे कोख में उतरती है कटार और दुनिया में आने से पहले ही कन्या भ्रूण की हत्या हो जाती है। किसी से घोर नफरत करने के लिए समाज भले किसी का बहिष्कार न करता हो, पर प्रेम करने के लिए आज न केवल समाज बहिष्कृत करता है, बल्कि जान लेने के अलावा और किसी बात से अपनी प्रतिष्ठा नहीं बचाना जानता है। उत्तर-आधुनिकता के हो-हल्ले के बीच पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह खाप पंचातयों ने मध्यकालीन तरीके से फैसले किए हैं और प्रेमी-युगलों को सजा-ए-मौत दी है, उसके कारण राधा-कृष्ण के प्रेम का परचम लहराने वाले समाज में नफरत के झंडे को ज्यादा बुलंद हुआ है। आधुनिकता ने एक तरफ जहाँ स्त्रियों को आगे बढ़ने और बराबरी के मौके प्रदान किए हैं वहीं दूसरी तरफ पिछले दो दशकों में स्त्रियों के प्रति होने वाली सामाजिक हिंसा में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

यह दौर न केवल मूल्यों और अस्मिताओं के टकरावों का है, बल्कि आधुनिकता और मध्यकालीन जीवन-मूल्यों के बीच टकरावों का भी है। एक तरफ जैसे-जैसे सूचना तकनीक हमारे जीवन के तमाम क्षणों और निर्णयों में शामिल हो रहा/हो चुका है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक प्रतीकों, व्यवहारों और स्त्रियों को पारिवारिक संपत्ति समझने वाली मध्यकालीन मानसिकता का जोर बढ़ रहा है। स्त्रियों को स्त्री-धन समझकर सात तालों में बंद रखने की सामंती मानसिकता इस उत्तर-आधुनिकता की ओर अग्रगामी समाज में एक उपनिवेश की तरह बन और बढ़ रहा है। स्त्रियों की आकांक्षा और स्वप्न को वाणी देते हुए महादेवी वर्मा ने सन 1936 में 'हमारी समस्याएँ' नामक निबंध में लिखा था, 'स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न होने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उत्तीर्ण होने को जीवन की चरम सफलता समझती है।' 16

महादेवी वर्मा के विचार और वितर्क का परिक्षेत्र अत्यंत व्यापक है। वह कई मुद्दों और कई स्तरों पर अपनी बात बहुत साफगोई से कहती हैं। सिर्फ यही नहीं कि वे रेखाचित्रों, संस्मरणों और लेखों में पीड़ित मनुष्यों की पीड़ा का चित्रण करती हैं, बल्कि जीवन-जगत, इतिहास, समाज, कला, साहित्य तमाम चीजों के की समस्या, सौंदर्य और मनुष्य की सुग्राह्यता के बारे में लिखती हैं। उनके विचारों और तर्कों की उदात्तता के कारण उनके लेखों में किसी खास नजरिए से प्राप्त दृष्टि के कारण एक ही आयाम और दृष्टिकोण पर जोर देने की एकांगी आग्रहशीलता नहीं दिखाई देती है। कहना न होगा कि बहस में स्वस्थ और तार्किक बहस की जगह जब अपने आग्रह को जिद की तरह पेश किया जाने लगता है तो बहस नहीं चल पाती है। महादेवी अपने तर्कों को कहीं से दुराग्रह या जिद नहीं बनने देती हैं, बल्कि वे अनेक मतों और दृष्टिकोणों का आवाहन करती हुई-सी आगे बढ़ती हैं।

विभिन्न विषयों पर लिखे निबंध-संग्रह 'क्षणदा' में 'संस्कृति के प्रश्न' नामक अध्याय में संस्कृति के विभिन्न आयामों की पड़ताल करते हुए महादेवी लिखती हैं, 'भारतीय संस्कृति का प्रश्न अन्य संस्कृतियों से कुछ भिन्न है, क्योंकि वह अतीत की वैभव-कथा ही नहीं, वर्तमान की करुण-गाथा भी है। उसकी विविधता प्रत्येक अध्ययनशील व्यक्ति को कुछ उलझन में डाल देती है। संस्कृति विकास के विविध रूपों की समन्वयात्मक समष्टि है और भारतीय संस्कृति विविध संस्कृतियों की समन्वयात्मक समष्टि है। इस प्रकार इसके मूल तत्व को समझने के लिए हमें अधिक उदार, निष्पक्ष और व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता रहती है।'17 संस्कृति और धर्म की आज जैसी व्याख्या की जा रही है, जिस तरह बहु-सांस्कृतिक समाज की अस्मिता को एकल अस्मितावादी समाज में रिड्यूस करने की प्रवृत्ति प्रोत्साहित की जा रही है, उससे सहज ही असहिष्णुता और सामाजिक तनाव उत्पन्न होता है। इन्हीं तनावों और दबावों के फलस्वरूप युद्धोन्माद पैदा होता है और अगर किसी समाज को युद्ध का सामना करना पड़ा, तो उसकी सबसे अधिक शिकार स्त्रियाँ होती हैं।

पौराणिक मिथकीय उदाहरणों से लेकर आजतक के युद्धों के इतिहास को देखें, तो पाते हैं कि युद्ध से अंततः हासिल कुछ नहीं होता - सिवाय विध्वंस, मृत्यु, भूख और बर्बादी के। मगर अपने अहं और प्रलोभनों के कारण पुरुष-सत्ता युद्धों से गुरेज नहीं करती, स्त्रियाँ युद्धों से बचने का प्रयत्न करती हैं। जाहिर है, इसलिए भी क्योंकि वह जानती हैं कि इसका परिणाम और परिताप सबसे अधिक उन्हें ही भोगना होगा। महादेवी लिखती हैं, 'वास्तव में वह पुरुष के दृष्टिकोण से युद्ध को देख ही नहीं सकती। कुछ स्वभाव के कारण और कुछ बाहर के संघर्ष में रहने के कारण पुरुष गृह में उतना अनुरक्त नहीं हो सका जितनी स्त्री हो गई थी। उसके लिए गृह का उजड़ जाना एक सुख के साधन का बिगड़ जाना हो सकता है, परंतु स्त्री के लिए वही जीवन का उजड़ जाना है। युद्ध गृह के लिए प्रलय है, इसी से संभवतः वह इससे अलग रही है।' 18 कहना न होगा कि युद्ध मनुष्य और मनुष्यता के विध्वंस का कारक है, जो निर्माण और सृजनधर्मी चेतना का विलोम है। एक स्त्री ही घर को घर बना सकती है या कहें बना पाती है, क्योंकि उसमें स्वाभाविक तौर पर रचने और कुछ निर्मित करने की क्षमता होती है। लोकोक्तियों और लोक-वचनों में अभिव्यक्त स्त्री-छवि को देखें तो यह आकस्मिक नहीं है, 'बिन घरनी घर भूत का डेरा।' पुरुष चाहे कितना ही काबिल और सृजनशील क्यों न हो, घर की अवधारणा ही बिना स्त्री के स्पष्ट और पूर्ण नहीं होती।

भारतीय समाज में धर्म, आध्यात्म, संस्कृति और साहित्य ऐसा क्षेत्र है, जिसकी व्याख्या और विश्लेषण का अधिकतर पुरुषों के पास रहा। जिसका नतीजा यह हुआ कि पुरुष-सत्ता ने उन्हीं चीजों को ज्यादा जोर देकर प्रचारित किया, जो उसके पक्ष में अधिक थी / हो सकती थी। यहाँ तक कि साहित्य और कला के क्षेत्र में पुरुष वर्चस्व की सत्ता ने सदियों तक स्त्री-क्षमता को विकसित ही नहीं होने दिया। भारतेंदु युग में तमाम चेतना और क्रांतिकारिता के बावजूद यदि हम स्त्रियों की सहभागिता की दृष्टि से देखें तो कितनी स्त्रियाँ साहित्य में सक्रिय थीं? द्विवेदी युग में कितनी स्त्रियों की साहित्यिक क्षमता पल्लवित-पुष्पित होने का अवसर दिया गया? सन 1911 से 1915 के बीच राजेंद्रबाला घोष के अलावा सरस्वती देवी और भाग्यवती देवी नामक महिलाओं ने भी कहानी लिखने की हिकमत की थी, परंतु पुरुष साहित्यकारों ने निषेधवादी दृष्टि के कारण महिला कथाकारों की पहचान जान-बूझकर नहीं की। राजेंद्रबाला घोष की पहचान को रिड्यूस करके 'बंगमहिला' में प्रत्यावर्तित कर देने वाली शक्तियाँ दशकों तक महादेवी वर्मा को महज 'नीर भरी दुख की बदली' बताकर एक खास तरह की स्त्री-छवि के घेरों तक सीमित करती रही।

महादेवी वर्मा 'साहित्य और साहित्यकार' नामक निबंध में लिखती हैं, 'अपने सृजन से साहित्यकार स्वयं भी बनता है, क्योंकि उसमें नए संवेदन जन्म लेते हैं, नया सौंदर्यबोध उत्पन्न होता है और नए जीवन-दर्शन की उपलब्धि होती है। सारांश यह है कि वह जीवन की दृष्टि से समृद्ध होता जाता है, इसी से साहित्य सृष्टि का लक्ष्य स्वांतः सुखाय का विरोधी नहीं हो सकता। पर यह क्रिया अपने कर्ता को बनाने के साथ उसके परिवेश को भी बनाती चलती है, क्योंकि समष्टि में इन्हीं नवीन संवेदनों, सौंदर्यबोधों और विश्वासों का स्फुरण होता रहता है।' 19 महादेवी ने महात्मा बुद्ध को लेकर बहुत तार्किकता से कुछ बातें की हैं। जिससे पता चलता है कि महादेवी अपनी चयनधर्मी दृष्टि बुद्ध के आचरण और उनकी बातों को तर्कपूर्ण तरीके से परीक्षण के बाद विचार और प्रस्ताव के लायक समझती हैं। दुनियाभर में बुद्ध की स्वीकार्यता और ग्राह्यता को लेकर विचार करने के साथ-साथ वे इस बात पर भी विचार करती हैं कि किस तरह अवतारवाद के सिद्धांतकारों ने विरोध, स्वीकार और अंगीकार के बाद उनके परीक्षित विचारों को भी सनातनता में विलीन कर दिया। महादेवी लिखती हैं, 'संसार के धर्म संस्थापकों की पंक्ति में बुद्ध ही ऐसे अकेले हैं जिन्होंने मनुष्य के संबंधों में सामंजस्य लाने के लिए परमात्मा की मध्यस्थता नहीं स्वीकार की, मनुष्यता उत्पन्न करने के लिए किसी पारलौकिक अस्तित्व का सहारा नहीं लिया। जिस निर्मम बौद्धिकता के साथ वे अपने वचनों को भी तर्क की कसौटी पर कस कर ही स्वीकार करने के लिए कहते हैं, उसी के साथ वे जीवन के अंतिम क्षणों में भी अपने संस्थापित धर्म के लिए कोई उत्तराधिकारी नहीं चुनते।' 20

हिंदी आलोचना ने इस बात को आज तक उचित महत्व के साथ रेखांकित नहीं किया कि महादेवी वर्मा संभवतः अकेली ऐसी लेखिका हैं, जिन्होंने पशु-पक्षियों को 'मेरा परिवार' कहा है। उन्होंने पशु-पक्षियों के साहचर्य और अनुभवों को उसी तरह आत्मीय संस्मरण के योग्य समझा, जैसा वे शोषित-उत्पीड़ित मनुष्यों को विषय बनाकर लिखे गए अपने संस्मरणों और रेखाचित्रों में मनुष्यों को समझती हैं। चूँकि वे इन पशु-पक्षियों को अपना परिवार बताती हैं, इसलिए यह अकारण नहीं है कि इनके नाम भी मानवीय नाम हैं। महादेवी वर्मा पशु-पक्षियों की निश्छलता, करुणा और स्नेहिल क्रिया-कलापों को बेहद सूक्ष्मता से देखती हैं और ऐसी-ऐसी सूचनाएँ सहजता देती हुई चलती हैं, जिसकी जानकारी बेहद कम लोगों को होती है। प्रकृति के साथ मनुष्यों के बढ़ते संघर्ष के कारण वनस्पतियों, फूलों और पशु-पक्षियों के बारे में हमारी जानकारी बेहद सीमित होती चली गई। जिसके कारण बहुत-सी वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी आदि विलुप्त हो चुके हैं, कुछ विलुप्तप्राय हैं और जो कुछ बचे हैं उनमें से अधिकांश या तो अभ्यारण्यों में या चिड़ियाघर में बचे हैं। महादेवी के परिवार पर बात करते हुए आगे हम इसका थोड़ी गहराई में जाकर उल्लेख करेंगे कि पशु-पक्षी विषयक उनका ज्ञान कितना विस्तृत और सटीक है।

'नीलकंठ मोर' पर लिखते हुए नखासकोने के बारे में महादेवी लिखती हैं, 'जितने दंगे-फसाद और छुरे-चाकूबाजी की घटनाएँ होती हैं, सबका अशुभारंभ प्रायः नखासकोने से ही होता है। आँखों का सरकारी अस्पताल भी वहीं प्रतिष्ठित है। शत्रु-मित्र की पहचान के लिए दृष्टि कमजोर हो तो वहाँ ठीक कराई जा सकती है, जिससे कोई भूल होने की संभावना न रहे।' 21 नखासकोने के पास अस्पताल की विडंबना महादेवी की नजर से बच नहीं पाती है, वहीं अस्पतालों की हालत और कार्य-प्रणाली के बारे में वे जैसी टिप्पणी करती हैं, उससे समझा जा सकता है आज हमारे देश में सरकारी अस्पतालों की जो हालत है, वह अंगरेज बहादुरों का बनाया हुआ मॉडल है। जिसकी बदहाली में अपना संपूर्ण योगदान देकर स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भारत की आम जनता के बारे में अपने पूर्व शासकों की राय को अक्षुण्ण रखा है। महादेवी कहती हैं, 'हमारे देश में अस्पताल, साधारण जन को अंतिम यात्रा में संतोष देने के लिए ही तो है। किसी प्रकार घसीटकर, टाँगकर उस सीमा-रेखा में पहुँचा आने पर बीमार और उसके परिचारकों को एक अनिर्वचनीय आत्मिक सुख प्राप्त होता है। इससे अधिक पाने की न उसकी कल्पना है, न माँग। कम-से-कम इस व्यवस्था से अंतिम समय मुख में गंगाजल, तुलसी, सोना डालने की समस्या तो सुलझा ही दी है।' 22

जैसाकि हम पहले कह चुके हैं, महादेवी की कविता ही नहीं, उनकी भाषा को लेकर भी अक्सर यह बात कही जाती है कि उनमें विविधता का अभाव है। पर अपने संस्मरणों में महादेवी ने विभिन्न पात्रों की भाषिक विविधता, ध्वनि-वैविध्य और आंगिक-भाषा की बारीकियों को जितनी बारीकी और जितने स्तरों पर वे पकड़ती हैं, उससे उनके ऊपर भाषिक-एकरसता का जो आरोप लगाया जाता है वह सर्वथा निर्मूल साबित होता है। चिड़िया बेचने वाले बड़े मियाँ की भाषा को कैसे ध्वन्यांकित करती हैं, देखिए, 'ईमान कसम, गुरुजी, चिड़ीमार ने मुझसे इस मोर के जोड़े के नकद तीस रुपये लिए हैं। बारहा कहा, भई जरा सोच तो अभी इनमें मोर की कोई खासियत भी है कि तू इतनी बड़ी कीमत ही माँगने चला!' 23

अब इस उदाहरण से सर्वथा अलग एक देहाती औरत भक्तिन की भाषा को महादेवी कैसे पकड़ती हैं, वह भी देखिए, 'हमार मलकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़ै लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।' 24

एक तरफ उर्दू की पृष्ठभूमि के बड़े मियाँ की भाषा, दूसरी तरफ अवध के देहात की एक निरक्षर स्त्री की भाषा और यह देखिए 'चीनी फेरीवाला' की भाषा का जीवंत नमूना, 'सिस्तर का वास्ते हैंकी लाता है - भोत बेस्त, सब सेल हो गया। हम इसको पाकेत में छिपा के लाता है।' 25 इन कुछ उदाहरणों से देखा जा सकता है कि महादेवी की गद्य-भाषा कितनी जीवंत और अनेक स्तरीय भाषा है।

नीलकंठ मोर और उसके बचपन की संगिनी राधा मोरनी के बीच जब एक नई मोरनी कुब्जा का आगमन होता है, तो यह आगमन कैसे नीलकंठ-राधा के एकनिष्ठ प्रेम के बीच दीवार और जानलेवा साबित होता है, इसका अत्यंत मार्मिक चित्रण महादेवी वर्मा ने किया है। लेखिका को लगा कि थोड़े दिनों की लड़ाई है, बाद में सब ठीक हो जाएगा। मगर तीन-चार मास बीतते नीलकंठ सदा के लिए सो गया। कुब्जा भी अपनी शैतानी प्रवृत्ति के कारण कजली नामक अल्सेशियन कुतिया की शिकार हो गई। बच जाती है राधा नामक मोरनी, जो आषाढ़ के मेघाच्छन्न आकाश को देखकर विरह-व्यथा की मारी नीलकंठ को उच्च स्वरों में पुकारती रहती है। जैसे मेघ को देखकर विरही यक्ष अपनी प्रिया के लिए मेघ के माध्यम से संदेश भेजना चाहता हो।

लेखिका ने अपने परिवार में कुछ ऐसे पशु-पक्षियों को शामिल किया, जिसे आम तौर पर पालतू पशु-पक्षी की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। मसलन एक छोटी-सी गिलहरी का बच्चा जिसे लेखिका 'गिल्लू' नाम देती है, उसे वह बड़े जतन से पालती है। गिलहरी प्रायः पालतू नहीं मानी जाती है, लेकिन प्रेम और स्नेह की भाषा ऐसी भाषा होती है जिसे शायद गिलहरी भी समझ लेती है। लेखिका के परिवार का सबसे छोटा सदस्य गिल्लू उनसे कैसे हिल-मिल गया, यह लेखिका के शब्दों में ही देखिए, 'मेरे पास बहुत से पशु-पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परंतु उनमें से किसी को मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुई है, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता। गिल्लू इनमें अपवाद था। मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँचती, वह खिड़की से निकल कर आँगन की दीवार पार करके मेज पर पहुँच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता। बड़ी कठिनाई से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया, जहाँ बैठकर वह मेरी थाली में से एक-एक चावल उठाकर बड़ी सफाई से खाता रहता।' 26

त्रासद यह है कि इस निश्छलता और कोमलता का अंत जल्दी ही हो जाता है। पशु-पक्षियों के जीवन-चक्र से अनभिज्ञ अधिकांश लोगों को शायद यह ज्ञात न हो, इसलिए महादेवी कहती हैं, 'गिलहरियों के जीवन की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होती अतः गिल्लू की जीवन-यात्रा का अंत आ ही गया। दिन भर उसने न कुछ खाया, न बाहर गया। रात में अंत की यातना में भी मेरी वही उँगली पकड़कर मेरे बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से मेरी वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था।' 27 महादेवी को जैसे ही अवकाश मिलता है, वह मनुष्य की निष्ठुरता और पाखंडप्रियता पर व्यंग्य करने से नहीं चूकती हैं। सोना हिरनी के बहाने मृत्यु को लेकर लेखिका का व्यंग्य और आक्रोश देखिए, 'मनुष्य मृत्यु को असुंदर ही नहीं, अपवित्र भी मानता है। उसके प्रियतम आत्मीय जन का शव भी उसके निकट अपवित्र, अस्पृश्य तथा भयजनक हो उठता है। जब मृत्यु इतनी अपवित्र और असुंदर है, तब उसे बाँटते घूमना क्यों अपवित्र और असुंदर नहीं कार्य नहीं है, यह मैं नहीं समझ पाती।' 28 बम-बारूद और संहारक हथियारों के सौदागरों पर इतना करारा व्यंग्य छायावाद के किसी और कवि ने किया हो, मुझे याद नहीं आता।

लेखिका के परिवार का दुर्मुख नामधारी खरगोश उस करुण-कथा की सहसा याद दिला देता है, जो सीता के साथ घटित हुआ। दुर्मुख राजा राम के उस गुप्तचर का नाम था जिसने धोबी दंपति के शयन कक्ष की उस बातचीत की खबर पहुँचाई थी जिसमें उसने सीता के चरित्र पर संदेह जाहिर किया था। उस दुर्मुख के बहाने महादेवी एक सूचना देती हैं, 'प्रायः खरगोश की गंध से साँप आ जाते हैं, क्योंकि वह उसके प्रिय खाद्यों में से एक है।' 29 खरगोश साँप के सामने निरुपाय और असहाय हो जाता है, परंतु दुर्मुख नामधारी वह खरगोश बेहद क्रोधी स्वभाव का था। क्रोधी प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए दुर्मुख के अंत की कथा देखें, 'क्रोधी प्रकृति में भी पार्थिव रूप से विष नहीं रहता, इसी से बेचारा दुर्मुख सँपोले का भी दंशन-विष नहीं सह सका, परंतु मृत्यु से पहले उसने शत्रु के दो खंड करके प्रतिशोध तो ले ही लिया।' 30 गौरा गाय के बारे में लिखते हुए महादेवी वर्मा ने मनुष्य की ईर्ष्या और स्वार्थ की पराकाष्ठा के साथ-साथ गौरा के करुण अंत की कथा को जिन शब्दों में व्यक्त किया है, वह करुणा चित्रलिपि में लिखी गई है। 'कुछ ग्वाले ऐसे घरों में, जहाँ उनसे अधिक दूध लिया जाता है, गाय का आना सह नहीं पाते। अवसर मिलते ही वे गुड़ में लपेटकर सुई उसे खिलाकर उसकी असमय मृत्यु निश्चित कर देते हैं। गाय के मर जाने पर उन घरों में वे पुनः दूध देने लगते हैं।' 31

कुत्ता का मानव ऐसा पुराना संगी है जिसका माहात्म्य आज भी कुछ कम नहीं है। 'नीलू कुत्ते' के बारे में लिखते हुए महादेवी के पास कुत्तों से संबंधित पाठकों को देने के लिए अनेक सूचनाएँ हैं, उदाहरण देखिए,

'अल्सेशियन कुत्ता एक ही स्वामी को स्वीकार करता है।'

'वैसे तो लकड़बग्घा कुत्ते से कुछ ही बड़ा होता है, परंतु कुत्ता इसका प्रिय खाद्य होने के कारण रक्षणीय स्थिति की स्थिति में आ जाता है।'

'कुत्ते भाषा नहीं जानते ध्वनि पहचानते हैं। नीलू का ध्वनि ज्ञान इतना विस्तृत और गहरा था कि उससे कुछ कहना भाषा जाननेवाले मनुष्य से बात करने के समान हो जाता था।' 32

महादेवी वर्मा का छुटपन में ही पशु-पक्षियों से अधिक साहचर्य हो गया था। मुर्गी के छोटे से बच्चे मूँगा से लेकर निक्की नेवला, रोजी कुत्ती और रानी घोड़ी तक से लेखिका की बचपन में ही मैत्री हो गई थी। बाद में क्या पालतू और क्या जंगली, अनेक जीव-जंतु उनके परिवार के सदस्य-जैसे हो गए। हिंदी के कवि जानकीवल्लभ शास्त्री आवारा गायों के बड़े संरक्षक थे, कवि रघुवीर सहाय एक बिल्ली पालते थे और जिनके प्रति वे काफी सदय थे, बावजूद इसके शायद ही कोई हिंदी का ऐसा लेखक हो जिसका अनेक तरह के पशु-पक्षियों के साथ इतना लंबा साहचर्य रहा हो और उसके पास इन जीवों के बारे में इतनी गहरी और सूक्ष्म जानकारियों का जखीरा हो। दूसरी और बेहद अहम बात, जिसे खास तौर पर रेखांकित करने की जरूरत है, वह यह है कि महादेवी ने जिस तरह इन जीवों के दैनंदिन जीवन और अपने साथ के साहचर्य को मनुष्यवत मानकर उनके बारे में जिस ममता और प्रेम से लिखा है और उन्हें 'मेरा परिवार' कहा है - क्या कोई और उदाहरण है? महादेवी गद्य में जिस तरह भाषा के अनेक स्तरों पर बात करती हैं, अनुभव के विस्तीर्ण आकाश को इस तरह पाठकों के अनुभवों से ऐकमेक कर देती हैं कि सहज ही उनके लोक से तादात्म्य स्थापित हो जाता है।

संदर्भ :

 

1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, संस्करण- 2003

2. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ की भूमिका से, भारती भंडार, प्रयाग, संस्करण- 1958 3. वही, पृष्ठ- 12

4. महादेवी वर्मा, अतीत के चलचित्र, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999, पृष्ठ- 50

5. वही

6. महादेवी वर्मा, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999, पृष्ठ- 107

7. वही

8. रघुवीर सहाय, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल पैपरबैक्स, 1994, पृष्ठ- 48

9. महादेवी वर्मा, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999, पृष्ठ- 108

10. वही, पृष्ठ- 9

11. वही

12. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, भारती भंडार, प्रयाग, संस्करण- 1958, पृष्ठ- 13

13. वही, पृष्ठ- 12

14. वही, पृष्ठ- 21

15. वही, पृष्ठ- 84

16. वही, पृष्ठ- 128

17. महादेवी वर्मा, क्षणदा, भारती भंडार, इलाहाबाद, 1972, पृष्ठ- 23

18 . महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, भारती भंडार, प्रयाग, संस्करण- 1958, पृष्ठ- 33

19. महादेवी वर्मा, क्षणदा, भारती भंडार, इलाहाबाद, 1972, पृष्ठ- 119

20. वही, पृष्ठ- 11

21. महादेवी वर्मा, मेरा परिवार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986, पृष्ठ- 23

22. वही, पृष्ठ- 24

23. वही, पृष्ठ- 25

24. महादेवी वर्मा, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999, पृष्ठ- 15

25. वही, पृष्ठ - 22

26. महादेवी वर्मा, मेरा परिवार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986, पृष्ठ- 41

27. वही, पृष्ठ- वही

28. वही, पृष्ठ- 46

29. वही, पृष्ठ- 65

30. वही, पृष्ठ- वही

31. वही, पृष्ठ- 73

32. वही, पृष्ठ- 83


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हिंदी समय में पंकज पराशर की रचनाएँ