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कविता

सोच रहा हूँ
देवेंद्र कुमार बंगाली


सोच रहा हूँ
लगता है जैसे साये में अपना ही
गला दबोच रहा हूँ।

एक नदी
उठते सवाल-सी
कंधों पर
है झुकी डाल-सी
अपने ही नाखूनों से अपनी ही
देह खरोंच रहा हूँ।

दूर दरख्तों का
छा जाना
अपने में कुआँ
हो जाना
मुँह पर घिरे अँधेरे को
बंदर-हाथों से नोच रहा हूँ।

 


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