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कविता

ढलान पर रथ
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


अब रथ ढलान पर था
ऊपर उठती जा रही थी
पीछे छूटती जमीन
रुकने के प्रयास थे निष्फल
ढलते जाने के अकृत्रिम प्रवाह में

चारों ओर वृक्ष खड़े थे विनम्र
प्रार्थना में तल्लीन
ठहरे हुए त्रासद क्षणों की तरह
शाखाएँ कह रही थीं अलविदा

वहाँ यह झरना था
प्रकृति का एक अश्रुपूरित अध्याय
औरों के लिए बनाये अपने द्वैध में जो
रबाब की तरह बज रहा था अनादिकाल से
पहला दूर - बहुत दूर अदृश्य
किंतु दूसरों के लिए
दूसरा पास बिलकुल खुद में
पर यहाँ भी दूसरों के लिए पहले
अंत में अपने लिए

और लंबी व्यथा-कथा-सी
यही थी फूटती नदी
धरती की छाती से चिपटी
नीली नस की तरह
वहन करती जीवनवाही खून
भागते-भागते खोती जाती
वन प्रांतर के आगोश में

जंगल भी क्या जंगल था
उसका एक हिस्सा दावानल में
नसों, हड्डियों से ''चट-चट'' करता
जल रहा था
और दूसरा
संगीत के गंधों पर कंधा दिये
हरियाली के साथ मचल रहा था

ठीक वहीं आकाश था
हमेशा सिर चढ़ जाने वाला
मार खाने पर भी खुशमिजाज बच्चे की तरह
भीतर-भीतर करता हुआ अजपा जाप
चुप रहने की आत्महंता कोशिश में

थोड़ा और ढुलक जाने पर समतल जमीन थी
जहाँ चारों ओर खून में डूबे पलाश थे
बहुत कुछ कर जाने की इच्छा से बुरी तरह हताश
बगल में फिर वही नदी थी
कई ओर से निचुड़ कर एकरूप दीखती
जो कभी सभी को
'समतल समतल' कहती पछाड़ खाती थी

कितना विचित्र था
अंत में फिर मिल जाना
एक दूसरे से जंगल का
नदी का और पहाड़ का
जो कभी अपने पर चढ़ने को पुकारता था

बिल्कुल स्वाभाविक था
कभी इसी रथ का झंझावात की गति से
उस पहाड़ी पर दाखिल हो जाना
और अब सर्वथा सहज था
सामने पड़े एक पल के रोड़े को
पहाड़-सी चुनौती मान चूल-चूल से हिल
ढलते-ढलते निढाल अपनी जगह रुक जाना

कितना पहचाना था
साँस तोड़ रही दिशाओं में फैलता 'बुदबुद' सा शब्द
अंधकार में चहक रही अदृश्य चिड़ियों का मर्मर
और अपनी गति के तारतम्य में
कभी का ठहर गया
पूरा जगत, सारा चराचर

 


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