hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

प्रेत-भाषा
राजेंद्र प्रसाद पांडेय


जीवन बचाने के लिए
तुम्हारा जिससे दूर रहना जरूरी है
जीवन पाने के लिए
मेरा उसी से फिर जुड़ना
मगर हो रहा है उल्टा
मौत से बचने के भय में
तुम जिंदगी के कंधों पर
लाश ढो रहे हो
मेरे नाम पर रोते-पीटते
और मैं उससे बिल्कुल दूर हूँ

मुझसे रहित इस शव द्वारा
तुम्हारे ऊपर लद कर
तुम्हारे अनुसार मेरे द्वारा की जा रही
और मेरे अनुसार तुम्हारे द्वारा की जा रहीयह यात्रा मेरे लिए
कोई मतलब नहीं रखती अब
मगर तुम लोगों के लिए
इसके बहुआयामी अर्थ हैं
यानी मैं छोड़ चुका हूँ
दोनों वक्त का एक खुराक खाना-पानी
नये-पुराने कपड़े
क्षण भर आच्छादित
धरती के दो-दो पग टुकड़े
खाट-कुर्सी के हिस्से
अच्छे-बुरे शब्द
और कटु-मधुर रिश्ते
जो अब सिर्फ तुम्हारे उपयोग को हैं

जीवन के लिए मौत का
हर पक्ष अज्ञात है
लेकिन गले लगाने पर
मौत की निगाह में जीवन
लंबे समय तक खेला
एक खेल है
जिसे उसके नियमों के साथ
हारने-जीतने का
हर गुर ज्ञात है

पर मैं अब स्थितप्रज्ञ हूँ
मेरा वैराग्य अखंड है
जय-पराजय का भाव तो
जीवन के मत्थे मढ़ा
एक अनिवार्य दंड है

मैंने तो चाहा नहीं
तुमसे तुम्हारे जर्जर-पुष्ट
कंधों का सहारा
संस्कार-भाषा के मंत्र
या आँखों का गुनगुना-नमकीन पानी
झूठ के पानी में
सच का दूध मिला कर
किसी तरह चलाये गये
जीवन-व्यापार के लिए
उसके समाप्त हो चुकने पर
बेकार दुहरा रहे हो
राम नाम सत्य है
मेरे लिए तो अब
न कुछ सत्य है और न असत्य
न ही इन सबका
मेरे लिए कोई अर्थ है
राख हो चुके ईंधन में
चिनगारी डाल-डाल कर
साँसें खर्च करना व्यर्थ है

क्या फर्क पड़ता है मेरे लिए
तुम चाहो तो इस शव को
नंगा-धड़ंगा
पड़ा रहने दो सड़ने को
इसी चौराहे पर छोड़ जाओ
मगर फर्क पड़ता है तुम्हारे लिए
तुम जिंदा हो इसलिए
तुम जवाबदेह हो
तुम्हें करना ही होगा
इसका निस्तारण
जवाबदेही मौत नहीं

जीवन के हिस्से है
जीवन का त्याग
जहाँ मौत की शुरुआत है
वहीं मौत का त्याग
जीवन के लिए पाप है
हालाँकि मैं
उस धरा से उठ चुका हूँ
जो मेरे जीवन के बहुत पहले से
पाप-पुण्य में लिप्त है
पाप-पुण्य के ही भाव से
धरती का जीवन अभिशप्त है
पाप की कड़ुआहट के दुख
और पुण्य की चाशनी के सुख
दोनों से लिबलिबा
एक शरीर छोड़ते-छोड़ते
अकड़े हाथों की हथेलियाँ
खुली रखकर मैं
साफ बता चुका हूँ
न मैं अपना-पराया कुछ लिये हूँ
न अच्छा-बुरा किये हूँ
खुली आँखों से भी
कुछ न देखते हुए
सिर्फ तुम्हें अपने को देखने के लिए
जाते-जाते ये दरवाजे
खोल गया था
मगर तुम्हारे बंद करने पर
अब ये बंद हैं अन्यथा

मौत की लय में खुली हुई आँखें
स्याह-सफेद भाषा में
लिखे मुक्त छंद हैं
मौत का रुतबा देख लो
तत्काल शुरू हुई
त्वरित सड़ांध में
भले भीतर से सड़ रही है
लेकिन जीवन से साक्षात्कार होते ही
अंग-अंग से फूलती
अकड़ रही है

तुम्हारी खुशी
तुम एक शव को
नहलाओ-धुलाओ
कपड़े पहनाओ
सभ्यता, समाज, संस्कृति, सुंदरता
ये जीवन की चीजें हैं
मौत का इस सबमें
कोई सहयोग नहीं
क्रियाओं द्वारा शब्द-संबंधों को
निभा देने के बाद

जीवन का महावाक्य
पूरा हो जाता है
पूर्ण विराम बाद क्रियाओं से
फिर उसकी शुरुआत नहीं
जीवन के सामने आ पड़े
हर मुर्दे के लिए
दो ही विकल्प हैं
या तो जमीन में दफनाना
या फिर आग लगा कर
ठंड में गर्मी और
अँधेरे में रोशनी फैलाना

चरम शांति जीवन से बिलगाव में है
पर मौत का भय
भगाने के लिए तुम
तरह-तरह के षट्कर्म कर रहे हो
वक्त-बेवक्त रो रहे हो
घर, शरीर, कपड़े धो रहे हो
शोक गीत, मंत्र, प्रार्थनाएँ गा रहे हो
उत्सवों के बाजे
शोक में बजा रहे हो
ठंडा, गरम, मादक पेय पी रहे हो
सादे, विशिष्ट व्यंजन खा रहे हो
यह जीवन का दुरुपयोग ही है
परम शांत को शांत करने के नाम पर
खुद धमाचौकड़ी मचा रहे हो
गोया जीवन के लिए मौत
एक ओर से खोटा
दूसरी ओर से खरा सिक्का है
जो चित्त गिरने पर मात्र एक शव है
पट्ट हो जाने पर वही
गाना-बजाना, खान-पान और उत्सव है

कितने भी कर ले मौत के संस्कार
एक दिन जीवन
पाला बदल कर
खुद मौत की ओर भाग आता है
तब अपवित्र को पवित्र सिद्ध करने का
कोई इरादा नहीं रह जाता

ऐसे नहीं लौटती
मौत की दुर्गंध में
जीवन की सुगंध
न शोकगीत गाने से
न दुख में डुबो-डुबोकर
तरह-तरह के
बाजे बजाने से

सच है कि अलग-अलग
रहने के बावजूद
मौत और जीवन का
स्त्री-पुरुष-सा गुप्त संबंध है
जीवन ही देता है मौत को भाषा
मौत बिना जीवन भी
भाँग पिये बंदर-सा
चंचल, उद्दंड है

इस प्रेत-भाषा का अंतिम
यही रहस्य है
जीवन की दृष्टि में
सब-के-सब मरे हुए
अस्पृश्य और म्लेच्छ हैं
मौत की गोद में
समझ और संवेदना की दृष्टि से
सभी समान, पवित्र
सर्व-निरपेक्ष हैं

 


End Text   End Text    End Text