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विमर्श

प्रगतिशील आलोचना और रामचरितमानस
सर्वेश सिंह


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साहित्य की प्रगतिशील चेतना के समक्ष, रामचरितमानस एक अत्यंत विवादास्पद कविता के रूप में आज मौजूद है। दलित एवं स्त्री धारा में यह उपेक्षित है। दलित गुटों ने तो इसे सार्वजनिक रूप से जलाया भी है। यह अलग बात है कि मानस की कथा में, भक्ति के सर्वोच्च अधिकारी काकभुशुंडि, शूद्र शरीर में ही जन्म-जन्मांतर भटकते हुए, राम कथा में लय हैं (तेहि कलजुग कोशलपुर जाई। जन्मत भएउ शुद्र तन पाई।। )। पूरे मानस में, और विशेषतः उत्तरकांड में, वे ही तुलसी की इस कथा के, शिव से भी बड़े, समादृत प्रवक्ता हैं। उधर, स्त्री-विमर्श में भी यह विरोध की प्रमुख किताबों में है। और यह भी अलग बात है कि सीता, साधिकार, स्वेच्छया, वन-गमन का चुनाव करती हैं (मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहिं उचित तप मो कह भोगू।।), मंदोदरी एक 'आर्गुमेंटेटीव' स्त्री है, और कैकेयी जैसी अधिकार-सजग तो भला कौन होगी। आजकल, स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से भी मानस के अंशों को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। आज की नई पीढ़ी ने इसे मात्र मंदिरों में भजन-कीर्तन के लिए एक धार्मिक किताब के रूप में मान लिया है। देख के हाथ जोड़ने और मत्था टेकने वाली किताब भर रह गई है यह - गेरुवे कपड़े में लपेट, ताक पर रखी हुई। सीने से तो भला कौन पढ़ा-लिखा लगाता होगा इसे आजकल!

क्या सचमुच मानस की कविता की अर्थवत्ता हमारे समय में खत्म हो चुकी है? भारत की अधिकांश जनता को जिस कविता ने अभी भी एक भाव-धारा में बाँध रखा है क्या उसका साहित्यिक और सामाजिक मूल्य अब कुछ नहीं है? क्या मानस धर्मांधता का प्रचार करने वाली एक खतरनाक पुस्तक है जिसे अब मंदिरों तक ही सीमित रहने देना चाहिए? या वह हिंदू-जिहाद का प्रचार करने वाली एक आसमानी किताब है? 'सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथ अमित अति आखर थोरे।।' का रचनात्मक आदर्श रखने वाला काव्य-ग्रंथ, रामचरितमानस, क्या आज प्रासंगिक नही है?

सच कहें तो मानस की इस दुर्दशा के पीछे उसकी अटपटी और भ्रामक व्याख्याओं का एक त्रासद इतिहास है। साम्राज्यवादी ब्रिटिश दिमाग ने जहाँ मानस को कुछ खास अर्थों में कैद करने की साजिश रची तो वहीं एक आजाद प्रगतिशील भारतीय मनीषा ने अपने पूर्वाग्रही विचार-पद्धति के सामने मानस को अनुपयोगी पाया। मानस के वास्तविक अर्थ को विचलित कर देने वाले इस पूरे प्रसंग का एक संक्षिप्त विश्लेषण इस संदर्भ में जरूरी है।

वस्तुतः, सर्वप्रथम ब्रिटिश काल में, तथाकथित आधुनिक शिक्षा के अनुरूप, ग्रियर्सन आदि विद्वानों ने तुलसी-साहित्य का एक आंशिक पाठ्यक्रम तैयार किया और साम्राज्यवाद के हितों के अनुरूप हिंदुस्तान में इसका पठन-पाठन चलाया। इस पाठ्यक्रम में तुलसी का साहित्य, विशेषकर मानस, मूलतः भक्ति और आध्यात्म के अर्थ में प्रतिष्ठित किया गया तथा उसकी गहन सामाजिक-सांस्कृतिक व्यंजना को छिपा लिया गया। बल्कि यह भी कि 'फूट डालो और राज करो' की कूटनीति के हिसाब से उसकी व्याख्याओं में तथाकथित ब्राह्मणवाद,पोंगापंथवाद, का चेहरा भी रोप दिया गया। हिंदी के मध्यकालीन तेजस्वी भक्ति-काव्य के केंद्र पर अंग्रेजों का यह सबसे सशक्त हमला था जिसका असर भविष्य पर भी पड़ना था, और वह बड़ी निर्ममता से पड़ा भी। जैसे हिंदू-मुस्लिम एकता को, वैसे ही तुलसी की समन्वयात्मक चेतना को भी, अंग्रेजों ने दो फाँक कर दिया।

ब्रिटिश काल में ही, लगभग उन्हीं के अनायास प्रभाव में, बीसवीं सदी के आरंभ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि ने तुलसी साहित्य पर पुनर्विचार किया। लोक में बेहद प्रचलित इस साहित्य की उन्होंने पुनर्व्याख्या की और लोकमंगल आदि प्रतिमानों से उसे सुसज्जित कर एक श्रेष्ठ साहित्य की संज्ञा दी। इस नए विचार के अनुरूप इस समय के पाठ्यक्रम भी बदले। किंतु इस नए पाठ्यक्रम में भी तुलसी अलौकिक भक्ति के ही प्रतीक ज्यादा बने रहे। बल्कि आ. शुक्ल ने तो एक कदम आगे बढ़कर उनका आध्यात्मिक महिमामंडन भी कर दिया। हालाँकि मानस की साहित्यिक प्रतिष्ठा हेतु आ. शुक्ल ने गंभीर प्रयत्न किए, किंतु उनकी दृष्टि में भी,कथा-वाचकों की तरह, धार्मिक-आध्यात्मिक प्रत्यय अत्यधिक विद्यमान रहे। दरअसल वे 'धर्म-भीरु' आलोचक थे। 'साधनावस्था', 'सिद्धावस्था', 'लोकमंगल' आदि साहित्येतर, योगशास्त्र और भगवद्गीता के प्रत्यय हैं जिन्हें खींच-खाँच कर उन्होंने मानस में फिट किया, पर रूढ़िबद्ध इन प्रतिमानों ने हिमालयी आध्यात्मिक वैराग्य ही अधिक जगाया। वैसे यहाँ तक तो ठीक भी था पर इंतिहा तो तब हुई जब उन्होंने चित्रकूट में, राम-भरत-मिलन-प्रसंग जैसी अद्भुत साहित्यिक अभिव्यंजना में, अंततः एक 'आध्यात्मिक छाया' देख ही ली -

"मानस में यह सभा एक आध्यात्मिक घटना है। हृदय की इतनी उदात्त वृत्तियों की एक साथ उद्भावना, धर्म के इतने स्वरूपों की एक साथ योजना, तुलसी के ही विशाल मानस में संभव थी। (गोस्वामी तुलसीदास, पृ. ७२)"

जाहिर है इससे एक साहित्यिक पाठक के मन में भी ठीक वही अर्थ बना जो मानस के कथा-वाचक, बाबा जी लोग, वर्षों से बनाते रहे और मछली फँसाते रहे। आध्यात्मिक रंग का भावन बुरा नहीं है किंतु साहित्य का अर्थ, इस प्रक्रिया में, एक दूसरी भूमि में शिफ्ट हो जाता है। आश्चर्य है कि खुद शुक्ल जी ने विद्यापति के संदर्भ में कभी आगाह किया कि - 'आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं'। अतः कह सकते हैं कि तुलसी के संदर्भ में उनकी आलोचनात्मक कोटियाँ - भावुकता, ज्ञान, शील, मर्यादा, स्वधर्म आदि - कथावाचकों के तर्ज की ही हैं। मानस के संदर्भ में यही उनकी सीमा है। हालाँकि, उन्होंने तुलसी साहित्य के सामाजिक और सांस्कृतिक दर्शन पर एक विमर्श जरूर शुरू किया पर यह विमर्श भी तुलसी के साहित्यिक शब्दों और अर्थों के उतना अनुरूप न था। बाद में, भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण और जातिगत श्रेष्ठता के आधार पर यह विमर्श खड़े होते गए और तदनुरूप सामयिक समाज व्यवस्था को तुलसी की ओट में सत्यापित करने का प्रयास होता रहा। हिंदी के विभाग इसी रंग में रँगते गए।

तब आश्चर्य नहीं कि अनायास ही बन गई इसी सीमा पर बाद में प्रगतिशीलों ने धुआँधार चोट की। साहित्य के प्रगतिवादी दौर में इस ग्रंथ की लोकप्रिय सत्ता को जबदस्त चुनौती मिली तथा इसके अर्थ को मंदिर की घंटियों की ध्वनियों के साथ नत्थी कर दिया गया - नान-सेक्युलर अर्थ। मानस के विचार पक्ष को प्रश्नांकित कर विषाक्त कर दिया गया और उसमें सामंती मूल्यों का साहित्यिक संस्थायन देखा जाने लगा। मुक्तिबोध जैसे कवि-आलोचक ने तो इसे धर्म-ग्रंथ ही घोषित कर दिया तथा बेहद पतनशील कविता बताकर इसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए। मानस को लेकर, हिंदी की प्रगतिशील चेतना आज भी अपने इसी स्वभाव की कैद में है।

आजादी के बाद, हिंदी जगत में, शुक्ल जी और प्रगतिशीलों से समर्थित समर्थित यही प्रवृत्ति व्याप्त रही और भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों में, हर स्तर के हिंदी पाठ्यक्रमों में मानस को इसी वैचारिक धुंध में पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा। एकमात्र अपवाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली था, जिसने अस्सी के दशक में, पाठ्यक्रम तो नहीं पर उसका पाठ जरूर बदला। यहाँ तुलसी साहित्य को भक्ति भाव से नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखने का प्रयास शुरू हुआ। मार्क्सवाद आदि प्राच्य विचारधाराओं के आलोक में इसके नए अर्थ निकाले गए। पर इनमें अधिकांश अर्थ पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे तथा जिनके आधार पर तुलसी के मानस और अन्य कविताओं की तीखी निंदा की गई। अर्थात तुलसी यहाँ लगाए/पढ़ाए तो गए पर 'भिगो भिगो कर इसे मारो' वाले भाव से, और इसलिए भी ताकि उनके साहित्य को एक पतनशील मूल्य के रूप में प्रतिपक्ष में खड़ा किया जा सके, विशेषकर निर्गुण कबीर के। जाहिर है, अंग्रेजों का भूत यहाँ सिर चढ़ के बोला।

कुल मिलाकर हिंदी में तुलसी साहित्य के पठन-पाठन के आज दो स्पष्ट वर्ग हैं; एक जो इसे घृणा भाव से पढता है, जिनमें दलित, स्त्री, आदिवासी, मार्क्सवादी आदि हैं; और दूसरा जो इसे पूजा भाव से पढता है, जिनमें तथाकथित ब्राह्मण-वादी वर्ग है। घृणा करने वाले, पाठ्यक्रमों में तुलसी के साहित्य से अपनी पसंद का अंश लगाते हैं तो पूजा करने वाले अपनी पसंद का। बल्कि ज्यादा सटीक यह कहना होगा कि अंश तो घूम-फिरकर एक से हैं पर व्याख्याएँ अपने-अपने मौज की होती हैं। ताज्जुब है कि कबीर के विचारों से तुलसी की कोई अनबन मध्यकाल में न थी पर आज दोनों को शत्रु के रूप में निरूपित किया जाता है। कबीर को तो प्रगतिशील पर तुलसी को पतनकामी घोषित किया जाता है।

अब तक पढ़ा-पढ़ाया जाता रहा मानस का यह पाठ पूर्वाग्रहपूर्ण, साजिशपूर्ण, दोषपूर्ण और अपर्याप्त है, तथा इसे अविलंब बदलने की जरूरत है। इसी सद्भाव से, प्रस्तुत लेख, विनयवत, तुलसी-साहित्य, विशेषकर मानस, के कुछ अप्रचलित अंशों, प्रसंगों, संदर्भों और उनकी निज व्याख्याओं को सामने रखता है, जो अब तक साहित्य और पाठ्यक्रमों की घृणित राजनीति में संभवतः जान-बूझ कर दबाए गए। आगे, क्रमवार विश्लेषित ये प्रसंग, मानस की शायद एक अलग और बेहतर छवि आपके सामने प्रस्तुत कर सकें तथा इस क्रम में यह महान कविता अपनी गलत और पूर्वाग्रही ऐतिहासिक व्याख्याओं से आजाद हो सके।

किंतु किसी भी विश्लेषण और व्याख्या से पूर्व, एक तथ्य ठीक से समझ लें कि मानस दोहरी संरचना का महाकाव्य है - लौकिक और अलौकिक यानि यथार्थातीत। तुलसी का अपना हृदय पहली में अधिक रमता है। मानस के शुरुआत में ही इसके संकल्प हैं। दरअसल, मानस के रूप में कोई उपनिषद या दर्शन-ग्रंथ लिखने का भाव उनका नहीं है। उनका संकल्प 'भनिति विचित्र सुकवि कृत' है। अर्थात वे कविता या साहित्य की रचना में प्रवृत्त होते हैं। इसीलिए, साहित्येतर उलझनों के शमन हेतु तुलसी समझ के निर्णायक सूक्ष्म सूत्र रचते हैं। ये सूत्र-चौपाइयाँ बालकांड के बत्तीसवें दोहे के बाद शुरू हो जाती हैं। ये मानस के साहित्यिक,कथात्मक स्वरुप की घोषणा करती महत्वपूर्ण चौपाइयाँ हैं। यथार्थ के कथात्मक-प्रस्तुतीकरण का ये एक मेयार गढ़ती हैं। इन्हें ध्यान से पढ़े तो तुलसी के कथाकार-मानस की सही समझ होगी। ये चौपाइयाँ कई पन्नों में फैली हैं। सिर्फ दो से मानस के कथा-शिल्प का अनुमान लगाएँ -

सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथा प्रबंध विचित्र बनाई।।
राम कथा के मिति जग नाहीं। अस विचार तिन्हके मन माँही।।

ध्यान दें तो आज का कथा-शिल्पी भी यही निवेदन करता है पाठक से। तुलसी इनमें ठीक वही बात कर रहे होते हैं जो आजकल की फिल्मों या उपन्यासों के आरंभ में लिखी होती है कि - यह घटना काल्पनिक है, किसी जीवित य मृत व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं... और कथा को अलौकिक या यथार्थातीत घोषित करना यथार्थ से पलायन नहीं अपितु उसकी काल-सीमा का अतिक्रमण करना है। कथा-काल के संदर्भ में, आधुनिक अज्ञेय, पुस्तक 'अपने बारे में' में 'क्रमहीन सह्वर्तिता' की जो चर्चा करते हैं, तुलसी वही धारणा रख रहे हैं। हर रचनाकार की चिंता होती है कि उसकी कृति शाश्वत वर्तमान में जिंदा रहे। अतः मानस में 'राम' और 'अवतार' शब्द को ही मत पकड़िए, 'नाना भाँति' पर भी ध्यान रखिए। धर्म या अध्यात्म की बात होती तो किस्सागोई के सिद्धांत रचने की आवश्यकता उन्हें न थी। वे लोक भाषा में, सिर्फ एक मार्मिक कथा भर लिखना चाहते हैं। इसीलिए ऐहतियातन कविता व कथा की सुचिंतित परिकल्पना के साथ वे आगे बढ़ते हैं। जायसी की तरह शाह-ए-वक्त तथा किसी पैगंबर की स्तुति उन्हें गवारा नहीं। वे वर्ण और अर्थ के सांसारिक देवता 'गुरु' की वंदना पद्य हेतु चाहते हैं - 'बंदउ गुरु पद पदुम परागा।' ज्ञान-दाता गुरु के प्रति यह समर्पण स्वाभाविक है। किसी को यह सामंती-प्रवृत्ति का प्रतीक लगे तो क्या कहा जाए। कविता की रचना प्रक्रिया भी वे स्पष्ट कर देते हैं। यहाँ किसी संशय या बाहरी प्रभाव का निषेध है। यह मुक्तिबोध के 'वाह्य के आभ्यांतरीकरण' की प्रक्रिया-सी ही है - 'हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहि सुजाना। जौ बरषई बर बारि विचारू। होहिं कवित मुकुतामनि चारू।' अद्भुत है कि ठीक यही प्रक्रिया कबीर की भी है - 'पिंजर प्रेम प्रकाशिया अंतस भया उजास। मुख कस्तूरी महमई वानी फूटी बास।' इस कविता का लक्ष्य भी स्पष्ट है। राम का केवल नाम भर है, वो भी दाल में छौंके की तरह। असली मंशा है - 'मोरे मन प्रबोध जेहि होई', 'मंगल करनि कलिमल हरनि'। सती भी शिव से वही कथा सुनना चाहती हैं जो 'सकल लोक हितकारी' है। 'सुरसरि सम सब कर हित होई' से भी यही स्पष्ट है।

तो फिर मानस के रचाव व अर्थ पर इतना घमासान क्यों है? दरअसल इसका कारण हमारे स्वनामधन्य प्रगतिशील आलोचक-गण हैं। एक प्रवृत्ति-सी बन गई है कि 'तुम कितना ही चीखो-चिल्लाओ,हम तो अपने मन या विचार(धारा) की ही सुनेगें।' तुलसी बार-बार विनय से कह रहे है कि यह एक काव्य-कथा है कोई पार्टी का एजेंडा नहीं, इसमें कुछ रस है तो ले लो नहीं तो यही मान लो कि - 'कवित विवेक एक नहिं मोरे।' किंतु यह विनय भी बेकार! कहीं से कोई चौपाई उठा ली और शूद्र-विरोध, स्त्री-विरोध आदि का आरोप चस्पा कर दिया।' विद्या ददाति विनयं' की गौरवशाली परंपरा में यह फाट आखिर कैसे पड़ गई? और फिर एक ऐसे कवि के साथ जिसके विनय व गलती मानने की कोई सीमा नहीं? आश्चर्य नहीं की तुलसी के राम पूरे समाज के सामने विनय का यही आदर्श रखते पग-पग पर दिखाई देते हैं।

 

(2)

मानस में, मूलतः, काशी और प्रयाग - इन दो ज्ञान केंद्रों का वैचारिक द्वंद्व है, जो उस समय शैव और वैष्णव के रूप में ख्यात थे। शैवागम में कुरीतियाँ भर गई थीं इसीलिए तुलसी राम के माध्यम से मानस में वैष्णव के प्रगतिशील विचार को सामने रखते हैं। बालकांड में इसे पढ़ा जा सकता है। हालाँकि समन्वयवादी होने के कारण तुलसी ने शिल्प के स्तर पर इसे छिपा लिया है।

ध्यान से देखें तो मानस में, शब्दों के सहारे सामाजिक विन्यास को उलटती-पुलटती एक अद्भुत शै है जो चमत्कृत करती है। मानस के अंतस में एक निर्णायक संघर्ष का विन्यास है जो ऊपर के बजबजाते भक्ति के शोर में सुनाई नहीं देता। मानस में अंतर्गुंफित यह संघर्ष बेजोड़ है और बेजोड़ है तुलसी का रण-कौशल। यह संघर्ष है - मर्यादा और अमर्यादा के बीच,शुद्ध और अशुद्ध भावना व विचार के बीच,सहज और प्रपंची भक्ति के बीच, सरल और जटिल जीवन दर्शन के बीच।

निर्गुण व सगुण अथवा कबीर और तुलसी के बीच नहीं बल्कि यह संघर्ष है मध्यकालीन भारत में, ज्ञान के दो महान भारतीय केंद्रों - प्रयाग और काशी के बीच। मानस, अपने समय में, काशी-केंद्रित ज्ञान का परिष्करण करने वाली और कुछ अंशों में उसका अदृष्ट विरोध करती, एक अद्वितीय कथात्मक-कविता है।

दरअसल, हर युग में ज्ञान के उत्सर्जन के विभिन्न केंद्र होते हैं। तुलसी के समय काशी और प्रयाग ज्ञान के दो प्रतिद्वंदी केंद्र रहे हैं। इतिहास में ऐसा पढ़ा जा सकता है। काशी में शैव विचार प्रबल थे तो प्रयाग में वैष्णव। वामाचार ने शैवागम में कुरीतियाँ भरी जिसका केंद्र काशी बना। उधर प्रयाग में वैष्णव एक प्रगतिशील विचार के रूप में प्रसार पा रहा था। तुलसी लोकहित में इसी ज्ञान की संभावना देखते हैं और उसके प्रसारण का संकल्प करते हैं, किंतु दूसरे की निंदा के बगैर। जाहिर है वे दोनों का समन्वय दिखाते हुए भी एक की प्रगतिशीलता हमेशा ऊपर रखते हैं और वह है - प्रयाग की ज्ञान-राशि। मध्य-काल में, सतह पर चल रही यह लड़ाई मानस में अद्भुत ढंग से चित्रित हुई है। मानस के अर्थ की यही अंतर्धारा है। शब्दों में छुपे इस भाव को, इस तनाव को, आपको महसूस करना पड़ेगा। मानस की बहिर्धारा में आपको सिर्फ राम, शिव, सीता या रावण दिखाई देंगें। एक जादुई लोक दिखाई देगा; भक्ति और धार्मिक प्रत्ययों से भरा हुआ। किंतु असली यथार्थ, बीच में भी नहीं,सतह पर है। प्रयाग में, नदियों के संगम से प्रेरित तुलसी यहाँ शुभ विचारों के संगम, और अशुभ विचारों के निस्तारण में तल्लीन हैं।

बालकांड के पहले दोहे के बाद ही प्रयाग के ज्ञान राशि की महिमा का वंदन व वर्णन शुरू हो जाता है - 'मुद् मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।' प्रयाग के संत-समाज में यह 'करम-कथा' साकार होती है। तुलसी इसी विचार और संत समाज की वास्तविक वंदना करते है जिसके 'चित हित अनहित नहि कोई' है। यह कर्मशील समाज है - 'तीरथराज समाज सुकर्मा।' यह प्रगतिशील विचार - 'सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा' का केंद्र है। यह विचार भक्ति का है किंतु ब्रह्मोन्मुख नहीं अपितु समाजोन्मुख - 'सुरसरि सम सब कर हित होई।' ब्रह्म से उन्हें मतलब भी नहीं। वे साफ-साफ कहते हैं - 'उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेहुँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।' अथवा 'ब्रह्म राम ते नामु बड़ बर दायक बर दानि'... (बालकांड, दोहा-25), यानी ब्रह्म से मुझे मतलब नहीं, नाम-रूप धारी सृष्टि में मैं नाम को अपनाता हूँ। और यह नाम उनके भक्त के मन में सामाजिक सक्रियता की आग है। तुलसी के लिए यह नाम 'सकल कलि कलुष निकंदन' है। तुलसी प्रयाग के संत समाज से उठे इसी स्वर को सहानुभूति, गहराई व व्यापकता देते हैं। इसी सद्ज्ञान व सद्कथा का जन-जन में प्रसार देखते हैं। इस कथा के संकल्प-कर्ता हैं भरद्वाज जो प्रयाग में रहने वाले अपने समय के प्रसिद्ध वैष्णवी ऋषि हैं - 'भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहिं राम पद अति अनुरागा।' वे तब के सर्वमान्य ऋषि याज्ञवल्क्य से जन-जन-स्पर्शी राम के बारे में प्रश्न पूछते हैं और इस तरह तुलसी उनके माध्यम से तब के प्रगतिशील प्रयाग-स्कूल की मान्यताओं का कथात्मक-संस्थायन करते है। भरद्वाज के ये प्रश्न टेढ़े है। बालकांड के तैंतालिसवें दोहे के बाद ये पढ़े जा सकते हैं। ये प्रश्न 'प्लांटेड' हैं। कुछ इस तरह कि - 'सोपि राम महिमा मुनिराया। शिव उपदेश करत करि दाया।' अर्थात पवित्र काशी के धारक जो शिव स्वयं ज्ञान-गुन संपन्न है वे भी राम की भक्ति करते हैं। आखिर वे राम कौन हैं? याज्ञवल्क्य इसका जो उत्तर देते हैं वही मानस-कथा है।

पूरी कथा में राम के विराट रूपक की ओट में शैवागम-प्रसूत तथा अन्य अनर्गल धार्मिक, सामाजिक विचारों का निरसन है जिसका केंद्र उस समय काशी बना हुआ था। हो न हो, इस वजह से ही मानस का काशी में तात्कालिक तीव्र विरोध हुआ हो। और यह विरोध सांकेतिक नहीं था अपितु तुलसी के प्राण दाँव पर लगे थे। किंतु तुलसी डटे रहे। कवितावली में तो यहाँ तक कह गए कि - 'काहू की बेटी से बेटा न बिआहिब / माँग के खाइब / मसीत में सोइब'। अंततः मानस की लोक स्वीकृति के आगे काशी को घुटने टेकने पड़े तथा राम-नाम के सहारे स्वच्छ सामाजिक संस्कारों का बीज बोती प्रयाग की ज्ञान धारा अविरोध प्रवाहित होने लगी। शिव-त्रिशूल पर खड़ी काशी से औघड़ों का निष्कासन हुआ और राम-राम कहते हुए हृदय एक दूसरे के नजदीक आए।

याज्ञवल्क्य शिव-पार्वती आख्यान से कथा शुरू करते हैं। मानस में यह कथा भी सोद्देश्य है। आँखे खोल कर देखें तो यहाँ राम की प्रभुता को शिव द्वारा स्वीकृत करवाया जाता है। शिव विवाह आदि प्रसंगों के माध्यम से शैवत्व की गरिमा को घटाया जाता है तथा उसके लोक रंजक, कदाचित, अगंभीर रूप की निर्मिति की जाती है। कथा-स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम शिव को परम राम भक्त के रूप में निरूपित किया जाता है। कुंभज ऋषि से सुनी राम-कथा के बाद उनकी स्थिति 'सुनी महेश परमसुख मानी' तथा 'कही संभु अधिकारी पाई' और 'कहत सुनत रघुपति गुन गाथा' जैसी हो जाती है। तत्पश्चात राह में जाते हुए सीता के वियोग में घूमते राम-लक्ष्मण को देखकर सती के मन में संदेह होता है। शिव मना करते हैं किंतु सती परीक्षा लेती हैं और असफल हो लौट आतीं हैं। किंतु शिव सती के इस कृत्य को स्वीकार नहीं कर पाते - 'जौ अब करहुँ सती सन प्रीती। मिटई भगतिपथु होई अनीती।' अंततः नीलकंठ शिव, राम भक्ति की गरिमा की रक्षा हेतु, सती-सी पत्नी के परित्याग का संकल्प लेते हैं - 'एहिं तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। शिव संकल्प कीन्ह मन माहीं।' स्वभाव से कठोर शिव-ज्ञान को यहाँ मृदु राम-भक्ति के सामने झुका दिया जाता है, और वो भी एक बड़े बलिदान के साथ।

किंतु तुलसी के लिए इतना ही काफी नहीं था। काशी के सामाजिक-सांस्कृतिक दबाव को वे समझते थे। राम को अभी और जमाना था उन्हें। शिव की सामाजिक धार्मिक सत्ता इतनी कमजोर न थी। भाँति-भाँति के पंथ निकल आए थे जो समाज को अँधेरी खाइयों में ले जा रहे थे तथा जिनकी सत्ता मजबूत थी। अतः जरूरी था शिव-मूर्ति पर और काले धब्बों का। इसके लिए वे शिव-विवाह का प्रसंग रचते हैं, जिसकी मानस की कथा में कोई आवश्यकता न थी। विवाह एक गंभीर सामाजिक प्रथा है। अतः तुलसी शिव को बीच जनवासे में बेपर्दा करते हैं। शिव की बारात में सारे देव गण शामिल हैं। सब साथ चलते हैं कि अचानक विष्णु का यह कथन अचंभित करता है - 'विलग विलग होई चलहु सब निज निज सहित समाज।' जब सब अलग हो जाते हैं तो शिव-गणों का दृश्य कुछ यों दिखता है - 'कोउ मुख हीन विपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू। विपुल नयन कोऊ नयन विहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।'

मानस में यह अपूर्व वर्णन है। कालिदास में भी यह साहस न था। कई पंक्तियों में वर्णित शिव के बारातियों का ऐसा वीभत्स चित्रण है कि जिसका कोई सानी नहीं। सारा नगर देख के डरा हुआ है। लोग हिमवंत की बुराई करते हैं कि कहाँ से दूल्हा चुना और बारात बुला ली। ऐसी सामाजिक निंदा कि शिव जैसा वर किसी को न मिले। यह खबर स्त्री-समाज में भी फैलती है। सती की माँ मैना मूर्छित हो जाती हैं। होश आने पर उनका स्वर अत्यंत दारुण है। उसी कांड के 95 वें दोहे के बाद उनका प्रचंड विलाप शुरू होता है - जेहिं बिधि तुम्हहि रूप अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा। भले ही अपजस हो, सती को लेकर जल मरें, किंतु मैना यह विवाह नहीं चाहती। ऐसा लगता है कि जैसे स्वयं सती का मन भी डिगा हुआ है। किंतु एक भारतीय नारी की तरह वे वर को स्वीकार कर लेतीं हैं - 'जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं। दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं। और जैसी की परंपरा है सारा स्त्री-समाज दुख को घोंट जाता है - 'सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं। बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं।' विद्यमान सामाजिक जड़ता के भीतर स्त्री-संवेदना का यह प्रगटन स्तुत्य है। मैना व सती की सोंच में पुरुष-वर्चस्ववादी सत्ता से बाहर निकल आने की बेचैनी भी साफ है। मानस में यह कथा के भीतर का एक लोकतांत्रिक चित्र है। और इस स्तर के चित्रों की एक अनगिन मनोहर श्रृंखला है। हाँ,चरित्रों के आत्म-कथनों में कहीं-कहीं स्त्री-विरोध, पुरुष-विरोध दिखता है, किंतु वे चरित्र-समय के अंश हैं, कवि-समय के नहीं। अतः, नारी-वादी चिंतकों से अनुरोध है कि वे मानस को फिर से पढ़ें। केवल अनुसुइया के उपदेशों पर ही न जाएँ।

खैर, शिव-विवाह के विपरीत राम-विवाह-प्रसंग का वर्णन शोभातीत है। केवल एक दृश्य देखें - 'चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारी। लिए आरती मंगल थारी। गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।' इस दृश्य के आगे शिव-विवाह का दृश्य अमंगलकारी ही नजर आता है। कौन राम जैसा वर छोड़ औघड़ शिव को चाहेगा!

किंतु शिव-मूर्ति-भंजन का यह खेल तुलसी यहीं खत्म नहीं करते। आगे धनुष भंग प्रसंग में भी तुलसी शक्ति-सामर्थ्य के आधार पर शिव को एक इंच और छोटा करते हैं। और इस लपेटे में परमवीर परशुराम भी आ जाते हैं। शिव-धनु, शिव के अजित शक्ति का प्रतीक था। किंतु उसे राम बात ही बात में तोड़ देते हैं - 'लेत चढ़ावत खैचत गाढ़े। काहु न लखा देख सब ठाड़े।' किसी ने देखा भी नहीं और धनुष टूट गया। और इस पर तुलसी की खुशी देखें - 'कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति वचन उचारही।' सारे जन, देव भी, इस पर खुश हैं - 'देखि लोग सब भये सुखारे।' ठीक इसी समय परम शिव-भक्त और पराक्रमी परशुराम का प्रवेश होता है। आते ही वे शिव-धनु-भंजक का नाम पूछते हैं। तुलसी का कथा-सेंस देखें कि वे परशुराम के मुकाबले लक्ष्मण को खड़ा कर देते हैं। कुछ इस भाव से कि तुम्हारे लिए तो यही काफी है! और अपने समय के महान योद्धा को लक्ष्मण खुली चुनौती देते हैं - 'इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं।' न केवल चुनौती अपितु उस शिवभक्त को सरे दरबार अपमानित भी करते हैं - 'मन मलीन तन सुंदर कैसे। विष रस भरा कनक घट जैसे।' लक्ष्मण को कोई चुप नहीं कराता। केवल मीठे संकेतों में राम 'नयन तरेरे' हैं। परसुराम को तुलसी एक भारी दबाब भरी स्थिति में ला खड़ा कर देते हैं। लोग उन्हें हँसते हुए देखते हैं। सारे राजा-गण तटस्थ हैं। परशुराम कुछ देर तक अपना फरसा पटकते हैं किंतु वे मन से हारने लगते हैं। अब अंतिम चोट स्वयं राम करते हैं। लगभग धमकी भरे स्वर में कहते हैं - 'जौ तुम औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।' और मन से हारे वीर को बाद में राम कुछ मधुर वचन कहकर खुश करते हैं तथा उसे उसके नए कर्म क्षेत्र - तपोवन - की ओर विदा करते हैं - 'कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।' इस तरह शिव और एक परम वीर शिव-भक्त का बालकांड में ही करुण अवसान हो जाता है तथा राम की शक्ति-सामर्थ्य का डंका डिम-डिमाने लगता है।

इस प्रकार धनुष-भंग, विवाह रूपी सामाजिक संस्कार आदि प्रसंगों का निर्माण कर तुलसी शिवत्व को अगम अगोचर ही नहीं अपितु कड़े शब्दों में कहें तो अशक्त, निर्वीर्य और असामाजिक बना देते हैं। और फिर तुर्रा ये कि उन्हीं के मुँह से राम की लोकरक्षक एवं मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि निर्मित कर देते हैं। 'शिव द्रोही मम दास कहावा' जैसी पंक्तियाँ केवल संतुलन हेतु हैं। शिव-छवि को जहाँ मेटना था उसे वहाँ मेटा जा चुका होता है मानस में। बाद में मानस में प्रयाग के उसी वैष्णवी ज्ञान का काव्यायन है जिसे तुलसी प्रगतिशील समझते हैं। स्वयं शिव से कथा कहलाकर तुलसी इसका स्थापन करते हैं। इस तरह राम 'वर' और शिव 'अवर' के रूप में इन प्रसंगों का शमन हो जाता है। आगे शिव मानस कथा की व्यास गद्दी के वरिष्ठ महंत से अधिक नहीं नजर आते - 'महामंत्र जोई जपत महेशू। काशी मुकुति हेतु उपदेशू।'

मानस में तब यह आकस्मिक नहीं कि राम के वन गमन प्रसंग में प्रयाग पहुँचने पर तुलसी का शाब्दिक आह्लाद देखते ही बनता है - 'को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।' तुलसी का यही पुण्य प्रदेश है - 'चारि पदारथ भरा भंडारू। पुन्य प्रदेश देश अति चारू।' यह प्रगतिशील विचारों का गढ़ है जो - 'सपनेहुँ नहिं प्रतिपक्षिंह पावा।' और भरद्वाज से राम का मिलन प्रसंग तो अद्भुत है - 'मुनि मद मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।' इतना ही नहीं, राम से चित्रकूट मिलने जाते भरत का भारद्वाज से विशेष मिलन-प्रसंग भी तुलसी ने रचा है। यह वर्णन भी सोद्देश्य है। किंकर्तव्यविमूढ़ भरत के मन को भारद्वाज पूरी तरह राम-भक्ति में सान देते हैं तथा भरत का चरित्र तीरथराज प्रयाग की कृपा से और भी तीव्रतर अग्रसर होता है।

मुझे तो लगता है की उत्तर-कांड का कलि-वर्णन-प्रसंग भी काशी के जन जीवन का ही चित्र है। कवितावली में भी तुलसी का मन इसी दुश्चिंता से भरा हुआ है। इस प्रकार मानस में तुलसी, शिव के नाम पर काशी की ज्ञान-राशि पर सवार इस व्यभिचार पर, प्रयाग की ज्ञान-कुठार से कठोर हमला करते हैं तथा विकल्प रूप में वैष्णवी राम के मर्यादित चरित्र की स्थापना करते हैं। यह प्रयाग स्कूल की ऐतिहासिक विजय थी। कागज के पन्नों पर लड़ी गई, बिना ललकारे और बिना हाथापाई। घरों,मंदिरों में अहर्निश शुरू हुए राम-कीर्तनों ने सजीव शिव को कैलाश में बर्फ-समाधि दे दी। वे दुरूह भक्ति की चीज बन गए। सरसता राम के हिस्से आई। देखें,तो यह युगीन आवश्यकता भी थी।

यह उस युग में मानस की सबसे बड़ी साहित्यिक सार्थकता थी। एक ऐसी सार्थकता जिसके लिए कविताएँ तरसती हैं। पर हमारे पाठ्यक्रम निर्धारकों के पास इतना वक्त और अवसर कहाँ जो इस तथ्य पर ध्यान दें और इन कोणों से भी इस कविता का अध्ययन-अध्यापन करें! महानुभावों! पाठ्यक्रम केवल डिग्री के लिए ही नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए भी होते हैं। पर इस शायर से ज्यादा अब और क्या कहें -

वो लाश थी इसलिए तैरती रह गई
डूबने के लिए जिंदगी चाहिए।

 

(3)

रामचरितमानस का उत्तर कांड, तुलसी द्वारा मान्य भक्ति और दर्शन का निचोड़ है। यहाँ काकभुशुंडि, गरुण को राम भक्ति का ज्ञान देते हैं। यह भक्ति अपने आप में अनोखी है। मानस के नाम पर मठों में प्रचलित जो भक्ति आज दिखती है, ठीक वही मानस द्वारा अधिकृत नहीं है। काकभुशुंडि द्वारा गरुण को दी गई यह भक्ति अमूर्त, अगोचर नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से मन के निग्रह, उसकी पवित्रता और सामाजिक सक्रियता से जुड़ी है। यहाँ सांप्रदायिक भक्ति का भुशुंडि निषेध करते हैं, तथा उसे सामाजिक सामंजस्य का हथियार मानते हैं। किंतु मानस में ये काकभुशुंडि आखिर हैं कौन?

यह कितना आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण है कि जिस रामचरितमानस को दलित विरोधी ग्रंथ कहा जाता है, उसमें रामभक्ति के सर्वोच्च अधिकारी काकभुशुंडि हैं, जो शूद्र-ब्राह्मण के, कर्म-फल-परिणाम और जात्यांतर के चक्र, में लय हैं - 'तेहि कलजुग कोशलपुर जाई। जन्मत भएउ शूद्र तन पाई।।' वे तुलसी के साथ-साथ शिव व स्वयं राम द्वारा भी समर्थित, राम भक्ति के प्रखर प्रवक्ता हैं - 'मति अकुंठ हरि भगति अखंडा' राम भक्ति का सामाजिक-सार, तुलसी व शिव के मत में, केवल काकभुशुंडि ही जानते हैं। इसीलिए विष्णु के वाहक गरुण, मोहवश, सशंकित, जब शिव के पास जाते हैं, तो शिव रामभक्ति के मर्म को समझने हेतु उन्हें काकभुशुंडि के पास ही भेजते हैं। काकभुशुंडि और गरुण का यह संवाद ही मानस का असली दर्शन है जो अद्वितीय है। नारद और शांडिल्य से अधिक बेहतर और लौकिक, भक्ति की अवधारणा काकभुशुंडि उत्तरकांड में रखते हैं। शिव तो कथा सुनाकर पार्वती का मोह भर हरते हैं पर मानस की धरती पर राम कथा और भक्ति के असली मर्मज्ञ भुशुंडि ही हैं।

काकभुभुशुंडि की जीवन दास्तान अभिशप्त है। किसी जनम में वे शूद्र कुल में अवध में जन्मे। शिव की परम भक्ति की। उसके अलावा हर देवता की निंदा की - 'शिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।' यानी अवध में रहते हुए राम से विरोध! गुरु समझाते रहे किंतु यह अभिमान इतना बढ़ा कि - 'हरिजन द्विज देखे जरउँ करउँ विष्णु कर द्रोह।' पर, गुरु अपमान व विष्णु द्रोह का फल उन्हें चखना पड़ा। स्वयं शिव उन्हें भयंकर शाप देते हैं - 'अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा' हालाँकि काकभुशुंडि द्वारा विनती करने पर वे द्रवित भी होते हैं तथा अखंड राम भक्ति का वरदान भी देते हैं - 'अप्रतिहत गति होइहि तोरी'। भक्ति की अखंड पिपासा में फिर शूद्र और ब्राह्मण के रूप में अभिशप्त, अनेक जन्मों में भटकने के बाद दुबारा अवध में जन्म लेने पर काकभुशुंडि को प्रबोध होता है तथा राम भक्ति दृढ़ होती है - 'रघुपति जस गावत फिरहुँ छन छन नव अनुराग।' इस प्रकार एक शूद्र अपनी दृढ़ता से राम भक्ति का सर्वोच्च अधिकारी बनता है। पूरे उत्तरकांड में ज्ञान-भक्ति के आधिकारिक निर्णायक यही शूद्र-ऋषि काकभुशुंडि हैं। यही भुशुंडि राम को 'गरीब निवाजे' घोषित करते हैं।

आश्चर्य होता है कि लोग - 'ढोल गँवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।' जैसी एक लाइन तो प्रगतिशील जन चट से देख लेते हैं किंतु पूरे उत्तरकांड में काकभुशुंडि को नहीं देख पाते जिसे तुलसी राम भक्ति का सिरमौर बनाते हैं। इन्हीं एक-दो लाइनों के आधार पर आज तक मानस को दलित विरोधी ग्रंथ सिद्ध किया जाता रहा है, जबकि भक्ति की धुरी मानस में काकभुशुंडि के हाथों दे दी गई है। अतः विनय है कि मानस को समग्रता में देखें और 'काकभुशुंडि-प्रसंगों' को पाठ्यक्रमों में शामिल करें तथा उसके आधार पर मानस की दलित चिंता पर फिर से विचार विनिमय करें।

 

(4)

मानस जायसी के पद्मावत से भी बड़ी एक ट्रेजिक प्रेम कथा भी है जिसका अवलोकन लंका कांड के गंभीर अध्ययन से किया जा सकता है, जहाँ प्रेम और संघर्ष के नितांत लौकिक छंद मिलते हैं। अफसोस कि यह कांड पाठ्यक्रमों में कहीं नहीं है। वास्तव में, यही कांड मानस का हृदय-स्थल है, आ. शुक्ल द्वारा घोषित अयोध्याकांड नहीं। विशुद्ध राम-कथा-अमृत इसी कांड में है तथा जीवन का पियूष भी रावण की नाभि में नहीं बल्कि उसके दिल में है जिसे व्याख्याकारों द्वारा लाज वश दिखाया नहीं जाता। इस ओर, लंका-कांड में, त्रिजटा इशारा करती है। राम द्वारा बार बार सिर में बाण मारने से भी, रावण नहीं मरता है। तब त्रिजटा, चिंतित सीता से कहती है -

कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी।।
प्रभु ताते उर हतइं न तेही। एहि के हृदय बसत वैदेही।।
एहि के हृदय बस जानकी जानकी उर मम वास है।
मम उदर भुवन अनेक लागत बान सब कर नास है।।
सुनि वचन हरष विषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटा कहा।
अब मरिहि रिपु एहि विधि सुनहि सुंदरि तजहि संशय महा।।
काटत सिर होइहि विकल छुटि जाइहि तव ध्यान।
तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ।।
                           (लंकाकांड, दोहा-99)

अर्थात, त्रिजटा कहती है कि, हृदय में बाण लगने से ही रावण मरेगा। पर राम वहाँ मार इसलिए नहीं रहे क्योंकि रावण के हृदय में सीता बसती हैं। यानी राम को ऐसा विश्वास हो चुका है या फिर तुलसी इस भाव-विन्यास को रचना जरूरी समझते हैं। फिर अगली दो पंक्तियों में तुलसी का भक्त मन मिथकन करता है। किंतु अगली चार पंक्तियाँ अत्यंत मार्मिक, मनोवैज्ञानिक - और इन दोनों ही अर्थों में साहित्यिक हैं। सीता के हर्ष और विषाद को परख, यहाँ त्रिजटा बताती है कि बार बार रावण का सिर राम इसलिए काट रहे हैं जिससे वह सीता का ध्यान भूल जाए। और जिस क्षण वह सीता की यादों से मुक्त होगा तभी वे उसे मारेंगे। यानि सीता की प्राप्ति की वासना के बल पर जो रावण लड़ रहा है उसे मारना आसान नहीं। अतः, उसका ध्यान-भंग जरूरी है।

शायद इन चौपाइयों की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। देखें तो, तुलसी की यह अद्भुत अभिव्यंजना है। रावण मर नहीं रहा या राम उसे मार नहीं रहे क्योंकि उसके हृदय में जानकी का प्रेम है। रावण उसी शक्ति से लड़ रहा है। महाकवि निराला के शक्तिपूजा की भीमाकाय कोई दुर्गा नहीं, अपितु 'सीतोन्मुखी-प्रेम-भाव' ने उसे अपने अंक में धारण कर रखा है। वह अपने शक्तिशाली आत्म में है। अहंकार में नहीं, प्रेम की 'पीर' में है। अतः उसका ध्यान-भंग जरूरी है और इसीलिए राम उसे बार बार घायल कर रहे हैं - ध्यान-च्युति हेतु। क्योंकि मारना दिल में है, और दिल में सीता हैं। अजीब है धनुर्धर राम की मनःस्थिति! शत्रु अब अकेला बचा है, किंतु मारने की दुविधा है। मारना हृदय में है, किंतु घात सिर पे। रावण के बल से अभिभूत हैं राम शायद। एक स्त्री की कामना से युक्त दुर्निवार-योद्धा। मायावी राक्षस किंतु अडिग। अकेला बचा, मूर्क्षित, सारथी युद्ध-क्षेत्र से भगा लाया, किंतु पुनः वापस आ राम को ललकारता हुआ।

शत्रु के वध का एक नैतिक संकट! एक खिसियाहट! प्रचंड प्रेमाकुल योद्धा रावण के सामने संयमी राम किंकर्तव्यविमूढ़! और तब तुलसी उस मिथक को बीच में लाते हैं। रावण के न मरने पर राम विभीषण की ओर देखते हैं, और विभीषण वह रहस्य बताते है -

नाभिकुंड पियूष बस याके। नाथ जियत रावनु बल ताके।।

और तब संयमी राम में प्रचंड क्रोध का जागरण होता है। यह वीर का क्रोध नहीं लगता। राम भेद पा जाते हैं रावण का। दिल को भेदना मुश्किल था शायद। राम ने रावण की आँखों में कुछ देख लिया था। (बाद में सीता की अग्निपरीक्षा संभवतः इसी कारण होती है।) मानस को अगर ठीक से बाँचे तो ठीक यहीं पर राम की आँखों में अमर्यादित क्रोध प्रवेश करता है। तुलसी बहुत सँभालते हैं, किंतु शब्द बेवफाई पे उतर आते हैं। संशयी, दुविधाग्रस्त राम, क्रूर और असयंमित तरीके से रावण पर वाण-प्रहार करते हैं -

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर इकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फणीश ।। (लंकाकांड, दोहा-102)

और इस तरह राक्षस मर जाता है। परम शिव-भक्त, काल को भी जीतने वाला। 'सदा स्वार्थी' देवता फूल बरसाते है। आखिर, राम-विमुख को कौन बचाए!

पर ठहरिए। शब्द सर्जक के गुलाम नहीं। राक्षस मरता है, रावण नहीं। उसकी मौत तो तुलसी के हाथ से फिसले शब्दों ने फ्रीज कर दी है। मृत्यु के बाद भी उसमें 'वह' जीवित है। समुंदर में क्षोभ है और पर्वतों में कंपन। अंग-अंग भंग है। कोई राम के चरणों में पड़ा है तो कोई मंदोदरी के पास गिरा। किसी से बानर भालू खेल रहे हैं। किंतु, दो टुकड़ों में बँटे सिर वाले रावण के मुख से जिजीविषा की दुर्दम्य गर्जना जारी है -

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा।।
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ राम रन हतौं पचारी।।

रक्त से लथपथ, धरती में धँसा वह राम को पकड़ने के लिए दौड़ता है। राम उसका सर काट उसके दो टुकड़े कर देते हैं। चीत्कार करते, मरते हुए भी, वह राम को युद्ध के लिए ललकारता है। पर, यह राक्षस की चीत्कार नहीं लगती। कुटिलता समझौता-परस्त होती है। मानस का रावण, कथा-चरित्र है। त्रिजटा के संकेत के साथ, दूसरी चौपाई ध्यान से पढ़ें। शब्दों का इशारा साफ है।

मानस में, यह त्रिकोणात्मक प्रेम की अद्वितीय धरती है। यहाँ शुद्ध सांसारिक प्रेम की कथा कही जा रही है, जिसे कभी-कभी भक्ति-परक प्रत्ययों के बादल ढक लेते हैं। हालाँकि मानस में वे प्रत्यय अलग हैं और कथा अलग।

मानस में यह नितांत सांसारिक आवेग है और मानस के साहित्य में टँगा एक 'मिथकीय-क्षण' है, अर्थात मनुष्य के भीतर की मनुष्येतर शक्तियों का प्रस्फुटन। हर कथा इसे पाना चाहती है। किसी कलाकृति का सर्वोत्तम क्षण, जिसमें घनीभूत भावनाओं का संवेग और ताप आँख खोल दे। जेम्स ज्वायस ने जिसे 'एपीफेनी' के क्षण कहा है। इन्हीं क्षणों में अपने भीतर दबे/दबाए सत्य से साक्षात्कार होता है। होमर के 'हेक्टर' और 'एखिलीस' ऐसे ही पात्र हैं। महाभारत का 'कर्ण' यही त्रासदी भोगता है। मानस की कथा के इन्हीं क्षणों के स्तर पर यथार्थ की गंगा बहती है। किंतु हम ऊपर के जल में तैरते फूल-मालाओं को मानस समझ बैठते हैं।

क्या मानस के ये अंश पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं बनाए जा सकते? और क्या इन हिस्सों की उपरोक्त व्याख्या अप्रगतिशील और असंगत है? आखिर किस साहित्य में प्रेम व जीवन की रूपकात्मक अभिव्यंजना नहीं की जाती? और प्रार्थनाएँ - सियाराममय सब जग जानी - क्या धार्मिक प्रपत्तियाँ मात्र हैं? अच्छा साहित्य क्या अपने आप में एक दीर्घ प्रार्थना नहीं है? क्या इलियट का 'वेस्टलैंड' ओम शांति शांति में खत्म नहीं होता?

बहरहाल, अब इसी कांड का यह चित्र भी देखें जहाँ अंतिम युद्ध में राम-रावण युद्ध-क्षेत्र में आमने-सामने हैं। प्रतीकों में चित्रित कर लड़ाई के इस प्रसंग को तुलसी ने अद्भुत रूप से साहित्यिक बना दिया है। रावण की सारी सेना मारी जा चुकी है। किंतु, 'मैं अकेल कपि भालु बहु' देखकर भी, वह युद्ध से विरत नहीं होता। चारों ओर से उस पर प्रहार हो रहे हैं। राम के असहनीय बाणों से घायल उसका शरीर युद्ध क्षेत्र में चुनौती देता भटक रहा है -

काटे सिर नभ मारग धावहि। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुवीर कोसलाधीसा।।

लगभग मूर्छित तब क्रोध में वह विभीषण पर शक्ति छोड़ देता है जिसे राम अपने ऊपर ले लेते हैं और मूर्छित हो जाते हैं। उन्हें युद्ध क्षेत्र से बाहर ले जाया जाता है। इधर विभीषण रावण पर हल्ला बोल देते हैं किंतु उस दशा में भी वह उन्हें पटखनी दे देता है। विभीषण थक जाते हैं और उनकी सहायता हेतु हनुमान पहाड़ उठाए आते हैं और जोर से उससे रावण को मारते हैं। गिरे हुए रावण के सीने पर फिर वे एक जोरदार लात मारते हैं। पर रावण काँपते खड़ा रहा - 'ठाढ़ रहा अति कंपित गाता...' पुनः शक्ति से भर उसने हनुमान पर जोरदार प्रहार किया और हनुमान पूँछ फैला आसमान में उड़ गए। उसने उनकी पूँछ पकड़ ली और पटकने लगा। और जब लगभग हनुमान हारने लगे तो अन्य वानर भालू उनकी सहायता के लिए आ पहुँचे। रावण माया रचता है। एक दूसरी माया रच राम उसे काट देते हैं।

मानस में माया का यह खेल दुतरफा है। एक राक्षसी माया तो दूसरी ईश्वरीय। कोई किसी से कम नहीं है माया दिखलाने में!

अब, राम के आदेश से सारे वानर-भालू एक साथ उस पर धावा बोलते हैं। वह अब अकेला है। एकदम अकेला। केवल सारथी साथ है जो लड़ते नहीं। हनुमान, अंगद, नल नील आदि सब उस पर टूट पड़ते हैं। एक अमानुषिक, अनैतिक हमला उस पर किया जाता है। मानस के शब्द यही इशारा करते हैं। नल-नील का वार कुछ यों है -

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी।।
तब नल नील सिरन्ह चढ़ि गयउ। नखन्हि लिलार बिदारत भयउ।।

किसी ने नाखून से उसका जंघा काट लिया, तो कोई उसे लात मार भाग चला। नल और नील उसके सिर पर चढ़ गए और नाखूनों से उसका मस्तक बिदार दिया। किंतु 'रुधिर देखि बिषाद उर भारी' के बावजूद उसमें वो जूनून है जो कम नहीं होता। प्रदोष (संध्या) के समय तक हनुमान सहित अधिकांश बंदरों को वह मूर्छित करने में सफल रहता है और सफलता में हँसता है।

किंतु ठीक इसके बाद रामायण में महाभारत की युद्ध शैली आकार लेती है। रावण की दशा ठीक अभिमन्यु की तरह हो जाती है। संध्या के बाद युद्ध वर्जित है। पर जांबवंत इस नियम का उल्लंघन करते हैं। धर्म-युद्ध का चौखटा यहाँ टूटता है। महाभारत में तो दिन का समय है, व्यूह है, पर यहाँ रात्रि है और दुश्मन का चेहरा भी नहीं दिख रहा। रात्रि में, समस्त वानरों, भालुओं के साथ जांबवंत रावण को घेरकर मारने लगते हैं। और अंत में रावण की छाती पर एक जोरदार लात मारते हैं। मूर्छित हो वह गिर पड़ता है। गिरे हुए अचेत रावण की छाती पर जांबवान कई लात और जड़ वीर भाव से वापस लौट आते हैं। राम, जांबवंत को कृतज्ञता की नजरों से देखते हैं। उधर, अधमरे रावण को सारथी घर लाता है। यह पूरा प्रसंग तुलसी के छंद में पढ़ने योग्य है -

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर।।
मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा।।
संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी।।
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना।।
देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता।।
छं. - उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा।।
मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ।
निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो।।

तो, भक्ति-धर्मी चौपाइयों के बीच एक अधर्म चलता रहता है। तुलसी खुद चौंके हुए हैं और ऐसा लिख जाते हैं - 'भयउ क्रुद्ध रावण बलवाना'। ऐसा लगता है जैसे तुलसी सत्य-असत्य के दर्पणों को तेजी से नचा रहे हों। दुनिया की गर्द से लिपटे शब्द, गीली मिट्टी-से उनके हाथ से फिसल रहे हैं और वे, भक्ति के प्रत्ययों से, उन्हें ढकने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं। देखा जाए तो, मानस की कथा को, ठीक इसी जगह से वे उठाते है पर, लिखते-लिखते यहाँ पँहुच, अब असमंजस में पड़ जाते हैं। वे कुछ और लिखने का बार-बार उपक्रम करते हैं पर कविता ठीक वही लिखना चाहती है जिसे तुलसी ने कभी वैसा ही सोचा था। कवि और कविता के बीच चलने वाले इस द्वंद्व को देख, अज्ञेय की यह कविता, तब बरबस याद हो आती है -

मैं कवि हूँ।
_______
मैं सच लिखता हूँ :
लिख-लिख कर सब
झूठा करता जाता हूँ।
तू काव्य
________
तू छलता है,
पर हर छल में
तू और विशद, अभ्रांत,
अनूठा होता जाता है।
(चक्रांत शिला, अज्ञेय)

और इस द्वंद्व की परिणति क्या है? मानस का, यह एक आश्चर्यजनक, किंतु बेमिसाल दृश्य है! अद्भुत बिंब है... धोखे से मार कर मूर्छित कर दिया गया रावण, हाथों में भालुओं को दबोचे ऐसा लग रहा है जैसे रात्रि के समय भौरे कमलों में बसे हुए हैं। रथ से गिरे अचेत रावण को जांबवंत बेतरह लातों से मार रहे हैं - वह भी, त्रेता युगीन युद्ध क्षेत्र में। साथ बचा सारथी उसे बचाने का जतन कर रहा है।

पर, वासना अभी भी मरी नहीं है और न ही तुलसी का कवि ही। मूर्छा से उठने पर, रावण सारथी को धिक्कारता है। पुनः मैदान में आता है। फिर सबको बारी बारी हराता है। इस समय युद्ध में ध्यान-मग्न उसका रूप तुलसी कुछ यों दिखाते हैं -

जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि।।
हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ।।

अर्थात अब युद्ध क्षेत्र में रावण 'अग्नि-पुरुष' के रूप में तब्दील हो चुका है - 'क्या अजीब दृश्य है... चल रहा मनुष्य है... अश्रु-स्वेद-रक्त से... लथपथ... लथपथ... अग्नि-पथ... अग्नि-पथ... अग्नि-पथ...।'

धूल और खून के मैदान में, मानस के इस रावण को देख, बरबस, मानस के विरोधी, मुक्तिबोध के शब्द याद आते हैं -

'कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात-पुरुष एक, रहस्य साक्षात!!'

और ऐसे हृदयविदारक समय में विभीषण नाभि में अमृत का रहस्य बताते हैं और क्रोधातुर राम, रावण को, धनुष पर एक अतिरिक्त बाण चढ़ा, मार डालते हैं।

समझ में नहीं आता कि युद्ध के इस वर्णन के पीछे तुलसी का भाव क्या रहा होगा? कई पन्नों में चित्रित यह लड़ाई अचंभित करती है। हालाँकि जीतते अंततः राम ही हैं और तुलसी उनकी चाहना को सात्विक देख, उन्हें ईश्वर भी बना देते हैं। किंतु मरता रावण, मानस के साहित्यिक शब्दों में, ट्रैजिक ढंग से, चिल्ला रहा है -

गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ राम रण हतौं पचारी।।'

कम से कम धार्मिक कथा-वाचकों से तो जरूर पूछना चाहिए कि मानस में ये कैसा रावण है जो भगवान राम के हाथों मारे जाने पर भी खुश नहीं हो रहा है? उल्टे, मुँदती आँखों के वक्त भी राम को युद्ध क्षेत्र में आने को ललकार रहा है। साक्षात मिलते मोक्ष के समय भी ये कैसी कशमकश! जाहिर है, बात इतनी सी नहीं है। मोक्ष की चिंता में मानस नहीं लिखा गया। उसकी चिंता केवल एक है - 'भाषा बद्ध करौँ मैं सोई। मोरे मन प्रबोध जेहि होई।।'

ऐसे में क्या मानस एक त्रासदी नहीं लगता ?. या फिर जायसी के पद्मावत की तरह रूहानी उदात्तता - 'मानुष प्रेम भयउ बैकुंठी...'? क्या बैकुंठ या ईश्वरीय एकांत की ओर ले जाते उसके प्रत्यय दुविधाग्रस्त नहीं दीखते? एक योग-भ्रष्ट साधना? या एक 'भक्ति-भ्रष्ट', 'ईश्वर-भ्रष्ट', 'राम-भ्रष्ट', 'सीता-भ्रष्ट', 'रावण-भ्रष्ट' अथवा 'सर्व-भ्रष्ट' कविता, जिसका अवसान 'कामिहि नारि पियारि जिमि' जैसे लस-लसे मुहावरों में होता है? या केवल एक सांसारिक चाहना, जो अंतर्ग्रस्त भक्ति को दबोचे हुए है? या एक अधखिली भक्ति, जो संसार की मर्त्य सुंदरता को अर्ध-निमीलित आँखों देख रही है? या फिर भक्ति की एकांत कठोरता को अंदर से तोड़ती-फोड़ती कविता? या सबके ऊपर, एक साहित्यिक कथा का 'स्वांतः सुखाय' ढाँचा, जो अपने दैन्य में भी, ईश्वर की ऊपरी खुशामद भले कर ले, पर मौका पा विकल्प की चुनौती देना नहीं छोड़ती?

आखिर, 'राम के ईश्वरीय रूप की बेहिसाब गुनगाथा मानस के जिस भक्ति-पद्धति में समाहित होती है क्या वह स्वयं में संशय-हीन अधिष्ठान बन पाती है या फिर कल्पित वह भक्ति-लोक तुलसी के शब्दों से पैदा जादू-मात्र है, जो अंततः लीला के ज्यादा नजदीक पड़ता है और 'मोह न नारि नारि के रूपा' भाव में, कथा के रेशों में, केले के छिलके की तरह, लिपटा रहता है? तब क्या यह उदात्तता कुछ चौपाइयों के आधार पर वर्णाश्रम या अन्य हल्के संशयों में रेड्युस की जा सकती है? क्या ऐसा लगता नहीं कि सांसारिक चाहना की रक्त-भूमि से उबर आए एक मनुष्य के पौरुष को तुलसी मिथकित कर देते हैं और युद्ध-भूमि में जय-जयकार से घिरे वीर को ईश्वर बना उसे नाम-स्मरण की वस्तु बना देते हैं। क्या यही राम-भजन का दर्शन है? तो क्या मानस में धार्मिक-आध्यात्मिक प्रपत्तियाँ शब्दार्थों का श्रृंगार मात्र हैं जिन्हें, पाठकीय अज्ञान के क्षर जाने तक, उसे बहलाए रखने के लिए रखा गया है? कुनैन की एक साहित्यिक गोली, जिसे मन के शमन हेतु, ईश्वर का नाम जप खाने को कहा जा रहा है?

और तब, क्या इस विश्लेषण के बाद यह प्रश्न नहीं उठता कि जीवन के ऐसे विकट संघर्ष और अंतर्द्वंद्व में फँसी, और नितांत साहित्यिक कथ्य से भरी इस कविता की इतनी सपाट, अमूर्त और धार्मिक-आध्यात्मिक व्याख्याएँ अब तक कैसे होती रहीं? पाठ्यक्रमों में लंकाकांड के इन साहित्यिक अंशों को न रखकर किस प्रगतिशीलता के रक्षार्थ छात्रों को इनसे मरहूम किया गया? क्या यह कोई मार्क्सवादी साजिश थी या अमेरिकी अथवा फिर अंग्रेजों का भूत?

 

(5)

मानस में लोक और अभिजात, शहरी और ग्रामीण, लोक अनुभव और शास्त्र-कथन का भी गंभीर द्वंद्व है। किंतु हिंदी के प्रगतिशील पाठ्यक्रम इस बारे में कुछ नहीं जानते। मानस के समर्थक भी लोक लोक तो चिल्लाते हैं पर वह है कहाँ? इसकी उन्हें भी सुधि नहीं। बहुत हठ करें तो शबरी आदि के प्रसंग सुनाने लगेंगे। ले दे के अंध भक्ति और अंध शत्रुता का मामला है।

मानस में लोक दरअसल तब उभरकर सामने आता है जब राम वन गमन को निकलते हैं। गाँव की देहरी पर पहुँचते ही वह उनके सामने प्रश्नाकुल खड़ा मिलता है - इस भाव से कि ये किस मानवी संस्कृति से त्यागे गए सुंदर राजकुमार हैं? कितना कठोर है वह नगर जिसे अयोध्या कहते हैं? अयोध्याकांड में यह स्वर मुखरित हो उठता है। राम लक्ष्मण और सीता को वन में भटकते देख गाँव की स्त्रियाँ अचरज से कहती हैं - 'ते पितु मात कहहुँ सखि कैसे। जिन पठए वन बालक ऐसे।' मानस में यह बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। पूरा मानस इसी द्वंद्व में आगे बढ़ता है और तुलसी अंततः लोक संस्कृति के सहज संसार के पक्ष में खड़े हो जीवन और भक्ति की आस्थामयी स्थापना रखते हैं। बाद में राम के संघर्ष में भी लोक ही उठ खड़ा होता है तथा वही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी बनाता है।

तर्क और अहंकार प्रधान नागर संस्कृति की मानस में बड़ी कठोर आलोचना है। सुंदर राजकुमार और राजकुमारी को वनवास देने का नगर की संस्कृति के पास अपना तर्क है। यह तर्क जीवन की मुलभूत सहज समझ को तरह देकर अपना वजूद बनाता है। जबकि लोक संस्कृति और समझ, सहज जीवन के परे किसी तर्क को मान्यता नहीं देती। यमुना पार जब राम, लक्ष्मण और सीता पहुँचते हैं तो गाँव में उन्हें इसी तर्क से दो चार होना पड़ता है। बिलकुल नंगे सवाल सामने आते हैं कि आखिर इन छोटे आयु वाले बालकों को इस खतरनाक वन में भटकते छोड़ देने वाले माता-पिता का कलेजा क्या मनुष्य का है? जाहिर है की वचनों के नकली तर्क यहाँ नहीं ठहरते और गाँव बोल उठता है - 'सुनि सविषाद सकल पछिताहीं। रानी राय कीन्ह भल नाहीं।' अर्थात वनवास देकर राजा-रानी ने ठीक नहीं किया। और इतना ही नहीं, आखिर जब कलेजा ही इतना कठोर है तो ज्ञान की भी ऐसे नगर में क्या गहराई होगी! अतः गाँव, इन्हें वन में पैदल भटकता देख, नागर ज्ञान की धज्जियाँ उड़ा देता है - 'ज्योतिष झूठ हमारे भाए'- अर्थात यदि राजचिह्नों के होते हुए भी तुम्हारी यह दुर्दशा है तो हमारे मत में तुम्हारा ज्योतिष शास्त्र ही पूरा झूठा है।

किंतु इस निंदा के बाद भी गाँववासी उनकी मदद करना चाहते हैं। उनकी इस स्थिति पर रोते हैं, और उन्हें अपने यहाँ ठहरने का न्यौता देते हैं -

'करि केहरी बन जाइ न जोई। हम संग चलहिं जो आयसु होई।
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिर नाई।'

जाहिर है ऐसे बेशर्त और निश्छल प्रेम को देखकर राम दंग रह जाते हैं और लोक हृदय में रमते जाते हैं। वन गमन के दौरान, इस निश्छल प्रेम को ही देखकर वे शहरी रास्तों को नहीं पकड़ते और गाँवों से होकर ही ज्यादातर निकलते हैं। और ताज्जुब तब होता है जब नगर यह देखकर ईर्ष्या से जल-भुन उठता है -

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहिं नाग सुर नगर सिहाहीं।
केहिं सुकृति केहिं घरीं बसाये। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।

अजब है लोक संस्कृति का मन कि नगर तो अटारी पर चढ़ कर इन राजकुमारों को भटकता देख रहा है पर गाँववासी मात्र रुक कर नहीं देख पाता बल्कि मदद के लिए आगे बढ़ आता है -

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहि जाई।
सुनि सब बाल वृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी।

और राम विनय से मना करते हैं पर लोक मन है कि मानता नहीं -

एक देखि बट छाहँ भलि डासि मृदुल तृण पात।
कहहिं गवांइअ छिनकु श्रम गवनब अबहिं कि प्रात।

अर्थात नरम घास और पत्ते बिछा दिए हैं, आराम करिए थोडा। फिर अभी या चाहे सबेरे चले जाइएगा।

और यही मन राम को पकड़ लेता है। फिर आगे कभी नहीं छोड़ता। वे गाँव वालों को बड़ी मुश्किल से लौटा पाते हैं किंतु उनका मन अपने साथ लिए चलते हैं। देखिए कि तुलसी क्या लिखते हैं -

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
फेरे सब प्रिय वचन कहि लिए लाइ मन साथ।

इसी मन को साथ लिए राम कथा आगे बढ़ जाती है पर ग्राम-वासी वहीं ठिठके,चिंतित खड़े रह जाते है। राम की दुर्दशा हेतु वे सीधे ईश्वर को दोष देते हैं -

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देवहिं दोष देहिं मन माहीं।

जाहिर है कि अनिवार परिस्थितियों में फँसे जीवन के संबल का यह भारतीय लोक दर्शन है जो मानस में, प्रकारांतर से, स्वयं राम के ईश्वर होने के विश्वास को झुठला देता है और मानस को एक लौकिक काव्य में तब्दील कर देता है।

पर इस त्रासद राम-कथा का वह आध्यात्मिक दर्शन यह लोक मन नहीं गढ़ता जैसा की चित्रकूट प्रसंग में नागर जन गढ़ते हैं या फिर बाद में शुक्ल जी जैसे आलोचक गढ़ते हैं। कारण, लोक मन तो सहज और सच्चा है। अयोध्याकांड की इन चौपाइयों में इस मन का यह सुंदर भाव देखें -

एक कहहि हम बहुत न जानहिं। आपुहिं परम धन्य करि मानहिं।
ते पुनि पुन्य पुंज सम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।

अर्थात हम बहुत नहीं जानते, न जानने का दंभ है। हम तो राम के इस दुख में भी पुन्य देखते हैं और उससे सहानुभूति रखते हैं।

अयोध्याकांड में ठीक इसी भाव में यह ग्रामीण मन चिंतित राम को आगे जाते हुए देखता रहता है। और चिंता भी कितनी गहरी है -

एहि विधि कहि कहि वचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार शरीर।

यह नागर संस्कृति पर लोक संस्कृति की विजय है जिसे तुलसी मानस में रोप देते हैं। मैं जोर देकर कहता हूँ कि मानस का असली मर्म भक्ति, अध्यात्म आदि अगम बातों में नहीं है बल्कि वह यह है कि नागर संस्कृति की अहंता और दिखावापन हमें यूँ ही वन में भटकाती रहेगी जबकि लोक संस्कृति हमें अपने घरों के प्रेम में बचाए रखेगी। मानस में, इसी लोक संस्कृति का गायन है। रावण को मारने से जितनी सीता बचती हैं उतनी ही यह संस्कृति भी बच जाती है। तुलसी ने शायद इसी महान ध्येय से प्रेरित होकर मानस की रचना की होगी।

आश्चर्य है कि गाँव के लोक मन की निगाह से देखने पर तुलसी-कृत मानस की यह पूरी राम कथा पलट जाती है। अपना धार्मिक कलेवर उतार एक साहित्यिक और सेक्युलर कथा बन जाती है। भक्ति और आध्यात्म के प्रत्ययों की परतें उखड़ जाती हैं और हम एक ऐसी कथा से साक्षात्कार करते हैं जो जितनी लौकिक है उतनी ही त्रासद भी।

कहना न होगा कि आज लोक संस्कृति की चिंताएं बढ़ गई हैं। झंझावातों से भरी एक कथा में, नागर का सशक्त प्रतिरोध बन खड़ा, मानस का यह लोक दर्शन क्या प्रगतिशील और व्याख्येय नहीं है? तो क्या मानस को इस चिंता के बरक्स, लौकिकतः, नहीं पढ़ा जा सकता?

 

(6)

उपरोक्त और कई अन्य नए पाठ, मानस के गंभीर विश्लेषण से निकलते हैं जो मानस की अब तक की हमारी समझ को भी बदल सकते हैं। किंतु हिंदी की पूर्वाग्रही प्रगतिशील चेतना को, मानस के इन अंशों की खबर नहीं। आलोचना की प्रगतिशील परंपरा ने मानस को एक धार्मिक और सामंती कविता भर मान आज इसे कूड़ेदान में फेंक दिया है। जबकि, मानस के उक्त अर्थशील पाठों से आज के विद्यार्थी को मरहूम करना किसी अपराध से कम नहीं। अतः आज मानस को लेकर न केवल प्रगतिशील मानसिकता को अपने पूर्वाग्रहों से मुक्ति की जरूरत है बल्कि हिंदी में तुलसी के मानस को, इन नए पाठों के आलोक में रखने और पढ़ाने की भी जरूरत है तथा इस हेतु पाठ्यक्रमों के स्वरूप में बदलाव भी अविलंब आवश्यक है।

 

संदर्भ-ग्रंथ :

1. श्रीरामचरितमानस, तुलसीदास, गीता प्रेस, सटीक मझला साइज, सं 2068

2. गोस्वामी तुलसीदास, आ. रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारणी सभा, वाराणसी,

3. हिंदी साहित्य का इतिहास, आ. रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारणी सभा, वाराणसी,

4. वाल्मीकि रामायण, गीता प्रेस

5. तुलसीदास, चंद्रबली पांडेय, नागरी प्रचारणी सभा, काशी

6. तुलसी, सं. उदयभानु सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली,1996

7. तुलसीदास, नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012

8. परंपरा का मूल्यांकन, रामविलास शर्मा, राजकमल, दिल्ली

9. लोकवादी तुलसीदास, विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण, 2007

10. तुलसी : आधुनिक वातायन से, रमेश कुंतल मेघ, भारतीय ज्ञानपीठ, 1973

11. उत्तररामचरितम, भवभूति, मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963


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