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कहानी

खर्रा
सुभाष शर्मा


जब चिट्ठीरसा ने मुझे एक बंद लिफाफा थमाया, तो मुझे फौरन महसूस हुआ कि यह चिट्ठी नहीं, 'खर्रा' है। मगर जरा भी आभास नहीं या कि इसे मेरे बचपन की मित्र बिट्टी ने लिखा होगा। मैंने उसे छुआ, सीने से लगाया और फिर पढ़ना शुरू किया। सबसे पहले चिट्ठी के नीचे की ओर निगाह गई 'आपकी कुछ'। मेरा मन अतीत के पन्‍ने तेजी से पलटने लगा। वह मेरे गाँव की बहन बेटी थी, मेरी भी। दरअसल वह मेरे बचपन की घनिष्‍ठ संगिनी थी। जब उसके खेत में ककड़ी-खीरा मकई की फसलें तैयार होतीं, तो वह मचान पर चिड़ियाँ हड़ाने के लिए जा बैठती। 'हड़ा-हडा' वाली उसकी आवाज में जो मिठास थी, उसे सुनकर मेरे जैसे कौवे मकई की कोमल बालों की गंध से भीतर तक सराबोर हो जाता। उसके आगे दुनिया की कोई भी इत्र फीकी और बासी पड़ जाती। वह चंपा चमेली की गंध से भी ज्‍यादा मोहक और आकर्षक थी। उसमें किसी को अपने भीतर पिरो लेने की गुरुत्‍वाकर्षण शक्ति थी। मैं अपने दोस्‍तों से कहता 'मिटूली, बागन में', तो वे मेरे साथ बाग तक दौड़कर जाते। मैं उनसे कहता 'मिटूली, रसविंद', तो वे दौड़कर गन्‍ने के खेत में पहुँच जाते और फिर गन्‍ना चूसने की स्‍वरथ प्रतियोगिता शुरू हो जाती। मैं उनसे कभी नहीं कहता -‍ 'मिटूली, ककड़ी-खीरा-मकई'। इसमें थोड़ी निजता रहती। मैं चुपके से उसके खेत में जाता और चोरी करके ककड़ी खीरा मकई खाता। मैंने अपने गाँव में बार-बार सुना था। ककड़ी का चोर तलवार से नहीं मारा जाता है। उसके मचान के पास आग सुलगती रहती और उसे तेज कर मकई की बालें किसी तरह भून ली जाती थी। बिट्टो के लावण्‍य के सामने नमक की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मैं कभी-कभी सियार की बोली बोलने की कोशिश करता था, तो वह मचान के ऊपर से लाठी लेकर 'लुइ हा, लुइ हा, लुइ हा' कहती थी। मेरे भीतर से हँसी की कोंपलें उग आती और मैं खेत के पौधों का सा रूप ले लेता।

खैर - बिट्टो ने लिखा था ''आपसे बीस साल से मुलाकात नहीं हुई, सो बहुत कुछ बदल गया है। मगर मेरा दिल नहीं बदला है, आत्‍मा नहीं बदली है। इस बीच मेरी कोख से पाँच बेटियों और एक बेटे का जन्‍म हो चुका है। मैं तो बस एक ही संतान चाहती थी, मगर इन्‍होंने जिद की कि जितने हाथ पैर होंगे, उतनी ही कमाई बढ़ेगी। ये अपने माँ-बाप के अकेले हैं न, इसीलिए। ये बार-बार कहते हैं बाढ़ै पूत पिता के धर्मे, खेती उपजै अपने कर्मे। मगर विधि की विडंबना देखिए। मुझे शुरू में लगातार पाँच बेटियाँ हुईं और उसके बाद एक बेटा। बड़की बिटिया बढ़कर लग्‍गी हो रही है जैसे बेहया का पौधा बिना पानी के भी हरा कचनार सा बढ़ता रहता है। कभी अपनी बराबर उसे पाकर खुश होती हूँ, तो कभी उसे देखकर डर भी लगता है कि कैसे उसके हाथ हल्‍दी लगेगी? अब तिलक में अक्षत और बीस आने देकर शादी रचाने का अपना सीधा सादा जमाना नहीं रहा। अब तो तिलक ब्‍याह में नगदी और सामानों का पहले ही ठेका हो जाता है। इन्‍हें कोई नौकरी चाकरी नहीं मिली। इनकी पुश्‍तैनी जमीन नाम भर की है। कई सालों तक इन्‍होंने होमगार्ड की नौकरी की, मगर कभी सिपाही की पक्‍की नौकरी नहीं मिली। होमगार्ड की ड्युटी कड़ी होती है, मगर पगार के नाम पर पचास रुपल्‍ली रोज। इतनी मजदूरी में तो दिहाड़ी मजदूर तक नहीं मिलते जोतने बोने के लिए। फिर इनको खैनी खाने का भी शौक चर्राता है। अभी तक इन्‍होंने दारू तो नहीं पी है, मगर दूसरों को देख देखकर खैनी के साथ गुटखा भी चबाने लगे हैं। इनके दाँतों में उसके रंग ने अपनी धाक रखी है। मैं इन्‍हें लाख समझाती हूँ मगर इनके पल्‍ले कुछ नहीं पड़ता। एक कान से सुनते हैं, तो दूसरे कान से निकाल देते हैं। काश। भगवान ने इन्‍हें एक ही कान दिया होता। इनका कान उमेठने की हिम्‍मत मुझमें नहीं है। इकलौती संतान होने के नाते इनके माँ बाप ने इन्‍हें कभी दूब से भी नहीं पीटा, डंडे की तो बात ही कुछ और है। होमगार्ड की नौकरी में इन पर जितनी कड़ी झिड़कियाँ पड़ती हैं, उतनी ही ये मुझ पर झाड़ते है। डाँट-फटकार की धारा ऊपर से नीचे की ओर बहती है। अब ये खेती में एक धेले का भी काम नहीं करते जिसके कारण खेतों के कोने गोड़ने तक के लिए मजदूर लगाना पड़ता है। अब तो बैल-हलवाहे दोनों नहीं रह गए हैं। अब ट्रैक्‍टर का जमाना है आदमी और जानवरों की जगह मशीन ने ले ली है। ट्रैक्‍टर से जुताई कराने में किसान की कमर टूट जाती है। सो हम लोगों ने सारे खेत 'अधिया' पर दे दिए है। वैसे खेत तो गिनती की चार-पाँच कोलइयाँ हैं, कोई माटा नहीं है। मगर मैं आपसे क्‍या छिपाऊँ? वह मुँहझौसा बटाईदार भी बहुत तेज है। कटनी के पहले ही वह आधा चना-मटर सरसों उखाड़ ले जाता है। फिर मड़ाई के समय भी कुछ चुरा लेता है। इनको फुर्सत कहाँ कि उसके साथ साथ लगे रहें। हमें अपने हिस्‍से का आधा तिहाई ही मिलता है। अब आप जैसे अपनों से क्‍या छिपाना? मुझे ही खेती बाड़ी देखने के लिए बाहर निकलना पड़ता है। मैंने एक गाय पाल रखी है। उसके लिए चारे का जुगाड़ रोजाना करना पड़ता है। सो हर शाम को मुझे घास छीलने के लिए खेत-बाग में बाहर जाना पड़ता है। आधा दूध बच्‍चों और पति को खिलाकर आधा दूध बेच देती हूँ। मगर गाँव के चालू खरीददार भी मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हैं। चौराहे पर बीस रुपये किलो दूध मिलता है मगर गाँव के खरीददार बारह रुपल्‍ली पकड़ा कर दफा हो जाते हैं जबकि मैं उन्‍हें 'अबगा' दूध देती हूँ। सुना है, शहर में गाय का दूध महँगा होता है, मगर यहाँ गाय का दूध भैंस के दूध से सस्ता है। जैसे आदमी की कीमत भी हर जगह अलग अलग होती है। कीमत में जगह जगह का फर्क होता है। यह भी सुना है कि शहर में अनाज ज्‍यादा महँगा होता है। अब तो महँगाई के मामले में गाँव भी शहर का मुकाबला जोर-शोर से कर रहा है। अरहर की दाल एक सौ रुपये किलो बिक रही है। आलू पच्‍चीस रुपये किलो बिक रही है। देहात में सब्‍जी के नाम आलू ही ज्‍यादा चलती है। हरी सब्‍जी के नाम पर खेतों से बथुआ और चने का साग खोट कर लाती हूँ और आलू में मिलाकर खाती हूँ। पहले सकरकंद, आलू और गन्‍ने का रस पीकर सर्दी के दिन काटे जाते थे, मगर अब ये तीनों मयस्‍सर नहीं होते। नीलगाय ने तो मटर, सकरकंद और चने की खेती को पूरी तरह से सत्‍यानाश कर दिया है। पहले नीलगाय आदमियों को देखकर भागते थे, अब वे निधड़क होकर खड़ी खेती चरते हैं और आदमी उन्‍हें देखकर भाग जाता है वरना वे खदेड़ लेते हैं। खेती तो अब खतरे में है, वैसे सुना है कि देश भी खतरे में है। चीन और पाकिस्‍तान की सोची समझी चाल से। मेरे गाँव में आदमी की जान साँसत में है। इस बार सर्दी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए - खुद पेट में घुटने दबाए सोती रही और बच्‍चों में भी वैसी ही आदत डाल दी है। अब सर्दी में ज्‍यादा सर्दी और गर्मी में ज्‍यादा गर्मी पड़ रही है। गाँव के जंगल झाड़ खत्‍म हो गए, सो ईंधन की भी किल्‍लत हो गई है। अब बारिश कम होने लगी है जिसके कारण खेतों की सिंचाई करने के लिए टयूबवेल पर भरोसा करना पड़ता है। सरकारी की मरम्‍मत का इंतजाम नहीं रहता। सो जो लौंडे लफाड़ी उसकी मरम्‍मत खुद खर्च करके कराते हैं, वे उसका कई गुना किसानों से वसूलते हैं। सूखे से किसान तबाह हो रहे हैं। असली बात तो यह है कि अब किसान नहीं रह गए है। संकर बीजों की कीमत ढाई-तीन सौ रुपये किलो है। खाद और कीटनाशक दवाइयों के दाम आसमान छू रहे हैं जिन्‍हें खरीदने में किसानों की कमर टूट जाती है। किसान अब मजबूरन मजदूर बन गए हैं। न पहले जैसी इज्‍जत मिलती है, न पैदावार। लागत बढ़ गई है और पैदावार घट गई है। नोन तेल लकड़ी का जुगाड़ करना दिनोंदिन मुश्किल हो रहा है। आधी जिंदगानी गुजर गई है, मगर बाकी आधी भारी पड़ रही है। जब से मैं ससुराल आई हूँ, मैंने सिर्फ पतझड़ ही पतझड़ देखे हैं वसंत सपने में भी नहीं देख सकी। अपने गाँव जवार में दर्जनों किसान कर्ज के बोझ से दब गए। उनकी जिंदगी झिंलगा खटिया बन गई। वे महाजनों और बैंको के अफसरों के डर से आखिर आजिज होकर खुदकुशी कर लिये। अक्‍सर चिरांध गंध से नथुने भर जाते हैं। मुझे पता है कि गिरकर उठना कठिन है, मगर गिरे हुए को उठाना उससे भी ज्‍यादा कठिन है। फिर गिरते को न उठाना कायरता भी है। वैसे इस कलियुग में बड़े लोग सिर्फ उन्‍हीं की मदद करते हैं, जो भविष्‍य में उनके काम आ सकते हैं। मगर मेरी अंतरात्‍मा बार-बार कहती है कि जिंदगी महज जोड़ घटाव नहीं होती। नया ग्राम प्रधान विकास की नई-नई योजनाएँ पाता है मगर उन्‍हें कागज पर दिखाकर सारे पैसे हड़प लेता है। वह तो पुराने से भी ज्‍यादा दगाबाज निकला भले वह अपने टोले का है। बी.डी.ओ. राव एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है। हम गरीबों को शौचालय, खड़ंजा, मिट्टी का तेल, वजीफा, नाली और नल की सुविधाएँ कभी नहीं मिलीं।

''सो 'कुछ जी' मेरी गरीबी का ख्‍याल करना और मायके की नाक रखना जिससे मैं रोशनी की किरण देख सकूँ। कहते हैं, डूबते को तिनके का सहारा होता है। हाँ, मेरा परिवार गरीबी के अथाह समुंदर में डूब-उतरा रहा है। हमे बचाने की पुकार सुनने को बेताब हूँ मैं। मेरी हाथ जोड़कर गुजारिश है कि इन्‍हें कहीं नौकरी पर लगा दीजिए। सुना है आप बहुत बड़े अफसर बन गए है। आप तो पुलिस कप्‍तान बन गए हैं, तो सिपाही की बहाली आप ही करते होंगे। आपके नीचे हजारों अफसर सिपाही काम करते है। एक गरीब और सही। यदि आपने मेरी यह आरजू सुन ली, तो मुझे सुकून मिलेगा कि हमारे बचपन की दोस्‍ती सार्थक हो गई। मैं बचपन में आपको बड़ा आदमी बनने की दुआ देती थी। पता नहीं, आपको याद है कि नहीं जब आप मेरे द्वारा खोंटे गए चने का साग खा जाते थे, जब मेरा बनाया निखोन्‍ना - कचालू खा जाते थे, जब मेरे द्वारा भूनी गई सकरकंद आलू खा जाते थे। मैं झुँझलाती थी और आप हँसते थे। मैं खदेड़ती थी और आप भागते थे। मैं रोती थी, तो आप मुझे हँसाते थे। मैं हँसती थी, तो आप मुँह बिगाड़कर मुझे चिढ़ाते थे। मैं कई दिनों तक घर से बाहर न निकलती, तो आप बेचैन हो जाते थे और मेरी राह देखते थे। मैं मचान से चिड़ियाँ हड़ाती थी, तो आप चिड़ियों की आवाज निकालते थे। आप मेरे खेत से ककड़ी खीरा मकई की चोरी करते थे। आपने मेरा क्‍या क्‍या नहीं चुराया? चितचोर सिर्फ मथुरा में ही नहीं बसते। फिर आप मेरी साग वाली गठरी अरहर के खेतों में छिपा देते थे। मेरा गन्‍ना भी कहीं लुकवा देते थे। शादी होने पर मेरे विदा होते समय मेरे साथ आप भी रोए थे। मैं अपनी आँखों की कोर से देख रही थी कि आपकी पलकें भीग गई हैं, कि आप दूसरों से नजरें छिपाकर भीतर ही मेरे लिए रो रहे हैं, कि आपको मेरे बिछुड़ने के गम का अहसास हो रहा है, कि आप कुछ खोए खोए से लग रहे है...''

मुझसे वह खर्रा आगे नहीं पढ़ा गया। गनीमत थीं कि मेरे आवास के स्‍टाफ छुट्टी पर गए थे और 'खर्रा' सीधे मुझे मिला था। यदि बह मेरी पत्‍नी के हाथ लग गया होता तो क्‍या से क्‍या हो गया होता। औरतें प्रायः शक की दीवारें खड़ी करने में देर नहीं करतीं और दीवारें सपनों की कब्र बन जाती है। मेरी देह रूपी वीणा के सारे तार झंकृत हो उठे। मेरी अंतरात्‍मा चूल्‍हे पर रखे अदहन की तरह उबलने लगी। उसमें बिट्टो के एक एक शब्‍द खदबदाने लगे। मैं सोचने लगा कि अब क्‍या करूँ? कैसे करूँ? सरकारी नौकरी में सब कुछ एक निश्चित और विस्‍तृत प्रक्रिया के तहत संपन्‍न होता है। उसमें हर स्‍तर पर पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। फिर अब अंग्रेजों का कड़क जगाना नहीं रहा, जब कप्‍तान जो बोल देता, वही फैसला हो जाता, जो कुछ करता, वही पुलिस महकमे का नियम मान लिया जाता। अब तो विधिवत एक चयन बोर्ड होता है जिसमें पुलिस मुख्‍यालय और निगरानी विभाग के प्रतिनिधि भी होते हैं। मेरा सिर चकराने लगा कि क्‍या करूँ, क्‍या न करूँ? क्‍या उसके पति की भर्ती मुमकिन है? कहाँ तक मुमकिन है? कहाँ-कहाँ गुंजाइश है? किसके जरिए कुछ किया जा सकता है? वगैरह वगैरह। मैं जितना ज्‍यादा सोचता, उतना ही उलझता जाता। पिछले चयन में गड़बड़ी होने के कारण उसे रद्द कर दिया गया था क्‍योंकि तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री की जाति के उम्‍मीदवार सबसे ज्‍यादा चुने गए थे और विपक्षी दलों का कहना था कि अचानक फलाँ जाति के उम्‍मीदवार इतने मेधावी कैसे हो गए और बाकी सारे उम्‍मीदवार मूर्ख कैसे हो गए? शायद पूरा समाज मेरी ईमानदारी की परीक्षा ले रहा है। मेरा दिल धुक धुक करने लगा। जिसने ईमानदारी को सिद्धांत ही नहीं जीवन बना लिया हो, उसके लिए पहली बार बौद्धिक बेईमानी करना भी अत्‍यंत कठिन होता है। मैने कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की थी यानी वे मेरे दुश्‍मन बन चुके थे। और दुश्‍मन बनाना नई चुनौती थी। मैं आशा निराशा के बीच डूबने उतराने लगा।

उस दिन दफ्तर से लौटा तो पत्‍नी ने पूछा - ''आज नौ बजे रात तक क्‍या कर रहे थे?'' ''कुछ जरूरी काम था। और तुम्‍हारे पारिवारिक धारावाहिक कैसे रहे आज? वही रोना-धोना, ईर्ष्या जलन वगैरह जो एकता कपूर के धारावाहिक में रहते हैं।'' मैंने विषयांतर करने की भरपूर कोशिश की।

''देखा, मगर कुछ भिन्न था आज। एक पचपन वर्षीय अधिकारी जो ताजिंदगी ईमानदार था, आज अपने पहले प्‍यार के लिए बेईमानी कर बैठा...''

''क्‍या और कैसे?'' मैंने पूरी बात जाननी चाही।

''दरअसल उस प्रेमी ने बचपन में अपनी प्रेमिका से वादा किया था कि जब कभी वह किसी मदद के लिए उससे कहेगी, वह पीछे नहीं हटेगा। प्रेमिका के बच्‍चे का अपहरण हो गया था और पच्‍चीस लाख की फिरौती की माँग थी, सो प्रेमी ने अपनी ईमानदारी को अचानक ताक पर रखकर प्रेमिका के बेटे को छुड़ाने के लिए पहली बार रिश्‍वत ले ली। देखिए, अगले चरण में क्‍या घटता है?''

''रिश्‍वत लेना तो गंभीर अपराध है, सो वह जरूर जेल जाएगा।'' मेरे मुँह से अचानक निकला। मैं क्षण भर के लिए काँप गया मानो मैं खुद अभियुक्‍त होऊँ।

मेरे भीतर जो खदबदा रहा था, उसकी जड़ वैसे ही मामले में थी। क्‍या यह मेरा पहला प्‍यार था? क्‍या प्‍यार में वासना होना जरूरी है? क्‍या प्‍यार में विवाह की आकांक्षा जरूरी है? क्‍या प्‍यार आकर्षण की चरमावरथा है? क्‍या अफलातूनी प्‍यार नहीं होता? क्‍या बचपन में सीधा साधा, निर्मल खिंचाव मात्र प्‍यार है? क्‍या प्‍यार को पढ़ लेना पंडित होना है? मेरे मन में प्‍यार की नाना परिभाषाएँ गूँजने लगी। क्‍या यह एकतरफा प्‍यार था या उसकी भी सकारात्‍मक सोच थी? उसने बचपन में कोई सकारात्‍मक उत्तर तो नहीं दिया था, मगर उसका खर्रा उसकी स्‍वीकारोक्ति का एक प्रतीक तो है ही। यह मेरी अंतरात्‍मा की आवाज थी। अंतरात्‍मा की आवाज सच्‍ची होती है। तो क्‍या उसे सुनना चाहिए? क्‍या उस पर अमल करना चाहिए?

थोड़ा बहुत खा पीकर मैंने सोने का उपक्रम किया मगर मुझे नींद नहीं आई। मैं फिर मन ही मन बचपन की किताब उलटने पलटने लगा। मैं गुल्‍ली डंडा और गेंद खेलता था उसके साथ। हमेशा उसे ही गुल्‍ली या गेंद लाने के लिए दौड़ना पड़ता था। मैं उसे बार-बार पदाता था और वह हाँफते हुए गेंद या गुल्‍ली लेकर वापस आती थी। मैं उस समय नहीं समझ पाता था कि उसे ही क्‍यों दौड़ना पड़ता है? मगर अब समझ सका हूँ कि खेल में भी लड़का लड़की में फर्क होता है। हर बार लड़की ही दौड़ती है गुल्‍ली या गेंद लाने के लिए। अब मुझे अपने अतीत के लिए पश्‍चाताप होता है। मैं मन ही मन उसके प्रति खेद व्‍यक्‍त करता हूँ। मगर फिर सोचता हूँ कि उसे खत क्‍यों नहीं लिख सकता? तत्‍क्षण प्रतिक्रिया होती है - पत्‍नी के मन में दूसरी बात समा सकती है और एक भारतीय पत्‍नी एक म्‍यान में दो तलवारें नहीं देख सकती। फिर मेरी पत्‍नी शक ज्‍यादा करने की आदी है। सु मात्र कहने से ही वह सुरहुरपुर पहुँच जाती है। सो मैं दिल बहलाने के लिए एक उपन्‍यास पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते कब नींद आ गई, इसका पता ही न चला। उस समय तो सही लगा था। मगर अब कह सकता हूँ कि थोड़ी देर में मैं सपना देखने लगा बिट्टो मेरे सामने खड़ी होकर खिलखिला रही थी मगर उसने कुछ भी नहीं कहा। मैंने ही उससे पूछा।

'इस हँसी का राज क्‍या है? क्‍या मुझ पर हँस रही हो?''

'नहीं, नहीं। मैं अपने आप पर हँस रही हूँ। मैंने आपकी लंबा खत कैसे लिख दिया? क्‍यों लिख दिया? क्‍या आपके ईमान की परीक्षा ले रही हूँ?' उसने एक साँस में कहा।

'कोई बात नहीं। मैंने बिल्‍कुल बुरा नहीं माना।'

'मगर मैंने किस हैसियत से आपको खत लिखा? मैं क्‍या लगती हूँ आपकी? मेरे तेरे बीच में कैसे है ये बंधन अनजाना, तूने नहीं जाना, मैंने नहीं जाना...'

कुछ न कुछ रिश्‍ता जरूर है। मगर कोई जरूरी नहीं कि इस रिश्‍ते को कोई नाम दिया जाए। कुछ रिश्‍ते समाज की बनी बनाई रस्‍मों से ऊपर होते हैं। कुछ रिश्‍ते प्रचलित रिश्‍तों की परिभाषा में नहीं समाते। ये रिश्‍ते अपनी नई परिभाषा खुद गढ़ते हैं जिन्‍हें समाज भले स्‍वीकार न करे।'

'मेरे पल्‍ले कुछ नहीं पड़ रहा। आप तो जाने हैं कि मैं कम पढ़ी-लिखी हूँ और आप एमए ओमे किए हैं। मोटी मोटी पोथियाँ पढ़कर साहब सूबा बनकर आप सारी दुनिया को चराते है...''

'नहीं, ऐसी बात नहीं है।'

'तो क्‍या ऐसे नए रिश्‍तों को लोग निभाते भी हैं?''

'हाँ, ऐसे मानवीय रिश्‍ते निभाए जाते हैं मगर निभाने वालों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।'

'तो क्‍या सोचा आपने? क्‍या आप इस रिश्‍ते को निभाने की चुनौती स्‍वीकार करेंगे?'

'क्‍यों नहीं? मैं शुरू से साहसी हूँ। फिर तुम्‍हारे लिए तो कुछ भी कर सकता हूँ।'

'तो चलती हूँ मैं' - यह कहती हुई वह खिलखिला उठी मानो उसके होठों से हरसिंगार के ताजे फूल झड़ रहे हों।

'रुको, रुको..' कहकर मैं चिल्‍लाने लगा। पत्‍नी सकपकाकर उठ बैठी और मेरा हाथ पकड़कर झकझोरने लगी - 'किसे रोक रहे हो? यहाँ तो कोई नहीं है।'

मैं कच्‍ची नींद में जागकर उठ बैठा। मैंने पत्‍नी को बताया कि मैं एक सपना देख रहा था जिसमें मेरा पुराना मित्र अखिल बरसों बाद मुझसे मिला था। पत्‍नी हँसने लगी और मैं मन ही मन रोने लगा। बिट्टो कभी मिलेगी या नहीं? उसका अरमान कभी पूरा होगा या नहीं? उसके बाद मेरी आँखों से नींद गायब थी। मैं बिट्टो के बारे में दूर तक और देर तक सोचता रहा। जितना ज्‍यादा सोचता, उतना ही ज्‍यादा परेशान हो उठता।

'खैर... मैं आनन फानन में तैयार होकर दफ्तर चला गया और बिट्टो की मदद करने की तरकीब सोचने लगा। मैंने अपने अधीनस्‍थ अधिकारी मोहनलाल, पुलिस उपाधीक्षक से घुमा फिराकर कहना शुरू किया 'मान लो, कोई जरूरतमंद है और न्‍यूनतम योग्‍यता भी रखता है मगर ज्‍यादा आवेदकों के कारण छँट सकता है, तो उसकी मदद करना परोपकार होगा या बेईमानी? परोपकार होगा, सर। परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।'

'मगर कोई विरोधी उँगली उठा सकता है। सिपाही की बहाली पर सैकड़ों नेताओं की निगाहें हैं। अपने पुलिस विभाग के तमाम अधिकारी कर्मचारी जुगाड़ लगाने के चक्‍कर में हैं।'

'सर' मैं सँभाल लूँगा सब कुछ। बस मेरा भी एक उम्‍मीदवार है। मेरा अपना सगा साला है। सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ। पिछले मुख्‍यमंत्री का शासन तो उनके दो साले ही चलाते थे। श्रीमती जी ने तीन दिनों से उपवास कर रखा है। मेरी हिम्‍मत नहीं हो रही थी आपसे कहने की, सर। सो इन दोनों का बेड़ा पार करने की जिम्‍मेदारी में लेता हूँ। ये दोनों होम गार्ड हैं जिनके लिए सिपाही की भर्ती में कोटा होता है और उम्र में छूट भी मिलती है। इनकी नैया को तूफान के झोंकों से थोड़ा बचाने की जरूरत है। किसी को भनक तक नहीं लगेगी, सर।'

अचानक मैंने हुँकारी भर दी। मेरा मन थोड़ा हल्‍का हुआ। जब शाम को घर पहुँचा, तो खुशी-खुशी में ढेर सारा नाश्‍ता कर गया। थोड़ी देर में लिट्टी चोखा खाकर बिस्‍तर पर चला गया। मैं इस प्रिय भोजन से लंबे अरसे बाद अपने को तृप्‍त महसूस कर रहा था। न जाने कब मेरी आँखों में निद्रा देवी खेल खेलने लगीं।

और अंतिम चयन सूची में बिट्टो के पति रमन का नाम शामिल था। मुझे भीतर से काफी संतोष हुआ कि मैं जिंदगी में थोड़ा बहुत उसके काम आया। बिट्टो का खिलखिलाता चेहरा‍ फिर मेरे सामने आ गया। मैं कैसे बिट्टो को सूचित करूँ कि रमन का चयन हो गया है। मैंने अपनी कोट की जेब से फिर खर्रा निकाला। उसमें से मुझे रमन का मोबाइल नंबर मिल गया। अब समस्‍या थी कि मैं रमन को कैसे कहूँ कि उसका चयन हो गया है। यह बात आग की तरह फैल सकती है। खुशी में उछलते हुए वह मेरा नाम खुलेआम ले सकता है और तब मैं बदनाम हो जाऊँगा। दूसरे यह भी डर था कि यदि बिट्टो ने उसे बिना कुछ बताए मुझे खर्रा लिखा हो, तो वह मेरे बारे में क्‍या सोचेगा? पति, पत्‍नी और वह की तमाम चटखारेदार कहानियाँ चारों तरफ उड़ती रहती हैं। कहीं वह मेरी पत्‍नी की तरह शंकालु हो, तो वह तिल का ताड़ बना देगा। मेरे भीतर नाना प्रकार की आशंकाएँ पैदा हो रही थीं। सो मैंने एक कप गरमागरम चाय पी। फिर सोचने लगा कि बिना अपना परिचय दिए पी.सी.ओ. से उसे सूचित करना ही बेहतर होगा।

सो दफ्तर से सीधे घर पहुँचा और कपड़े बदलकर नाश्‍ता पानी करके एक मित्र से मिलने के बहाने खुद मारुति जिप्‍सी लेकर निकल पड़ा। शहर के बाहर एक पी.सी.ओ. पर रुका। फिर शीशे के घेरे में जाकर रमन को फोन किया - 'रमन जी। सिपाही की भर्ती में आपका चयन हो गया है। बधाई।' फिर मैंने फोन काट दिया भले उधर से हेलो, हेलो की आवाज आती रही।

उस रात में मुझे गहरी नींद आई। मैंने फिर सपना देखा बिट्टो सामने खड़ी थी खिलखिलाती हुई। वह मुस्‍कराती हुई बोली ''आपने सचमुच कमाल कर दिया। मेरे लिए आपने ईमानदारी की कुर्बानी दे दी। सिद्धांतों की कुर्बानी धन दौलत की कुर्बानी से काफी बड़ी होती है। यह जिंदगी का होम करने जैसा है। आपको मेरी भी उम्र लग जाए। ईश्‍वर करे, आप दिन दूनी, रात चौगुनी उन्‍नति करें, जिस पर मैं गर्व कर सकूँ। इस अहसान को मैं कैसे चुकाऊँगी आपको? चलो, इस जनम में न सही, तो अगले जनम में जरूर चुकाऊँगी। मैं आपको तहे दिल से धन्‍यवाद देती हूँ।''

''धन्‍यवाद, धन्‍यवाद। हम जरूर मिलेंगे एक दिन। ऐसा मेरा विश्‍वास है।'

तभी पत्‍नी ने जगा दिया 'आज इतनी देर तक सो रहे हो। दफ्तर नहीं जाना है क्‍या? सुबह से चार पाँच फोन आ चुके है। मैं यही जवाब फोन ड्युटी के जरिए दिलवा रही हूँ कि साहब अभी बाथरुम में है। वे लोग सोचते होंगे कि कप्‍तान साहब ने शौचालय को ही दफ्त्‍र बना लिया है क्‍या?'

और मैं थोड़ी देर में तैयार होकर दफ्तर पहुँच गया। जो भी हो, एक बड़ा काम करने का संतोष था मुझे। मोहनलाल भी ही ही करते हुए मेरे पास आया और ईमानदारी से चयन के लिए मुझे धन्‍यवाद देने लगा।

मुश्किल से एक हफ्ता बीता था कि बिट्टो का छोटा सा पत्र मिला जिसमें एक ही पंक्ति लिखी थी 'आपका अहसान शब्‍दों में बयान करना बेवकूफी होगी।'

और नए चयनित सिपाहियों का प्रशिक्षण शुरू हो गया। वहाँ मैंने पहली बार रमन को देखा पहचाना। उसका परेड काफी अच्‍छा था। उसकी ऊँचाई, सीने की चौड़ाई, दौड़ आदि काबिले तारीफ थी। उसकी चाल, बोलने की शैली और विभागीय कार्यों की सहज जानकारी उसे दूसरों से हिगरा देती थी मानो वह आदर्श सिपाही के काम के लिए ही पैदा हुआ हो। जब वह सलूट मारता, तो लगता कि धरती काँप रही है। उसका सीना हिमालय की चट्टान जैसा दिखता। उसके चेहरे पर सफलता का तेज दिप्-दिप् कर रहा था। मगर मैंने उससे कोई बात करना उचित नहीं समझा।

मगर मुश्किल से एक माह बीता था कि लोकायुक्‍त कार्यालय से मुझे एक कारण बताओ नोटिस मिली जिसमें रमन सहित आधा दर्जन नए रंगरूटों का नाम लिखा था जिनका चयन गलत ढंग से करने का आरोप था। आरोप था कि ये सभी लिखित परीक्षा में फेल थे। मेरा माथा ठनक गया। तो क्‍या मोहनलाल ने मुझे अंधकार में रखा? उसने सिर्फ अपने एक साले की बात की थी मगर चार अन्‍य उम्‍मीदवार कौन हैं? मैंने तुरंत मोहनलाल को तलब किया। जब मैंने उसे डाँटा, तो वह हकलाने लगा - 'सर। मेरा तो एक ही साला उस सूची में है। बाकी अपर पुलिस अधीक्षक, आरक्षी उपमहानिरीक्षक, विधायक और प्रभारी मंत्री के आदमी है। इन सभी ने मुझ पर भारी दबाव बनाया। इन सभी ने मुझे नाना प्रकार से डरा दिया। उन्‍होंने मेरी पुरानी फाइल खँगालने की धमकी तक दे डाली। मजबूरी में अपनी और आपकी खाल बचाने के लिए इन सबको चयनित करना पड़ा। यदि उनके नाम नहीं देता, तो न तो मेरे साले का चयन होता और न रमन का। मेरी हालत साँप-छछूँदर की हो गई थी। मैं आसानी से न जी सकता था, न मर सकता था। मुझे पश्‍चात्ताप है। माफी चाहता हूँ, सर।'

और अब मैं किंकर्तव्‍यविमूढ़ था। यदि इन सभी का चयन मैं रद्द कर देता, तो बिट्टो को क्‍या जवाब देता? बिट्टो ने जो अहसान जताया था उस पर पानी कैसे फेर देता? बिट्टो की जिंदगी का सवाल मेरी ईमानदारी पर भारी पड़ रहा था। मेरा मन ऊब-चूभ कर रहा था कि इस गलत चयन के लिए नौकरी को दाँव पर लगाना पड़ेगा। तभी पीछे से बिट्टो की मद्धिम आवाज आई - 'मेरे लिए बड़ी कीमत मत चुकाइए। आपकी नौकरी चली जाएगी, तो आपके बीवी बच्‍चों की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। मैं एक परिवार की भलाई के लिए दूसरे परिवार की कुर्बानी देना उचित नहीं समझती। आपका परिवार तंगहाली में जीने को अभ्‍यस्‍त नहीं है। हम सबकी तो आदत पड़ गई हैं तंगहाली में जीने की। झिंलगा खटिया की तरह हम लोग जमीन पर सो लेंगे। तरकारी तेल में न सही, पानी में उबाल लेंगे। तरकारी न मिलने पर लपसी या पसावन से पेट की आग बुझा लेंगे। साँवा कोंदो का भात या बेझरी मकुनी की रोटी से पेट भर लेंगे। रजाई की जगह पुआल का गोनरा बनाकर ओढ़ लेंगे। अब बच्‍चों के साथ मिलकर मैं खेती बाड़ी के सारे काम करूँगी। अब कोई मजदूर नहीं लगाऊँगी। अब अपने आँगन और पिछवाड़े लौकी कोहड़ा की लतर तैयार करूँगी। अब जिंदगी को गरीबी से हारने नहीं दूँगी। मैं अपनी जिंदगी की कथरी पैबंद लगाकर सिलती गूँथती रहूँगी।'

मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा वहाँ बिट्टो नहीं थी, मगर उसकी छाया बराबर प्रतीत हो रही थी। मैं अभी तक कोई फैसला नहीं कर पाया हूँ। लोकायुक्‍त ने जाँच चालू कर दी है। मैं जानता हूँ कि इसमें मेरी गलती है और मेरे अधीनस्‍थ अधिकारी मोहनलाल की भी गलती है। मगर बाकी नौ सौ चौरानवे सिपाहियों के चयन पूरी निष्‍ठा और पारदर्शिता से किए गए है। कहीं भी एक पैसे की गलती नहीं है। सौंदर्य शीतलता और शांति के प्रतीक चाँद में भी थोड़ी कालिमा है मगर क्‍या इसलिए उसे नकार दिया जाता है? क्‍या उसकी निंदा की जाती है? क्‍या उससे दुनिया प्रेरणा नहीं लेती? मगर शुद्धतावादी शायद इसे स्‍वीकार नहीं करेंगे। वे नीर-क्षीर विवेक करना चाहेंगे। क्‍या मैं इस इम्‍तहान में उत्‍तीर्ण हो पाऊँगा? पहली बार मेरे पाँव काँप रहे हैं। दफ्तर की दीवारे काँप रही हैं। पुलिस महकमा काँप रहा है। पूरा देश काँप रहा है। ऊपर से नीचे चारों ओर धुंध पसरने के कारण मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। आपने कुछ समझा क्‍या?


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हिंदी समय में सुभाष शर्मा की रचनाएँ