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कविता

गाजा में सुबह
मृत्युंजय


( क)

गाजा में सुबह
अंगूर के गुच्छों पर फिसलती, लड़खड़ाती उतरती है
और फलस्तीन के अड़ियल सपने पर दम तोड़ देती है

गाजा में घुसने के सारे रास्तों पर मौत के हजार आईने हैं
जिनकी छाँह के सहारे
तनिक भी ऊँची दिखती पतंगों की डोर काट दी जाती है

शार्क मछलियों की तरह क्रूर पनडुब्बियाँ
समुंदर की खोह से निकलती हैं और
चट कर जाती है मानुषों से भरा पूरा तट


( ख)

मर्डोकी स्याही की उलटियों में डूब रहा है विश्व
बारूद की नदी में अंतिम हिचकोले ले रही साँस
की ऊभ-चूभ से छटपटा रहे जन के
मांस के लोथ छिटकते हैं पूरी सभ्यता की खाल
उतारते चलते जाते हैं दुनिया के राजा-रानी बाजा दिग्विजय का
बजाते सजाते हैं लंबी दूर मार की मिसाइलें
फाइलें सरकती गाजा में दाखिल है भीषणतम आग


( ग)

हवा, पानी, सूरज
जब कुछ भी साथ न दे तब भी साथ देती है मिट्टी
इसी मिट्टी में एक सुरंग खोदना चाहते हैं लोग
जिसमें रोज-रोज दफनाये जा सकें मुर्दे
जाया जा सके रमल्ला, वेस्ट बैंक या कहीं भी
बूढ़े नमाजी फातिहा पढ़ सकें सुकून से
खून से लतफथ जवान कुछ देर साँस लें बिना बारूद के
और मिट्टी से फूट पड़े बगावती शांति की नोक


( घ)

तीन सौ पैंसठ वर्ग किलोमीटर है गाजा
हर रोज लगभग एक वर्ग किलोमीटर की कुर्बानी

यू एन, एमनेस्टी इंटरनेशनल, विश्वबैंक
के जल्लाद हाथों धारदार छुरी है इजरायल
पृथ्वी के जख्मों को कुरेदते हैं अमरीकी
और पपड़ियों पर उकेर देते हैं डॉलर के निशान


( ङ)

नींद और मौत की जुगलबंदी में
अक्सरहाँ जीत जाती है मौत
रात एक दर्द का ग्रेनेड है जिसकी
पिन धीरे-धीरे निकालती है नींद
कभी नींद जीतती है तो
सपनों से भिड़ जाती हैं छटपटाहटें
देश के मृत टुकड़े भड़भड़ा कर
गिरते हैं आँखों में धँसते हैं


( च)

रात बारूद के शोरबे में छनी मिठाई है मेरे बच्चे
जो तुम्हारी अँतड़ियों में उतर जाएगी वेग से
तुम्हें कुछ भी महसूस करने की जरूरत और फुर्सत नहीं होगी
सो जा

बम का जवाब बम से नहीं दिया जाता बच्चे
पर तुम अपनी किताब में छपे बम को
चिपका सकते हो अपनी दीवार पर अगर तुम यही चाहते हो
इस बचे-खुचे मुल्क में तुम्हारे लायक अकेला काम बचा है यह

सोने से पहले बुदबुदाओ इंतिफादा इंतिफादा और सोचो
तुम एक मजबूत कंबल में हो जिसे खुदा भी नहीं भेद सकता
कयामत के रोज तलक


( छ)

हिब्रू एक भाषा का नाम है जिसके शब्द सुलग रहे हैं
भाषा की रसोइयों से उठती बारूदी गंध थालियों में पसर रही है
हस्पतालों के अहाते में डॉक्टर शरीर को चोंगे की तरह टाँग कर घूम रहे हैं
स्कूलों में बच्चों और अध्यापिकाओं के अधूरे टुकड़े हाजिर आए हैं
खून के थक्के सूख कर सड़कों के रंग में जज्ब हो रहे हैं
हवा के लम्स-लम्स में वहशियत थम रही है
जिंदगी जम रही है


( ज)

जैतून की टहनियों की मानिंद महकती शांति
हर बार लाती है अगली कब्रों की तैयारी के लिए थोड़ा वक्त
युद्ध से ज्यादा ही होते हैं इस वक्त के काम

 


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