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कविता

दक्षिणावर्त
मृत्युंजय


बोझ तले चिटकी जाए है वर्तमान की रीढ़
हवाओं उड़ा करे हैं खून-आलूदा चिथड़े
स्वप्न शिशु को पटक सत्ता श्रृंग पर
नाचती संगीन की लंबी नुकीली छाँह

त्रासदी हमने देख ली, प्रहसन बन चुके
खरीद चुके हम, हमें बेचा जा चुका
अब खून की विराट तश्तरी में पालथी मार बैठे
देवताओं ने इतिहास को लौटने का आदेश दिया है
उलटे पाँव
ताकि सनद रहे कि हत्याओं की परंपरा
जिंदगी की रवायतों से मजबूत रही आई है

इतिहास समुंदर की फिर आई मंथन बेला
स्वदेशी-पारदेशी कंपनियों ने कांधा जोड़
राष्ट्र राज्य के मंदराचल पर्वत को
आवारा पूँजी के वासुकि से बाँध दिया है

जन-कच्छप के
मुँह से बहते खून से लाल हो गया है क्षीर-सागर

विकास के हल की नोंक अपने सीने में गड़ाए गुलाम निकले पहले
फिर स्त्रियाँ जिनकी त्वचा और आत्मा को
खरोंच कर नाखूनों में दफना सके
समूचा जनपद
हत्याकांडों और बलात्कारों के सरकारी भाष्यकर्ता आलिम-पंडित निकले
आँकड़े प्रकट हुए
जिन्हें ठूँस दिया गया बच्चों के कानों में

पूरी दुनिया दक्षिण दिशा की ओर बढ़ी चली जाती है
इतिहास के सीढ़ीदार खेतों की ऊँची सीढ़ी पर बैठे फरिश्तों ने
मेड़ बाँध ली है मांस की लेई से
जोड़कर अस्थियाँ
यह विकट रणक्षेत्र है
उल्टी दौड़ रही हैं गाड़ियाँ
ठंडे आवेग से कुचलती हुई
पुराने युद्ध-स्मारक जाग पड़े हैं
कब्रों में बमुश्किल दफ्न शैतान अँतड़ियाँ
खाद-पानी पा लहलहाने लगी हैं

ऊँचे खाली गुंबद में गूँजती है जब घंटे की आवाज
दहशत भर जाती है मस्तक के कोने-अंतरे में
विराट चमकीले अनुभवी त्रिशूल
अबकी फिर पृथ्वी की नाभि में
गोदे जा रहे हैं नगाड़ों की गहरी ताल पर

आधुनिकता की प्रतापी नील जल धारा
प्रतीकों के गहनतम कैदखानों में
मचलती-छटपटाती
वे मनुष्य कहाँ गए सुकरात ?
भंगी में सिमट कर शेष होती व्यथा
की नीली शिराएँ सूखती जातीं
प्रतापी वध शिरोमणि बहुत ही प्राचीन अपने अस्त्र से
उन्हें यों काट देंगें ज्यों कटे ककड़ी

परस्पर युद्धरत दिखते
पिता और पुत्र दो उन्मत्त पुरुषों ने
थामी बाँह दूजे की
व कूदे मोड़ देने धार
घुमा देने समय को गोल चक्कर में
गर्दन मोड़ने, घर तोड़ने, सर फोड़ने निकले
फौज के संग, मौज में
मोटरसाइकिलों पर धर्म धारण कर
साईं के मंदिर में देखते हुए वीडियो क्लिप जनसंहार की

कोई कुछ बोलता तक नहीं
सारे तर्क, सारे शब्द, सारी कल्पनाएँ मर गईं
कब्रों तले से बुदबुदाते है लोग

आदिवासी शरीरों में गोलियाँ पैठती हैं
जैसे सपनों में प्रवेश करता है बाजार
न्याय के कब्रिस्तान में पंचायत जुटी है
बथानी टोला-सर्केगुडा के बच्चे दल बांध
सीटियाँ बजाते हैं इस छोर से उस छोर तक
और मृतकों की आखिरी चाह उनके कदमों के नीचे सुरसुरी जगा देती है

इस देस नहीं आना बीरन
तुम वहीं मृत्यु के पास रहो
मैं भी जल्दी ही आऊँगी
फिर गप्प करेंगें...

 


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