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कविता

आमि के...
मृत्युंजय


मैं दुख, रुदन और शोक
वह दिल जिसमें बसते हैं समझौते वाले गहरे लोक

मैं टुकड़े-टुकड़े कटे हुए गेहूँ की डंठल
हस्पताल के कूड़ाघर में फेंका बंडल

मैं मधुमाखी जिसके डंकों से घायल फूलों की पंखुड़ियों पर महारास करते है देव
मैं दिशाशूल, दिग्भ्रष्ट, विषैले सपनों वाली रात
हरियाले वृक्षों पर बर्बर पक्षाघात
दुरभिसंधि को थाम-सँवारे, ऐसी निरलज बात

अल्कोहल से भरा हुआ मैं लीवर
भीषण उल्टी के दागों से भरा हुआ एक चीवर
मैं धर्म बृषभ की टूटी जाँघ
जिसे चुनाव निशान बनाते मुल्ला-पंडित सूखी आँतों की डोरी पर देते टाँग
आदिवासियों बीच आधुनिक-ता प्रसार का दल्ला
गुप-चुप औ श्रमलग्न खेत मजदूरों के सर धन-पिशाच का हल्ला

मैं कें-कें करता पिल्ला
मैं कातिक मासे राहगीर को धुंध
धुवाँती गीली लकड़ी, बिन बाती का दिया
मैं आलोचक पथभ्रष्ट बिना जिम्मेदारी का

मैं सुपर-मॉल के अंध-कूप का बेंग कि जिसकी टर्र-टर्र से डर-मर जाते छोटे-छोटे कीट-फतिंगे
मैं कुटिल गति से सरसराता हरी घासों में, छोटा सँपोला
छिप-छिपाकर वार करता, पिंडली पर
हरियाली की लाशों से भरा हुआ रेफरिज-रेटर
फार्महाउसों का मैं ही केयर-टेकर

मैं हत्याओं बिंधी जगह पर छुपम-छुपाई खेल
जमे-जमाये झेले-झाले वृक्षों का जीवन द्रव्य चूसती बेल
कंसंट्रेशन कैंप तलक पहुँचाने वाली रेल

मैं अविनाशी, मैं अहर्निशी
घुटनों तक टपकी लार
आत्मलोचना-फात्मलोचना मुझे नहीं दरकार

 


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