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कविता

नींद टूटने के बाद
मृत्युंजय


एक रोज उठूँगा अल-सुबह
सारे अखबार भरे होंगे विज्ञापन की खबर से
टोटियों में नहीं होगा कोई बूँद पानी
न्याय की देवी के हिजाब से
झाँकेगा दोमुँहा साँप
हाथों में थाम हैंड ग्रेनेड भरे झोले
चप्पे-चप्पे पर मौजूद होंगे सिपाही अदृश्य
शहरों के हर लैंपपोस्ट पर लटकेगी
बेरोजगार दोस्तों की लाश !

एक रोज उठूँगा सुनते हुए
इदमेकः, अयमेकः
एक से हथियार,
प्रेम भी एक सा ही
वाल स्ट्रीट, पेंटागन,
भन-भन-भन, एक सी उदासी,
बोसीदा गंध की परत चौड़ी
शहर के मुहाने पर स्वागत में नाले
रातों-रात गायब हो जाएँगे मुल्कों के जाने-पहचाने वे हिस्से
दुनिया के नक्शे से
पंडोरा बक्से में बंद सभ्यताएँ
सौ कतरे मन के

अयं निजः इदं निजः
स्मित आनन वही मनु
दर्पण निहारेगा निज की यूरोकृत छवि
पिपिहरी बजाएगा सब-ज्ञाता कवि

उस रात
आपरेशन-थियेटर उगेंगे धरती पर
विचित्र धुँधली रोशनी से भरे
लंबे नुकीले दाँतों से चीथी जाएँगी
एनिमिक भाषाएँ, जरबा जन
अबूझमाड़

बाकी बची दक्षिणी पृथ्वी को
लिए-दिए जेब में
सुबह-सुबह निकलेगा शहंशाह
घेर कर छुपा देगा मल के प्रकोष्ठ में
मुदित देवतागण
बरसाएँगें यूरो और डालर के नवल पुष्प

सुबह की रात है पर
इस भीषण रात की
सुबह नहीं होने वाली
गर्दन पर पड़ते दबावों के बावजूद
कंधे पर लाद इसे
लाया हूँ आप तक
लीजिए...
सँभालिए !

 


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