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कविता

डी फॉर...
मृत्युंजय


मस्तक नेटवर्क में आ पहुँचा हैकर
आओ, ताकत के अवतार।
सिरजनहार हमारे भय के औ सपनों के
आगच्छ, तिष्ठ, कल्याणं कुरु !

लाख-लाख घोड़ों की ताकत से
उत्तर-हिमालय और दक्षिण-समुद्र बीच
फँसी लाश खींच रहा
बड़े-बड़े टायकून अफलातून दोगले दलाल मददगार हुए
टूट रहे त्वचा घिरे अस्थिजोड़
खिंचे चले जाते हैं संग-संग
भीषण तनाव है, सीने में घाव है
नोकदार गहरा हुआ आया संक्रमण
धड़ धड़ धड़ गिरे चले जाते सब
घने मजबूत और बावले दरख्त

पैरों को गर्दन में फँसा
हाथ बाँध लिए पीठ पर
निकला हूँ लड़ने
ई-फील्ड ई-दुनिया ई-पूँजी ई-विरोध
ई-ऐक्टिविज्म
मिडिल क्लास मुख-सुख है
डूब मरूँ, शर्म करूँ
क्या फैशन करूँ?
कहो मार्क जुकेरबर्ग के
चरणों पर गिर पड़ूँ?
बोलो तो,
लिंक की बग्घी में क्लिक-घोड़ा जोड़ो तो...

अलबेले उत्तर हैं आधुनिक डिजाइन
प्रश्न जो कभी तो पूछे ही नहीं गए
साँचे में गढ़े-मढ़े भीषण समरूप
एक बरन एक रूप
दुनिया के सारे स्थापत्यों
मस्जिदों मंदिरों और बुर्जियों
पर काबिज हैं बहुराष्ट्री शीशमहल
इतिहास हीन
वाशिंगटन न्यू जर्सी लीबिया त्रिपोली
पाकिस्तान भारत और इटली और फ्रांस
फेसबुक अरमानी जाब्स और अंबानी
खूँखार रक्त चषक और बिसेलरी पानी
भारत के भीतर भी आ गया अमरीका
यूरेका ! यूरेका !!

पारदरस मलमल की झिलमिल कमीज ओढ़
निर्लज्ज नायक का बेहूदा बदन गठन
आधुनिक सुंदर श्रमहीन देह
अब हमारे अपने हैं
टैंको बेल कोला और बिग बाजार
बे-रोजगारी और बर्बरतम सपने
आधुनिक हैं पुलिस के आयातित फाइबर मढ़े डंडे
इनकी तो यारी है - पर एनम फिक्स रकम
बाँस के डंडे वे लगा किए पीठ से
दीठ से, हल्का सा बलप्रयोग
गायब शब्दकोष से
दुनिया को बूढ़ी निगाहों के सपनों में ढूँढ़ें है छोकरा
सूअरबाड़े माफिक रचे गए देश में

चिलमन है गद्दा है / टीवी है तकिया है
मोबाइल इंटर-नेट / ओबामा, बिल गेट
डंडे की यादों की समिधा है, आग चटक रंग सुर्ख
चित्र बना बेच रहा, आओ खरीदारों
कैसी यह दुविधा है?
बढ़िया यह सुविधा है...

डॉलर के लचकीले डिजाइन की लपेट में
फँस गई बहुप्रसवा पृथ्वी
लहर बहर अंतिम हिचकोले खा
हिचकी में फूट पड़ी
'कोई मदावा करो, जालिमों मेरे भीतर
असीर जख्मी परिंदा है एक, निकालो इसे
गुलू-गिरफ्ता है, ये हब्सदम है, खाइफ है
सितमरसीदा है, मजलूम है, बचा लो इसे' *
किसे अपील करे, किससे गवाही चाहे
सुनता हूँ मरम बेध चीत्कार
माँ मेरी पृथ्वी माँ मातृभूमि
बत्तीस आभरणों की जननी
कानों में खुँसा हुआ दुगुनी रफ्तार से
चीख रहा ईयरफोन
'कोलाबरी ... डी'
डी फॉर डैमेज एंड डिस्ट्रक्शन
भूल गए !!!

कुचीपुड़ी गरबा बिदापति औ नकटौआ
आखिरी बार नचाकर
काट लिए पैर
साहेबान, मेहरबान, कदरदान
आधुनिक सिपह-सलार
घंटी तो न्याय की लगी हुई रहा करे
बजती है नाटो की ताल पर
आदिम सभ्यताओं की सूखी हुई खाल पर

पर डॉलर एक स्त्री,
हर डॉलर एक दलित
डॉलर में सौ ठो बेचे हूँ उर्दू
बद्दू, घुमंतू औ जर्दू
सब कुछ का एक डालर
ऐसी समानता
अंधेर नगरी की चौहद्दी
बढ़ी चली आई औ हिरदय में
खुभ गई
चुभ गई सर्व-रस-ग्राही वह जीभ

नेटवर्क में घुस आया हैकर
आदतन बेरोजगार पशु
ईरादतन नेक
सर्जरी के पुरातन साफ्टवेयर में
कुंडली का योग बिठा
क्रास से नए बने रुपया निशान में
रिजर्व बैंक की साइट पर घूम रहा
आशा में कल को
कोई पहचानेगा क्षमता
पाँच लाख डॉलर पर एनम
का काम...
हे राम!

* अख्तर उल ईमान की काव्य पंक्तियाँ

 


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