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कविता

पद
मृत्युंजय


सखि रे हमर दुखक नहिं ओर।
नौकरियाँ हैं टँगी अकासे, पहुँचत नहिं कोई डोर।।
गगन मंडल पै बसी नौकरी, कोई ओर न छोर,
माया की दुरंत लीला में, चलत नहीं कछु जोर,
दिन और रात कछू नहिं, व्यापे जयतु मल्टीनेश्नल,
काम किए चलता चल मूरख, काम किए चलता चल,
लाभ मिले उनको ऐसा तू रच दे अंबर जल थल,
रोज लगाओ ग्रीस तेल मचमच बुशर्ट फहराए।
काम करो धड़-धड़, साथी जिससे मशीन शरमाए।।

 


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