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कविता

बंद करो, बंद करो, बंद करो, यह विकास !
मृत्युंजय


बस्तरिया मैना कंठ में उग आए काँटे
मस्त मगन अरना भैंसा थक कर के चूर हुआ
मैनपाट में जल समाधि ले ली नदी ने
गहरी और छोटी वन मेखलाएँ जिनका अभी नाम भी नहीं पड़ा
पहली बार लादी गईं नंगी कर रेलों में
सूर्य को देखे बिना बीत गई जिनकी उमर
उन वन-वृक्षों की छालें उतारकर
रखी गई गिरवी
घोटल समुदाय गृहों पर हुई नालिश
कैसी है आई ऋतु अबकी वसंत में

अबकी वसंत में टेसू के लाल फूल
सुर्ख-सुर्ख रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे
खून की होली जो खेली सरकार बेकरार ने

वृक्षों के पुरखों ने प्राणों की आहुति दी
प्रस्तर चट्टानों से शीश पटक धरती में दब गए
सब कुछ कुर्बान किया
मान दिया
निर्धन संततियों को दीं अपनी अस्थियाँ
लाखों बरस की इस संपदा की नीलामी होने को है अब

चतुर-चटुल पूँजीपति, पुरातत्ववेत्ता संग
दुनिया के नौवें धनी-मानी-अंबानी
वेदों के अंत के ठेकेदार, सब आए
छत्तिस सरदारों की बलिवेदी
आज तीर्थाटन की
बनी हुई पुण्यभूमि-पितृभूमि
आए सब कुशल-क्रूर, कर्मीं, कर्ता-धर्ता मुल्क के
अबकी वसंत में

लोकतंत्र की गाय के तोड़ दिए चारों पैर
नाक में नकेल डाल
उलट दिया
पथरीली धरती पर
कुहनियों से कोंचते हैं मंत्रीगण बार बार
बारी अब दुहने की आई है
खौफ से भरी माँ
कातर आवाज में बिन बछड़ा रँभाती रही
बाँ बाँ बाँ
सोचते हैं दूर तलक नजर गाड़
चिदंबरम, मनमोहन, मोंटेक, रमन सिंह
टेकेंगे कब घुटने वन-जंगल वासी ये
जैसे हो, जल्दी हो !

अबकी वसंत में
अपने ही शस्त्रों से अस्त्रों से
हत्या की इतनी पुरानी इबारत
जंगल की छाती पर कुरेद रही पुलिस-फौज
मीठी मुस्कान पगे पुलिस पति
मंत्री संग फोटो उतरवाने लगे

वृक्षों के चरणों को सीने से भींचकर
नदियों के बालू से अंतरतम सींचकर
कबीर वहीं बैठा है
तलवों में बिंधा है बहेलिए का आधा बाण
पीर की कोई आवाज ही नहीं आती
सहमा बारहसिंहा
बड़ी बड़ी आँखों में कातर अवरोह लिए ताक रहा।

नाश से डरे हुए जंगल ने उनके भीतर
रोप दीं अपनी सारी वनस्पतियाँ
आग न लग जाए कहीं, वंध्या न हो जाए धरती की कोख
सो, अकुलाई धरती ने शर्मो-हया का लिबास फेंक
जिस्म पर उकेरा खजाने का नक्शा
आँखों में लिख दिया पहाड़ों ने
अपनी हर परत के नीचे गड़ा गुप्त ज्ञान
कुबेर के कभी न भरने वाले रथ पर सवार हो
आए वे उन्मत्त आए
अबकी वसंत में
उतार रहे गर्दन।

अबकी वसंत में
हड़पी गई जमीनों की मृत आत्माएँ
छत्तिस सरदारों के कंधे पर हैं सवार
दम-साध
गोल बाँध
कदमताल करते अभुवाते हैं
छत्तिस सरदार
अपने जल जंगल जमीन बीच
नाचते बवंडर से
दिल्ली से रायपुर राजधानी एक्सप्रेस
के चक्कों को कंधा भिड़ा रोक रोक देते हैं
नोक गाड़ देते हैं, सर्वग्रासी विकास की छाती में

पर जीने की यही कला
दूर तलक काम नहीं आती है
सहम-सहम जाती है
रक्त सनी लाल लाल मट्टी
अबकी वसंत में
गोली के छर्रे संग बिखर गई आत्मा
छत्तिस सरदारों की

छत्तिस कबीलों के छत्तिस हजार
महिलाएँ और पुरुष सब
एक दूसरे से टिकाये पीठ, भिड़ाए कंधा
हाथों में धनुष धार एकलव्य के वंशज
फंदा बनाते हैं पगलाए नागर-पशु-समुदाय की खातिर
मरना और मरना ही धंधा है इस नगरी
ठठरी की प्रत्यंचा देह पर चढ़ाते हैं
बदले की आँच में हवा को सिंझाते हैं
दिल्ली तक

बंद करो !
बंद करो !
बंद करो !
यह विकास।

 


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