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कविता

थक जाने के बाद
मृत्युंजय


थक जाने के बाद,
रंग क्या कहते हैं?
जब जभी आती है शबे होली
तुम्हारे बदन के रंग आबनूसी रंगों में घुल जाते हैं

मिलने दो रंगों को आपस में
आबनूसी नीला लाल जोगिया पीला सब्ज
उस पैराहन को ओढ़ो बिछाओ
जो रंगीनियों में डूब गया है
अंत नहीं है यह
यही मुकम्मल सी इब्तिदा है
जो हमेशा आखिरी खुशी से भर देती है

चलो इस बार हम तस्कीन करें
कि वक्त बेरहम है
प्यार सिर्फ तुम करती हो
कि बेपनाह जब मैं कहता हूँ
उसमे एक पनाह है जो बिना माँगे
छीनता हूँ मैं
इस शब् भी

थक जाने के बाद रंग
संग साथ खोजते हैं

रंगीन मायः के जो आबसार जिंदा हो
ढला करे हैं फकत शबे वक्त होली में
के उनकी कसम
ख्वाबीदा आँखों के सब ख्वाब सुर्खरू होंगे
तुम कह रही थीं
कौन सुनता था ?
वो हजारहाँ वाइदे
जो मैंने किए

वो चुक गए और मैंने पाया ये
के जिक्रे मीर से मीर होना एक खराबी है
जो दिल में उतरती है
चाक करती है
वो शब् तुम्हारी नेमतों से है

जो थक गए हैं रंग
और गाढ़े हैं यारब
रुको जो प्यास के पत्थर पे
इंतिजार करो !

 


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