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कविता

सोने की खदानों की खोज में
स्वप्निल श्रीवास्तव


हम उन लोगों के बीच रहते हैं
जो हमेशा सोने की खदानों की खोज में
लगे रहते हैं

पुराने संग्रहालयों में तलाशते रहते हैं
खजाने का नक्शा

वे उन दुर्गम जगहों पर आसानी से
पहुँच जाते हैं जहाँ सामान्यतः जाना
होता है कठिन

वे खोदते रहते हैं जमीन
तोड़ते रहते हैं पहाड़

समुद्र की अतल गहराइयों में
पीतल के घड़े में रक्खे प्राचीन सिक्कों
की खनक सुनते हैं

वे दुनिया में इस तरह रहते हैं
जैसे उन्हें अनंतकाल तक जीना हो

वे सात पुश्तों के लिए वैभव का
इंतजाम करते हुए एक दिन मर जाते हैं

वे कभी नही सोचते कि पृथ्वी
सबसे सुंदर जगह है
यहाँ गर्व करने लायक बहुत सी
चीजें हैं

वे पहाड़ों समुंदरों नदियों चाँद सितारों के
बारे में कोई बात नहीं करते

वे नहीं जानते कि पक्षियों के कलरव
के सामने धीमी पड़ जाती हैं
संगीत की ध्वनियाँ

वे दुनिया को धीरे धीरे नरक
बनाते रहते हैं और अपनी नृशंस खुशी
से आबादी के बड़े हिस्से को बदहाल बना देते हैं

 


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