डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

कमीज
स्वप्निल श्रीवास्तव


आज आलमारी से मैंने
तुम्हारे पसंद की कमीज निकाली

उसके सारे बटन टूटे हुए थे

तुमने न जाने कहाँ रख दिया
मेरी जिंदगी का सुई धागा

बिना बटन की कमीज
जैसे बिना दाँत का कोई आदमी

मैं कहाँ जाऊँगा बाजार
कौन सिखाएगा मुझे कमीज में
बटन लगाने का हुनर

चलो इसको यूँ ही पहन लेता हूँ
जैसे मैंने तुम्हारे न होने के दुख को
पहन लिया है

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में स्वप्निल श्रीवास्तव की रचनाएँ