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कविता

साँप के सुभाव
धरीक्षण मिश्र


वोट ना मिले त ई चैन से न बइठें कहीं
ओट बिना आठो घरी घूमते देखाले सन्‍ ।
वोट मिलि जाला त ढेर-ढेर दिन तक ले
चुपचाप जाके कहीं परि के औंघाले सन्‍ ।
दोसरा के बिल जोहि जोहि के गुजर करें
पास कइ के ओही में अपने मोटाले सन्‍ ।
गर्मी का दिन में घास फूस जरि जाला तब
दूर जाके आड़ या पहाड़ में लुकाले सन्‍ ।।1।।
तापमान देंही के बहुते कम होला किन्तु
जनता में जा के सदा जहरे ओकाले सन्‍ ।
देंहि एकनी के होला सूत का समान सीधा
टेढ़ चालि से परन्तु आगे बढ़ि जाले सन्‍ ।
दोसरा के काटे के मुँह बवले रहें सदा
केहुवे के काटे में तनिक ना लजाले सन्‍ ।
देखे में तमाशा खूब मजा आइ जाला जब
आ के दुइ चारि आपुसे में अझुराले सन्‍ ।।2।।
ज्यादे दिन एक केंचुली में रहि गइला से
सुस्त परि जाले ढेर आलसी देखाले सन्‍ ।
छोड़ि के पुरान नया केंचुली में अइला से
का बताई केतना ई तेज बनि जाले सन्‍ ।
फन फइलावें पोंछि पटकें घुमावें कबें
धैके भयंकर रूप खूबे फोफियाले सन्‍ ।
आँखि मलकावें नाहीं जीभिये चलावे सदा
चक्खू सरवा एही से जग में कहाले सन्‍ ।।3।।
मणिधर साँप सिर्फ कान से सुनल जात
सामने जे आइल से सब विषधर बा ।
दूध केहु पियावे त विष और तेज होला
माथा में भरल सदा ऐसने जहर बा ।
कौवा का समान जौन खालें पचा जालें सजी
एही से नाव एक परल काकोदर बा ।
एक दोसरा के धइके आपुसे में लीले का
घाते में घूमत साँप आठहू पहर बा ।।4।।
ले के समाधि पवन पी के देहि साधि लेत
योगी अस बीतत महीना दुइ चार बा ।
भोगी नाम इनके प्रसिद्ध पहिले से हवे
भोग एक मात्र भैल जीवन अधार बा ।
छोट-छोट साँप घूमे तेज गति से परन्तु
बड़का का देंहिये के बोझा भैल भार बा ।
बच्चा बिया के खा के सीमित परिवार राखें
लूप या नसबन्दी के ना अबे प्रचार बा ।।5।।
दुइ गो जीभि वाला ई जातिए प्रसिद्ध हवे
चैन से रहे ना जीभि जानत जहान बा ।
दूनूँ ओर मुँह वाला दुमुँहों मिलेले कहीं
पोथी में पाँचो मुँह वाला के बखान बा ।
एकनी का राजा का हजार मुँह होला तब
कौन कहीं एकनी का मुँह के ठेकान बा ।
छोटका से बड़का ले सबके बा ईहे हालि
एकनी से फइले रहला में कल्यान बा ।।6।।

 


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