डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

कुक्कुर के कहानी
धरीक्षण मिश्र


(अध्याय एक)

कुक्कुर के हवे कहानी ई रउरा शायद पतिआइबि ना ।
बाकी हमहूँ कहि दे तानीa हम झूठ बात बतिआइबि ना ।।
त्रेता युग में एगो कुक्कुर चलि गइल राम दरबारे में ।
फरियाद सुना के न्याय उचित ले आइल अपना बारे में ।।
द्वापर में अर्जुन भीमो के ताकत जहवाँ पर खेलि गइल ।
तहवाँ पर साथ युधिष्ठिर का स्वर्गो में कुक्कुर हेलि गइल ।।
कलियुग में रूसी राकेट पर पहिला जतरा कुकुरे चढ़ल ।
रहि गइल लोग सब विज्ञानी ज्ञानी ध्यानी लीखल पढ़ल ।।
कुक्कुर अस ना गुर्जत रही कुक्कुर नीयर जे जागी ना ।
ओकर धन सम्पति दिन दुपहर के बा जे ले के भागी ना ।।
हमनीं में जे बोलतू बाटे अक्किल के दाँत लगवले बा ।
ओही का पीछे दुनियाँ बा ऊहे सबके भरमवले बा ।।
ई कुक्कुर गली-गली जाके सूघें हरदम कोने-कोने ।
गाड़ल झगरा के महक मिले तब ओ के गहिरे से खोनें ।।
सरकारो का डर लागेला ई कुक्कुर जो छुटहा रहिहें ।
आ कवरा हमसे ना पइहें तब हमरो के ई खनि खइहें ।।
तब कइसे एतवड़ राज चली ई चिन्ता दुखी बनावेले ।
तब हाथ सफाई के थोरे आपन सरकार देखावेले ।।
हर पाँच साल पर जादू के एक लमहर जाली बिछावेले ।
भारत भर के बोलतू कुक्कुर सब एके साथ बझावेले ।।
अइसनका जादू मारेले अइसन का मंत्र जगावेले ।
सब का माथा से बुद्धि और सद्भाव तुरंत भगावेले ।।
हमनी का खुद अपना अपना कुक्कुर के नावँ बताईले ।
सरकारी बैलेट बाकस में हम आपन कुकुर फँसाईले ।।
कुकुरो ओहि में फँसि जाये के अगुता जाले छरिया जाले ।
हमनीं के गोड़वा चाटि-2 निरघिन हो के लरिया जाले ।।
कुक्कुर कुक्कुर का आपुस में घनघोर लड़ाई ठनि जाला ।
हमनीं में कुछ चालाक लोग ओही दिनवाँ में बनि जाला ।।
नोचा नोची खिसिया खिसिया आपुस में ओकनीं का होला ।
दाँते तर अँगुरी दबा दबा देखेला गाँव नगर टोला ।।
हर एक कुक्कुर का साथी के दल मदत करे चलि आवेला ।
जेकरा में जेतना जइसन बल होला से सभे देखावेला ।।
कुक्कुर यद्यपि सबका दुवरा पर फेरी रोज लगावेला ।
पर ज्यादेतर जतिगो के बल आखिर में कामे आवेला ।।


(अध्याय-2)

जवना कुक्कुर के नाँव अधिक जनता ओह घरी बतावेले ।
ओही कुक्कुर का गटई में सींकरि सरकार लगावेले ॥1॥
वेतन भत्ता से जकड़ि जकड़ि भेजेले सबके रजधानीं
पाके सगरे सुनहाव इहाँ तब राज करेले मनमानीं ॥2॥
ओहि में से एको मूवेला तब और नया बीनल जाला ।
कवरा खातिर हमनीं का आगे के थरिया छीनल जाला ॥3॥
अइसनका बन्हुवा कुकुरन के संख्या ना उहाँ दु चार हवे ।
सगरे भारत मिल के टोटल किछुवे कम चार हजार हवे ॥4॥
पहिले जनपद से एक एक अब तहसीले से चार चार ।
किछुवे दिन में हर गावें से ले जाए खातिर लगी कार ॥5॥
हमरा ना तनिको बा बुझात कवरा एतना कब तक आँटी ।
आ सब कुक्कुर काशी जइहें तब के इहवाँ पत्तल चाटी ॥6॥
एक मित्र मिटा दिहले शंका जे कुकुरे रोज चरावेले ।
कुकुरन के कवरा ना देले कुकुरन से कवरा पावेले ॥7॥
कवरा पत्तल किछऊ न मिले ई तब्बो ना अगुताले सन ।
एकनीं के अइसन जाति हवे कि सुखलो हा‌ड़ चबाले सन ॥8॥
खटमल अइसन कुकरो कुछ दिन तक सूखि पाखि के जियेले ।
कहियो न कहियो जब दिन लौटेला तब लोहू पीयेले ॥9॥
कुक्कुर सगरे हमरे हउवन धन लागत सजी हमार हवे ।
कवरा दे दे फुसिलावे के बीचे मालिक सरकार हवे ॥10॥
दुनियाँ के औरी कई देश अब इहे चालि अपनावता ।
दुनियाँ भर के सब राजनीति बस एतने में चलि आवता ॥11॥
बोलतू कुकुरन के बान्हि-2 कतहीं पर एक जगह कर दीं ।
कुरुसी दे दीं लमहर-लमहर कवरा मजगर सयगर दे दीं ॥12॥
परजा का केतना सुख दुख बा केहु जोखले बा कि नपले बा ।
एकनी के मुँहवा बंद रही त प्रजातंत्र त सफले बा ॥13॥
एह युग में राज चलावे के सबसे बढ़ियाँ ई मंत्र हवे ।
ईहे नू हवे समाजवाद ईहे नू परजातंत्र हवे ॥14॥
सरकारी कवरा जवन कुकुर जवना दिन से ना पावेला ।
ओही दिन से ऊ जोरदार जनता में अलख जगावेला ॥15॥
एह कुकुरन के इहे कसौटी । गोसयाँ भुइयाँ कुकुर पुजौटी ।
समय परी तब पोंछी हिलइहें । काम निकलला पर गुरनइहें ॥16॥
मालिक सदा पाछे चलेला ई कुकुर आगे चलें ।
मालिक मुवो खइला बिना पर ई सदा सुख से पलें ॥17॥
सब घाट के पानी पिये के बानि बहुत पुरान बा ।
सबके खिया दीहल हवा इनका बहुत आसान बा ॥18॥
काम सबके ना करें पर 'ना' केहू के ना करें ।
जवने कहीं इनसे सदा पंद्रह घरी तक हाँ करें ॥19॥


(अध्याय - 3)

दिल्ली में और लखनऊ में हमरो एकहे गो घर बाटे ।
ऊ छोट मोट ना बा कवनों दूनूँ घरवा लमहर बाटे ॥1॥
ओही घर में राखल हमार सब हक पद के गट्ठर बाटे ।
दोसर केहु जा के ओहि में से कुछ ले मति ले ई दर बाटे ॥2॥
कुक्कुर हमार दुओ जगही एकहे गो पहरा पर बाटे ।
बड़का बा सीधा बहुत किंतु छोटका जब जब धावे काटे ॥3॥
लखनौआ घर का पहरा पर कुक्कुर हमार जे बइठल बा ।
ओकर बोली सुनि के हदास बहुतन का मन में पइठल बा ॥4॥
औरी उहवाँ केतने लोगन के गठरी धइल सहेजल बा ।
सबका आपन आपन कुक्कुर पहरा देबे के भेजल बा ॥5॥
जाने भर में बोलतू कुक्कुर सब खोजि खोजि पहुँचावेला ।
लोग जब पानी उहवाँ के तब कंठ उघरि ना पावेला ॥6॥
केतने कुक्कुर अइसन बाड़े पहरा खातिर भेजल जाले ।
उहवाँ नीमन कवरा पा के ऊ खा के सब दिन औंघाले ॥7॥
कवरा प्रतिदिन बीसन रुपया ढुढ़हाई अलग मुनाफा में ।
रेलो पर बिना टिकट घूमें पकड़ायँ न कवनों दाफा में ॥8॥
कवनों देशी बुलडाग हवे कवनों ताजी पनियाला ह ।
कवनों असली अलसेशियन ह त कवनों भुटिया काला ह ॥9॥
कवनों घोघर कवनों लकड़ा कवनों कुछ अधिक शिकारी बा ।
कवनों के मुँह सुइलार हवे कवनों कोकाच के भारी बा ॥10॥
कवनों डलमेशियन बा जे के चितकाबर रंग सुघर बाटे ।
कवनों का खउरा धइले बा खजुवावत खबर खबर बाटे ॥11॥
दूनूँ कानन तर आठ पहर अँठई के दल बा अटल रहत ।
आगे पाछे कुकुरौंछी के दल रातो दिन बा सटल रहत ॥12॥
कवनों कुक्कुर बाटे कटाह कवनों ओहि में तनि ढूँढ हवे ।
कवनों ओहि में तनि झबरा बा कवनों पोंछी के भूँड़ हवे ॥13॥
कवनों बतास सुनि भोंकेला कवनों रहि रहि के ठोठियाला ।
कवनों अइसन चुप्पा बाटे कानों धइले ना कोंकियाला ॥14॥
कुछ गोला मुँह बरनार्ड हवें ब्लड हाउण्ड बड़का कान हवे ।
न्यु फाउण्ड लैण्ड जाति वाला बिलकुल बरनार्ड समान हवें॥15॥
मल्टीज यार्क शायर टेरियर बुल टेरियर और फाक्स टेरियर ।
ई चारू टेरियर देखे में लउकेले प्राय: एक नियर ॥16॥
गे हाउण्ड और बोर जोई प्वाइण्टर कोली एक भाँति ।
लम्बा गरदन आ लम्बा मुँह दउरे वाला पतराह काँति ॥17॥
बुलडाग चार्ल्य इसपेनियल पग मस्टिफ जे चार प्रकार हवे ।
झूलत बा ओठ नाक चापुट कद छोटा, बड़ा कपार हवे ।।18।।
रशियन जे हवे उल्फ हाउण्ड ऊहे ह जाति बोर जोई ।
आ चार्ल्स नाम का पहिले किंग रखला से नाम शुद्ध होई ॥19॥
बासठ क्ल्म्बर इस्पेनियल आ पोमेरेनियन जाति गनावल बा ।
ई तीनि जातिका कुक्कुरके मुँह खेंखर नियर बनावल बा ॥20॥
कुछ जनसंघी कुछ मन संघी कुछ साथी सिर्फ कहावेले ।
कुछ दल का दल-2 में भासें कुछ एने ओने धावेले ॥21॥
कवनों बड़हन बकबादी बा कवनों ढँगगर बातूनी बा ।
कवनों निछान बादी बाटे कवनों एकदम से खूनी बा ॥22॥
कुछ के बा बनल विरोधी दल कुछ के बाटे सरकार बनल ।
हमनीं के भुलियावे खातिर नित रहे उहाँ तकरार ठनल ॥23॥
अपना आँखि कान नइखे आ की बुद्धिये जरावल बा ।
कि बीचे बोले खातिर एक विरोधी दल बैठावल बा ॥24॥
आपन दल मुँह देखल कही ओपर अइसन अनुशासन बा ।
दोसर दल केतनों साँच कही ओपर तनिको विश्वास न बा ।।25॥
हमनीं के दुक्ख सुने खातिर खुलहा ना कवनों फाटक बा ।
अइसन बढ़ियाँ देखे लायक ई प्रतातंत्र के नाटक बा ॥26॥


(अध्याय - 4)

इसवी अनइस सौ बावन में कुक्कुर दल पहरा पर बइठल ।
कुकुरन के देखि हुँड़ारन का मन में भारी शंका पइठल ॥1॥
हमनी के नीमन तेज कुकुर युग भर तक पहरा कइले सन ।
हमनी गरीब का कवरा से लेकिन ना कबें अघइले सन ॥2॥
रातो दिन देखले सन हुड़रन के नया नया सावज खाइल ।
तब का होखो केतने कुकुरन का मुँह में पानी भरि आइल ॥3॥
हुँड़रा कहले सन कुकुरन से जिनगी भर भोंकत रहि जइब ।
लेकिन हमनीं का अइसन सुख कहियो सपनों में ना पइब ॥4॥
अब से आदत छोड़ पुरान आव हमनीं का साथ रह ।
हमने के तरे आजुवे से इच्छा भर खेलत खात रह ॥5॥
कुछ कुकुरन का मन में हुँड़रन के बात बड़ा नीमन लागल ।
अपना मन में सोचले सन कि अब भागि हमनियों के जागल ॥6।।
सुनि के बड़का अचरज होई कुक्कुर हुँड़ार के मेल भइल ।
लेकिन कुछ दिन से ई अचरजबा रातोदिन के खेल भइल ॥7॥
हमरा बुझात बा लोकतंत्र जे भारत में उतरल बाटे ।
ओइमें अइसनका कुकुरन के सोरहो आना सुतरल बाटे ॥8॥
कब कवन कुकुर कहवाँ रही एकर ना किछू ठेकाना बा ।
मालिक के अब के पूछता सब कुकुरन के मनमाना बा ॥9॥
कुकुरन के पेट कट होत गइल आ भागि हमन के फूटि गइल ।
सन चौसठ से कुछ कुकुरन के ईमान धरम सब टूटि गइल ॥10॥
कुकुरन का और हुँड़ारन का कुछ जन्मजात जे बैर हवे ।
आपुस में एक दोसरा से भइला पर भेंट न खैर हवे ॥11॥
ऊ बैर पुरनका ना जाने कब कइसे कहवाँ खोइ गइल ।
आपुस में दूनूँ मिलि गइले आ सुँघा सुँघौवलि होइ गइल ॥12॥
भोंकल कुकुरन के बंद भइल हुँड़रन का दल में गइले सन ।
अब आपन पेट भरे खातिर ओकनी के संहति धइले सन ॥13॥
अब एह कुकुरन के मन हरदम हुँड़रे का दल में पाटत बा ।
हुँड़रन के छोड़ल हाड़ गोड़ एह कुकुरन के दल चाटत बा ॥14॥
जवना हुँड़रन के कहलें सन अब तक ले चोर लबार सजी ।
ओकनी का साथे चलले सन अब लूटे इहो बहार सजी ॥15॥
चौदह छटाक के चाउर बा लोगन के मुश्किल जीयल बा ।
लेकिन ई कुक्कुर चुप बाड़े अइसन मुँह धइ के सीयल बा ॥16॥
यदि हमनी का माथा पर ना अइसनका चढ़ल अभागि रहित ।
तब एह कुकुरन के दल अब तक खिसिया के बोकरत आगि रहित ॥17॥
एहि में से केतने कुकरन के ताकत अइसन बेजोड़ रहल ।
कि केतने बरियरका हुँड़ार एकनी से लेत न होड़ रहल ॥18॥
लेकिन एह बेरी अइसन कुछ कइले सन काम जपाटे के ।
कि ई कुक्कुर अब से रहिहें ना घरहीं के ना घाटे के ॥19॥
पागल कुकुरन के दाँत कहीं एकनी का देहें लागल बा ।
शायद एही से एकनी के मन भइल आजकल पागल बा ॥20॥
बारह बरीस कुक्कुर जीए ई बात साँच करि गइले सन ।
हम त असमन जानत बानीं कि तेज कुकुर मरि गइले सन ॥21॥
अब भेड़ि बकरिया ना बचिहें रोवें किसान एह कारन से ।
पहरा पर के कुछ तेज कुकुर मिलि गइले जाइ हुँड़रान से ॥22॥
कवनों कुक्कुर हमार होके बोली एकर अब आस न बा ।
कवना कुक्कुर के कवरा दीं कवनों पर अब विश्‍वास न बा ॥23॥
जसजस बड़का सावज महकल ।
तसतस कुकुरन के मन बहकल ॥24॥

(अध्याय - 5)

हमनी के कुक्कुर तेज हवे ई राति राति भर जागेला ।
ई सब को से अझुरा जाला डर एकरा तनिक न लागेला ॥1॥
एको पतई जो खरके त ई बहुत अगर्द मचावेला ।
एकरा अगर्द का मारे दोसर ना कुछ कहि सुनि पावेला ॥2॥
गलतू में दूर दूर तक ले हमरा कुक्कुर के नाम हवे ।
हुँसियार लोग सब बूझेला कि बोलले एकर काम हवे ॥3॥
अवरी कुक्कुर सब पाँच बरिस पर एकबेर बस आवेले।
मालिक का दुवरा लोटिपोटि कोंकिया के पोंछि हिलावेले ॥4॥
बाकी दोसरा अवसर पर ऊ गोसयाँ के चीन्हि न पावेले।
आ कबो कबो खुदुकवला पर गुरुना के काटे धावेले ॥5॥
लेकिन हमनी के ई कुक्कुर सब दिन सब के पहिचानेला ।
ई गोसयाँ और बे गोसयाँ सब के एक बरोबर मानेला ॥6॥
एकरा में ना कुछ पइ निकलल ना ऐसे कहीं कुचाल भइल ।
एही से एकरा एक जगह पर रहत आज दस साल भइल ॥7॥
दोसर केहु वार करे जेतना गेंडा समान ई आड़ेला ।
आ कबें कबें सरकारो पर ई सिंह समान दहाड़ेला ॥8॥
हमरा कुक्कुर के चीन्हीं त ओकर दोसर उपमा न हवे ।
बस थोरे में बुझि जाईं कि ऊ गेंडा सिंह समान हवे ॥9॥
बाकी कुछ दिन से एहू में एक बाउर रहनि धरात हवे ।
एही से अब कुछ लोगन के मन एहू पर अनुसात हवे ॥10॥
कुछ छुटहा और बे गोसयाँ के कुकुरन के एगो गोल हवे ।
ओकनी से एकरा आपुस में कुछ मेल जोल के बोल हवे ॥11॥
कबें कबें ओकनी का संहति में इहो जब आ जाला ।
ओकनी के चालि पकड़ि लेला सब आपन चालि भुला जाला ॥12॥
ओकनी के भोकल सुनत सुनत एकरो मन उहाँ बिगड़ि जाला ।
तब बिना जियाने राह चलत निमनो अदिमी पर पड़ि जाला ॥13॥


वंशस्थ :-

दियात बाटे कवरा सनेह से जुझार बा कुक्कुर जौन क्षेत्र के ।
अघाउ आपे सुख खाइके भले सदा रहो भोंकत आँखि मूनिके ॥14॥


(अध्याय - 6)

सन बावन से सन तिरसठ तक जब जहाँ जरूरत पड़ल हवे ।
कुक्कुर हमार ई तब तहवाँ घोघिया घोघिया के लड़ल हवे ॥1॥
लेकिन सन चौसठि में एकर मन लड़त लड़त अगुताइ गइल ।
आ दुशमन दल का कुकुरन में मिलि जाए के ललचाइ गइल ॥2॥
दुशमन दल का कुक्कुर के जब एकरा अनुकूल विचार मिलल ।
तब त दूनूँ दल का मानों बूड़त का एक अधार मिलल ॥3॥
ओह दल के कुकुरा कहले सन अब भोंकल व्यर्थ निवार तूँ ।
बारह बरीस तक भोंकि भोंकि का पवलS तनिक विचार तूँ ॥4॥
सगरे ऊँखी का खेतन के करिह अब से रखवारी तूँ ।
हमनी का जवन कहबि ओहि में अब भरिह सदा हुँकारी तूँ ॥5॥
अब उँखिये में चरिह चुरिह अब धरिह मनमाना शिकार ।
खेखर खरहा खइह लेकिन जब देखिह तूँ मोटका सियार ॥6॥
तब भले जोर से गुरनइह बाकी दूरे से डेरवइह ।
ई हउअन सन पोसुवा सियार एकनी का पँजरा जनि जइह ॥7॥
ई ऊँखी के रस चूसि चूसि अपने पेटवा बस भारेले ।
केतना मेहनत कइलस किसान एपर ना तनिक विचारेले ॥8॥
एह सियरन के बस इहे बानि सब दिन से हवे निमहि गइल ।
का राज तंत्र का प्रजातंत्र दूनूँ धिरावते रहि गइल ॥9।।
केहुवे का कहला सुनला से जनि एकनी पर परि जइह तूँ ।
बतिया हमार ल गाँठि बाँन्हि युग युग ले जीहS खइहS तूँ ॥10॥
पहिले के आदत छोड़S तूँ अब से हमनी का साथ रहS ।
हमनी का तरे आजुवे से तूँ छुटहे खेलत खात रह ॥11॥
ई हे बतिया सुनते एकर सब बुद्धि पुरनकी खोइ गइल ।
आ बड़का दल का कुकुरन से तब सुघाँ सुघौंवलि होई गइल ॥12॥
बारह बरीस जवना कुक्कुर के कहलसि चोर लबार सजी ।
ओही कुकुरन का साथे ई अब लूटे चलल बहार सजी ॥13॥
मन आग पाछ में बा शायद ना कहीं ठीक से पाटत बा ।
जनता में जात लजात हवे दिन एने ओने काटत बा ॥14॥
शंका ई हे केतने साथी लोगन का मन में धइले बा ।
पहरा जो मिलल ऊँखि के ना तब मानीं कि घर गइले बा ॥15॥
केहु कहत हवे कब तक लड़ो ई लड़त-2 अब थाकल बा ।
हाड़े माँसे के देहि हवे एही से मनवों पाकल बा ॥16॥
केहु झंखत बा, अपने खातिर ई सब जे बाटे से बाटे ।
हमनी गरीब के पुछवइया लउकत नइखे कि के बाटे ॥17॥
शासक कुकुरन का श्रेणी में दोसर शरीर अब धइले बा ।
काहें कि ओह जनम में ई कुछ ज्यादे पुन्नि कमइले बा ॥18॥
देखीं, पा के अब नया जन्म उजियावेला कि बोरेला ।
घर के पहरा देला आ की हँड़िया गगरी टकटोरेला ॥19॥
काहें कुक्कुर दूबर भइलें, आवा जाई दू घर कइलें ।
बड़का सावज उनका महकल, दूनूँ घर के कवरा बहकल ॥20॥


(अध्याय - 7)

एकर दुर्दशा देखि करि के केहु देवी जी के दया भइल ।
दुख दुबिधा दूर गइल सगरे आ जनम फेरु से नया भइल ॥1॥
खेती के पशु के रखवारी कुक्कुर हमार अब पाइ गइल ।
बड़का कुकुरन से मेल जोल मोंका पर कामे आइ गइल ॥2॥
ई कुक्कुर खूबे बूझता कुछ गोसयाँ रिसियाइल बाड़े ।
एसे बाहर कम निकलत बा, बा रहत सदा आड़े आड़े ॥3॥
बाहर निकले का नावें त अब बहुते अधिक सहमि जाता ।
एह कारन से मेला बजार में घूमे बहुते कम जाता ॥4॥
यदि जातो बा त साथे में राइफल कान्हा पर तान तान ।
आगे पाछे राखत बाटे दस पाँच मिलिटरी के जवान ॥5॥
जवना घरमें ई टीकत बा ओह घर का आस पास कगरी ।
हाथे में भरि भरि के बनूखि बा घूमत रहत लाल पगरी ॥6॥


सवैया :-

अब काटि दे ई कुकुरा केहु के तब मानीं अभागि ओके घेरले बा ।
एकरा कटला के दवाई इहाँ अबे ना कतहीं खोजले हेरले बा ।
अब जात न बा केहु का दुवरा पहिले जहाँ फेरी सदा फेरले बा ।
अब त सनकी बुझि के एकरा के पुलीस बनूखि ले के घेरले बा ॥7॥


(अध्याय - 8)

कुक्कुर केतनो मेहनत कइलसि खेती के हालत ना सुधरला ।
उलटे भारी मँहगी अकाल दूनूँ आ के एक साथ परल ॥1॥
ज्यादे से ज्यादे पोरसा भर धरती खनि के जब हलि जाला ।
तब खाजु भेंटा जाला कुक्कुर के काम पेट के चलि जाला ॥2॥
अत: प्रांत में पोरसा भर के लाखन कुवाँ खनाइल ह ।
गोसयाँ लोगन के खाद्य समस्या ना परंतु सुधियाइल ह ॥3॥
गोसयाँ हमार अब का खइहें जब ई चिंता व्यापल विशेष ।
तब उड़त उड़त कुक्कुर आपन पहुँचल जा के जरमनी देश ॥4॥
अवरी केतने दोसरा देशन के लेखा जब बइठवलसि ह ।
तब आ के गोसयाँ लोगन के एक नया उपाय बतवलसि ह ॥5॥
जब कमी अन्न के बाटे तब ई हे उपाय अपनाई जाँ ।
हाथे हाथे ले के कुदार अब मूस मारि के खाईं जाँ ॥6॥
मुर्गी सूवर आ गाइ भँइसि खइला में ज्यादे दाम लगी ।
पर मूस मुवा के खाइला में लागत ना एक छदाम लगी ॥7।।
मूसे में ढ़ेर भिटामिन बा सब डाँक्टर लोग बतावता ।
एपर एगो नीमन सुझाव हमरा बिचार में आवता ॥8॥
आगी पर मूस पकवला से रोवाँ चमड़ा सब जरि जाई ।
तब ओमें जवन भिटामिन बा ओकर कुछ अंश सँपरि जाई ॥9॥
लेकिन बिलकुल ताजा धइ के जे काँचे मूस चबा जाई ।
तब एमें ना कुछ शुबहा बा ऊ सजी भिटामिन पा जाई ॥10॥
कुकुरन के जवन खाजु होला ऊहे ओकरा मन भावत बा ।
अपना गोसयाँ लोगन खातिर बस ऊहे खाजु बतावत बा ॥11॥
सरकारी राशन का दुकान पर ना अनाज अब छूँछ मिली ।
अब साथे साथ अनाजे का कुछ सूवर आ कुछ मूस मिली ।12॥
ई सुझाव ना केहु का भावल जेही सुनल से मुँह बिजुकावल ।
बा केहू खूब ठठा के हँसल बात न केहु का मन में धसल ॥13॥
बकरा अलबत्ते ओह घरी, जमुना पारी आ बरबरी ।
आइलेसन बलाक में किनि के, नसल सुधार भइल बकरिन के ॥14॥
अब भेड़ि बकरिया ना बचिहें रोवें किसान एह कारन से ।
कुक्कुर जे आपन रहे उहो जा के मिलि गइल हुँड़ारन से ॥15॥
कुक्कुरन के जवन बिमारी हS ऊ लकवा एके धइले बा ।
जब तक चलि जा तब तक चलि जा ना त दिन एकर गनइले बा ॥16॥

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में धरीक्षण मिश्र की रचनाएँ