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कविता

बुद्धि के बढ़ती
धरीक्षण मिश्र


दोसरा के घर जरा के हाथ के सेंकले न बा ।
के आन का शुभ कीर्ति पर कीचड़ कबें फेंकले न बा ॥
कहें हीरा चन्द ओझा1 चन्द कवि पृथिराज का -
दरबार में रहले कहीं इतिहास में लिखले न बा ।
सन और सम्बत झूठ बा घटना सजी बेमेल बा
साँच कवनों बात रासों में कहीं बटले न बा ।
का साँच बा का झूठ बा ई के इहाँ निर्णय करो
जब कि ओ पृथिराज के दरबार केहु देखले न बा ।
एक बात जरूर बा हम कहबि ढोल बजाइ के
आजु ले ओझा कहीं केहु साँच कुछ भखले न बा।
आचार्य केशव दास पर बड़थ्वाल2 जी बानीं भिड़ल
मानों इहाँ खातिर कहीं मजमून कुछ अँटले न बा ।
शुक्ल जी3 लिखनीं कि केशव का रहे ना कवि हृदय
जे जौन चाहो कहो तवने मुँह केहू छेंकले न बा।

1- प्रख्यात इतिहासकार महामहोपाध्याय गौरी शंकर हीरा चंद ओझा ।
2- डॉ. पीताम्बरदत्त बड़ध्वाल - कबीर के सुख्यात शोधकर्ता ।
3- आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल ।

 


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