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आलोचना

केदारनाथ सिंह की कविताओं से गुजर कर
अरुण होता


'अगर नहीं मेरे स्वरों में तुम्हारे स्वर
अगर नहीं हैं मेरे हाथों में तुम्हारे हाथ
अगर नहीं है मेरे शब्दों में तुम्हारी आहट
तो मेरे भाई,
मुझे पछाड़ खाए बादलों की तरह
टूटने दो
टूटने दो'

(तीसरा सप्तक)

'यह पशुओं के बुखार का मौसम है
यानी पूरी ताकत के साथ
जमीन को जमीन
और फावड़े को फावड़ा कहने का मौसम
जब जड़ें
बकरियों के थनों की
गरमाहट का इंतजार करती हैं'

(जमीन पक रही है)

'मेरे शहर के लोगो
यह कितना भयानक है
कि शहर की सारी सीढ़ियाँ मिलकर
जिस महान ऊँचाई तक जाती हैं
वहाँ कोई नहीं रहता'

(यहाँ से देखो)

'तब से कितना समय बीता
हम अब भी चल रहे हैं
आगे-आगे कवि त्रिलोचन
पीछे-पीछे मैं
एक ऐसे बाघ की तलाश में
जो एक सुबह
धरती पर गिर कर टूट जाने से पहले
वह था'

(अकाल में सारस)

'छू लूँ किसी को
लिपट जाऊँ किसी से ?
मिलूँ
पर किस तरह मिलूँ
कि बस मैं ही मिलूँ
और दिल्ली न आए बीच में'

(उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ)

'पर मेरी आँखें खिड़की के पार
बर्लिन की उस टूटी दीवार पर टिकी हैं
जहाँ वह पागल स्त्री गजल को चीरती हुई
लगाए जा रही है अब भी चक्कर पर चक्कर'

(तालस्ताय और साइकिल)

'कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना'

(सृष्टि पर पहरा)

एक

हमारे समय के वरिष्ठतम कवि केदारनाथ सिंह (1934) ने 1952-53 के आसपास कविता-लेखन शुरू किया था। साठ से अधिक कविता-वर्ष पूरा कर चुके केदार जी ने समकालीन कविता को नई गति और दिशा प्रदान की है। उन्होंने तीन-चार पीढ़ियों के कवियों को प्रभावित किया है। कविता लिखने के गुर सिखाए हैं। उनकी पीढ़ी तथा परवर्ती पीढ़ी के कवियों ने उन्हें पढ़कर, गुनकर बहुत कुछ सीखा है। आगे भी ऐसा होगा। केदार जी ने समकालीन भारतीय कविता को समृद्ध किया है न कि केवल हिंदी की दुनिया को। 'अकाल में सारस' का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होने के पश्चात उनका प्रभाव किस रूप में भारतीय कविता पर पड़ा, इसका अध्ययन बड़ा दिलचस्प होगा। बहरहाल, यहाँ केदारनाथ सिंह के कवि-कर्म पर छिट-पुट विचार प्रस्तुत किए जाने का प्रयास किया जा रहा है।

'तीसरा सप्तक' (1959) में कवि की कविताएँ सम्मिलित हुई थीं। इस सप्तक की कविताओं ने न केवल कवि को साहित्य की दुनिया में परिचित किया बल्कि उन्हें प्रतिष्ठा भी दिलाई। इसके बाद 'अभी बिल्कुल अभी'(1960), 'जमीन पक रही है' (1980), 'यहाँ से देखो' (1983), 'अकाल में सारस' (1988)। 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' (1995), 'बाघ'(1996), 'तालस्ताय और साइकिल (2005), और सद्यतम कविता-संग्रह 'सृष्टि पर पहरा (2014), प्रकाशित हुए। बासठ-तिरसठ वर्षों की सृजनशीलता में आठ कविता-संग्रह और कुछ कविताओं को संख्या के आधार पर विवेचित करने से भयानक भूल होगी। केदार जी ने संख्या पर कभी ध्यान दिया ही नहीं। जल्दबाजी दिखाई नहीं। दो संग्रहों के बीच बीस वर्षों का अंतर होने पर भी उन्होंने जब तक कुछ नए ट्रेंड स्थापित नहीं किए तब तक नया संग्रह आने न दिया। इस अर्थ में केदारनाथ सिंह 'ट्रेंड सेटर' कवि हैं।

कवि का जीवनानुभव व्यापक और सघन रहा है। गाँव, देहात, शहर, पहाड़ से लेकर महानगर तक के तमाम अनुभवों को कवि ने अपने रचना-संसार में पिरोया है। अतः उनकी कविताओं में ग्राम-चेतना है तो नगरीय जीवनबोध भी, कस्बाई जिंदगी का यथार्थ अंकित हुआ है तो लोक-भूमि की सुगंध भी मौजूद है। अकेलेपन की त्रासदी हो अथवा संघर्षशीलता, बाजारवादी अर्थव्यवस्था के दुष्परिणाम हो अथवा अदम्य जिजीविषा; कवि ने जीवन के विविध रंगों और अनुभूतिओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उकेरा है। कवि ने जिस सहजता के साथ जीवन स्पंदनों को अंकित किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अक्सर कवि की कविताएँ पढ़कर पाठक चकित तथा स्तंभित रह जाता है कि केदार जी असाधारण विषयों तथा सूक्ष्म संवेदनाओं को सरलतम रूप में अभिव्यक्त कैसे कर पाते हैं। असाधारण को साधारण और साधारण को असाधारण बनाने की सामर्थ्य केदार जी की है। यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

(दो)

केदारनाथ सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के अंतर्गत चकिया गाँव में हुआ था। यहाँ की भाषा भोजपुरी है। इस भोजपुरी की मिठास कवि के व्यक्तित्व में है और उनकी कविताओं में भी। भोजपुरी की बेहद आत्मीयता और सादगी से परिचित होना है तो केदारनाथ सिंह की कविताएँ पढ़ी जा सकती हैं। कवि में भोजपुर का लोक और उस लोक में कवि नमक और पानी की तरह घुले-मिले पाए जाते हैं। अपनी भाषा, बोली-बानी और अपने लोक से अभिन्न जुड़ाव और लगाव रहा है कवि का।

केदार जी की कवितों की जीवनी शक्ति लोक जीवन का सौंदर्य और संघर्ष है। लोक में बिखरे तथा छितरे पड़े विविध प्रकार के भावों और विचारों को, सौंदर्य के तत्वों को कवि ने सघन लोक-संवेदनात्मक दृष्टि के साथ बखूबी चित्रित किया है। 'तीसरा सप्तक' में संकलित कवि की कविताओं से लेकर 'सृष्टि पर पहरा' तक की कविताओं में लोक चेतना मुखरित होती पाई जाती है। अपनी प्रारंभिक रचनाओं में भले ही वे प्रेम संबंधी हों अथवा किसी अन्य विषय पर आधारित, कवि ने लोक को पिरोया है -

"रुको, आँचल में तुम्हारे
यह समीरन बाँध दूँ, यह टूटता प्रन बाँध दूँ!
एक जो इन उँगलियों में
कहीं उलझा रह गया है
फूल-सा वह काँपता क्षण बाँध दूँ !"

'अभी बिल्कुल अभी' में पाठकों को लग सकता है कि कवि की 'लोक-भूमि' उससे छूट रही है। लेकिन, ऐसा नहीं है। कवि गाँव छोड़ शहर आ जाता है लेकिन उसकी स्मृति में वह लोक अब भी रचा-बसा है। कवि की ग्राम-चेतना में लोक-चेतना समाहित है। शहर या महानगर में रहकर गाँव की स्मृतियों में तल्लीन हो जाना 'नास्टाल्जिक' होना नहीं है, बल्कि गाँव और उसके लोक में जीना भी है। सभ्यता समीक्षा भी है। केदार जी की कविता के लोकतंत्र को हम उनकी 'भोजपुरी' शीर्षक कविता में देख सकते हैं। कहा जा सकता है कि कवि ने उक्त लोकभाषा के सकारात्मक पहलुओं को निराले अंदाज में तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है -

'लोकतंत्र के जन्म से बहुत पहले का
एक जिंदा ध्वनि-लोकतंत्र है यह
जिसके एक छोटे से 'हम' में
तुम सुन सकते हो करोड़ों
मैं की धड़कनें'

इसी कविता में कवि ने लिखा है - 'जबान इसकी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है आज भी'। इसी तरह कवि के कविता-लोक से परिचित करानेवाली 'देश और घर' की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

'हिंदी मेरा देश है
भोजपुरी मेरा घर
घर से निकलता हूँ
तो चला जाता हूँ देश में
देश से छुट्टी मिलती है
तो लौट आता हूँ घर'

इस संदर्भ में केदार जी की 'देवनागरी' कविता की कुछ पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं -

'कभी देखना ध्यान से
किसी अक्षर में झाँककर
वहाँ रोशनाई के तल में
एक जरा-सी रोशनी
तुम्हें हमेशा दिखाई पड़ेगी
यह मेरे लोगों का उल्लास है
जो ढल गया है मात्राओं में
अनुस्वार में उतर आया है
मेरा कंठावरोध है'

'एक पुरबिहा का आत्मकथ्य' में कवि ने स्पष्टतया कहा है -

'पर ठीक इसी समय
बगदाद में जिस दिल को
चीर गई गोली
वहाँ भी हूँ / हर गिरा खून
अपने अँगोछे से पोंछता
मैं वही पुरबिहा हूँ
जहाँ भी हूँ।'

उपर्युक्त उद्धरणों से यह न समझा जाए कि कवि अपनी बोली-बानी, भाषा को श्रेष्ठ और अन्य लोकभाषाओं को हीन मान रहा है। दरअसल, लोकभाषा और लोक-जीवन को बचाए रखने की जरूरत है। साम्राज्यवादी शक्तियाँ इनका समूल विनाश करना चाहती हैं। सच तो यह है कि उन शक्तियों को पराजित करने के लिए लोक ही सबसे कारगर हथियार बन सकता है। अतः लोकभाषाओं की प्रासंगिकता है। ये भाषाएँ हमें जोड़ती हैं, मिलाती हैं। संघबद्ध करती हैं। लोक-भाषा ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। अतः ये लोक-भाषाएँ आगे भी सार्थक सिद्ध होंगी। जैसे कि वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट पारित होने के दौरान बिहार में महेंद्र मिसिर के लोक गीतों की महती भूमिका रही थी। केदार जी को भिखारी ठाकुर का स्मरण हो आना कतई निष्प्रयोजन नहीं है। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में रची गई 'भिखारी ठाकुर' की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती हैं -

'पर मेरा ख्याल है
चर्चिल को सब पता था
शायद यह भी कि रात के तीसरे पहर
जब किसी झुरमुट में
ठनकता था गेहुँअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे-धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज
और ताल के जल की तरह
हिलने लगती थीं
बोली की सारी
सोई हुई क्रियाएँ'

केदार जी 'लोक' को शक्ति को उजागर करते हैं। लोक की सामर्थ्य को उद्घाटित करने के उद्देश्य से वे लोक संवेदना को महत्व देते हैं। लोकभाषाएँ न केवल किसी मानक भाषा को समृद्ध करती हैं बल्कि वे विभिन्न लोकभाषी जनों को भावात्मक एकता के सूत्र में पिरोती हैं। कवि के शब्दों में -

'संतन को कहाँ सीकरी सों काम
सदियों पुरानी एक छोटी-सी पंक्ति
और उसमें इतना ताप
कि लगभग पाँच सौ वर्षों से हिला रही है हिंदी को'

'हिंदी' शीर्षक कविता में कवि ने भाषा को भाषा के रूप में ही देखना चाहा है। भाषा सिर्फ भाषा होती है। 'राज नहीं भाषा' अर्थात भाषा के सामने राज की कोई महत्ता नहीं है। उसने लिखा भी है -

'सारे व्याकरण में
एक कारक की बेचैनी है
एक तद्भव का दुख
तत्सम के पड़ोस में'

केदार जी की कविता अपनी जड़ों से उत्पन्न होती है। उनसे ऊर्जा पाती है और उसके बल पर समय और समाज को विनिर्मित करती है। नागार्जुन, त्रिलोचन की तरह केदार जी का अपनी जड़ के प्रति अपार लगाव है। जनपदीय चेतना से संबद्धता है। इसलिये रोज-ब-रोज हमारी आँखों में दिखनेवाली चीजें जो अक्सर हमसे छूट जाती हैं यानी जिन पर हमारी नजर नहीं जाती, उन्हें यह कवि बड़ी शिद्दत के साथ प्रस्तुत कर देता है। उनमें छिपे जीवन-रहस्य के मर्म को उद्घाटित कर देता है। ऐसा कर पाना कवि के अपनी मिट्टी, जमीन, जल, नदी,पेड़-पौधे से गहरी संपृक्ति का परिणाम है। 'गाँव आने पर' कविता में गाँव से कवि का आत्मीय जुड़ाव दिखाई पड़ता है। हिंदी के जो आलोचक समकालीन कविता में गाँव की गैर मौजूदगी का फतवा देते हैं, उन्हें केदार जी की यह कविता पढ़नी चाहिए। इस कविता में कवि ने गाँव के बने रहने की इच्छा जाहिर की है। अपने लोगों के बीच अपनत्व में जीना चाहा है। एक गहरा आकर्षण है कवि का अपने गाँव से -

'क्या करूँ मैं ?
क्या करूँ, क्या करूँ कि लगे
कि मैं इन्हीं में से हूँ
इन्हीं का हूँ
कि यही हैं मेरे लोग
जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में
और यही, यही जो मुझे कभी नहीं पढ़ेंगे'

अपने आठवें कविता संग्रह को कवि ने समर्पित भी किया है - 'अपने गाँव के लोगों को / जिन तक यह किताब / कभी नहीं पहुँचेगी'। कवि की चिंता व्यापक है। उसने बिना कहे दारुण समय को बिडंबनाओं को मूर्त रूप दिया है। 'कभी नहीं पढ़ेंगे' और 'कभी नहीं पहुँचेगी' में एक करुण वेदना है जिससे समय का सच भी उजागर होता है। 'हीरा भाई' कविता के माध्यम से भी कवि की बुनियादी चिंता बड़ी तीव्रता के साथ व्यंजित होती है। कवि ने लिखा है -

'एक पूरा चरक-संहिता होता था
उनका जर्जर थैला
जिनसे मवेशी भी ठीक हो जाते थे
और कभी-कभी आदमी भी
आदमी और पशु के बीच के
अंतिम लचकहवा पुल थे हीरा भाई।"

'अगर इस बस्ती से गुजरो', 'जैसे दिया सिराया जाता है' जैसी कविताओं को 'मांझी का पुल', 'पर्व स्नान' आदि कविताओं के साथ मिला कर पढ़ा जाए तो केदार जी का लोक तथा उसका सौंदर्य अधिक स्पष्ट हो सकता है। इस पर चर्चा किए बिना यहाँ इतना कहा जा सकता है कि केदारनाथ सिंह के रचना-संसार में लोक का बहुरंगी चित्रण मिलता है। इनकी कविता में लोक गहरे रूप से संपृक्त है। केदार जी लोक से कविता रचने की ऊर्जा पाते हैं और उसे पाठकों के हृदय पर अंकित कर देते हैं।

(तीन)

केदारनाथ सिंह की कविताएँ बहुआयामी और बहुवर्णी हैं। उनके कविता-लोक का संबंध जितना अतीत से है उतना वर्तमान से और भविष्य की चिंता से। उनकी कविता में वर्तमान के संदर्भ में आम आदमी की प्रतिष्ठा हुई है। आमजन की पक्षधरता भी मौजूद है। केदार जी का आम आदमी अपने हर्ष-उल्लास, दुख-कष्ट, विजय-पराजय, त्याग-भोग आदि संपूर्ण रूप में कविता में प्रवेश करता है। वह संघर्षशील है तो विकट परिस्थितियों के सामने असहाय भी है। इसलिए, अन्य प्रगतिशील रचनाकारों से केदार जी का स्वर कुछ भिन्न है, मिजाज कुछ अलग है। केदार जी के रचना-संसार में न तो गलाफाड़ चीत्कार है और न ही नारेबाजी। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने अन्याय, दमन, शोषण का विरोध नहीं किया। विरोध और प्रतिरोध का ढंग ही निराला है। चुपके से एक-आध शब्दों में जो प्रभावशाली विरोध दर्ज हो जाता है वह अन्य कवियों में कहाँ। बिना कहे सब कुछ कह देने की कला केदार जी की कविता का एक बड़ा गुण है।

कथा-साहित्य में प्रेमचंद ने साधारण जन को नायकत्व प्रदान किया था। केदारनाथ सिंह ने उस साधारण जन को कविता का नायक बनाया है। सच है कि हिंदी के प्रगतिवादी कवियों ने यह काम बहुत पहले किया था। लेकिन, केदार जी का 'ट्रीटमेंट' कुछ और है। आम आदमी के एक-एक भाव से, उसके अंतर्मन से और उसके तमाम परिप्रेक्ष्यों से केदार जी बिलकुल परिचित लगते हैं। उदाहरण के तौर पर आम आदमी को थाने से चिढ़ है। उसे पता है कि थाना अपराध-केंद्र है। सत्ता की दलाली करने की जगह है। केदार जी लिखते हैं -

'मुझे थाने से चिढ़ है
मैं थाने की धज्जियाँ उड़ाता हूँ
मैं उस तरफ इशारा करता हूँ
जिधर थाना नहीं है'

'पानी में घिरे हुए लोग' कविता में भी साधारण मनुष्य को प्रतिष्ठित किया गया है। पानी में घिरे रहने के बावजूद साधारण लोगों की संघर्षशीलता और जिजीविषा को कवि ने बखूबी चित्रित किया है -

'वे जला देते हैं
एक टुटही लालटेन
टाँग देते हैं किसी ऊँचे बाँस पर
ताकि उनके होने की खबर
पानी के पार तक पहुँचती रहे'

इसी तरह लोक संवेदना से भरपूर कविता 'मांझी का पुल' में भी साधारण मनुष्य को केंद्र में स्थापित किया गया है। हल चलानेवाले लालमोहर को खैनी की तलब होती है तो उसकी नजर मांझी के पुल की ओर जाती है। बस्ती के लोगों का चित्रण भी आम आदमी के रूप में हुआ है। आशय यह कि केदार जी की कविताओं में एक साधारण मनुष्य बोलते-बतियाते दिखाई पड़ता है। वह जीवन-जगत के अनुभवों को साझा करता है। कवि के शब्दों में -

'सचाई यह है
मेरी बस्ती के लोग सिर्फ इतना जानते हैं
दोपहर की धूप में
जब किसी के पास कोई काम नहीं होता
तो पके हुए ज्वार के खेत की तरह लगता है
मांझी का पुल'

केदार जी के यहाँ साधारण जन का अंकन इतने स्वाभाविक ढ़ंग से हुआ है कि हमें कुछ भी आरोपित अथवा कृत्रिम नहीं लगता है। यह इसलिए कि कवि ने स्वयं साधारण मनुष्य बनकर साधारण आदमी की नजर में उसे देखा है। 'कंधे की मृत्यु' शीर्षक कविता में कवि को पुनः लालमोहर की याद आती है। उसके बहाने वह आम आदमी की दुखद गाथा को अंकित करता है -

'वही लालमोहर -
जो बरसों तक किसी और के खेत में
हल चलाने के बाद
इस समय सो रहे थे गहरी मूर्च्छा में
अपनी ही खाल की खरहरी खटिया पर
इस तरह - जैसे मरना भी कोई दिया गया काम हो जरूरी
जिसे पूरी जिम्मेदारी से पूरा ही करना था साँझ होते-होते"

देश की राजधानी न जाने कितने साधारण लोगों के सपनों को कुचलकर उन्हें बंदी बना लेती है, तभी तो कवि कहता है 'किस तरह रातभर बजती हैं जंजीरें'। इसलिए, अपने सद्यतम संग्रह में जैसे ही वह किसी बुढ़िया को राजधानी का रास्ता पार करने की अवस्था में देखता है तो प्रसन्नता से भर जाता है। उल्लास से भर जाता है। इसे 'सबसे बड़ी खबर' के रूप में देखता है -

'देखो कि किस तरह शहर दिल्ली की
उस व्यस्ततम सड़क पर
निर्भय-निश्चिंत चली जा रही है वह बुढ़िया
एक बच्चे की उँगली पकड़ कर"

अकेलेपन का शिकार बना आज के आम आदमी का भी चित्रण कवि ने किया है। इसी क्रम में, एक और प्रसंग की चर्चा अपेक्षित है - किसानों की आत्महत्या। केदार जी की एक मर्मस्पर्शी कविता है 'फसल'। लाखों की तादाद में देश के किसानों की हत्या की जा रही है और सत्ता ने उसे मीडिया के माध्यम से उस हत्या को आत्महत्या के रूप में सिद्ध कर दिया जाता है। कविता में आत्मघाती सभ्यता और उसकी कपटलीलाओं का केवल अनावरण ही नहीं हुआ है बल्कि तथाकथित विकास के नाम पर ढाए जानेवाले विनाश का पर्दाफाश किया है। केदार जी की चिंता है -

'अब यह हत्या थी
या आत्म-हत्या
यह आप पर छोड़ता हूँ
क्योंकि अब तो वह सड़क किनारे
चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था
एक हल्की-सी मुस्कान'

इस संदर्भ में 'कुछ सूत्र जो एक किसान बाप ने बेटे को दिए' कविता का पाठ हो तो कवि की किसान-चेतना का परिचय मिलेगा। हालाँकि इस कविता के लोक संदर्भ को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। 'अकाल में सारस' की 'अँगूठे का निशान', 'काली मिट्टी' आदि कविताओं में भी साधारण मनुष्य की बातें युगीन संदर्भों के साथ प्रस्तुत की गई है - 'काली जनता काला क्रोध / काला-काला है युगबोध'।

(चार)

हमारे समय के सबसे बड़े कवि केदारनाथ सिंह ने अपने समय और समाज को किस रूप में प्रस्तुत किया है, इस पर विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। कोई भी महत्वपूर्ण कवि अपने समय और समाज से अप्रभावित नहीं रहता। समय की अनुगूँज उसकी रचना में सुनाई पड़ती है। समाज की धड़कनें सुनी जा सकती हैं। युगीन विसंगतियाँ, विडंबनाओं आदि के चित्रण मिलते हैं। केदार जी की कविताओं में उपर्युक्त सभी विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं।

'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ', 'बाघ', 'तालस्तॉय और साइकिल' तथा 'सृष्टि पर पहरा' आदि कविता-संग्रहों के माध्यम से केदार जी ने भाव-बोध का विस्तार किया है। ध्यान देने की बात है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में सृजित कविताओं में भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उदारीकरण, निजीकरण के तमाम अंतर्विरोध देखे जा सकते हैं। केदार जी संदर्भ में कहा जा सकता है कि कवि ने 'बाजारों के समय' के सच को भली-भाँति उकेरा है। उनकी कविता में बाजार की उपस्थिति है। इससे उनकी जागरूकता का परिचय मिलता है। हाट-बाजार तो पहले भी थे। लेकिन वे इतने भयानक न थे। आज तो बाजार के सामने सब-कुछ बिकाऊ है। मानवीय नाते-रिश्तों तक को बाजार ने 'प्रॉडक्ट' के रूप में तब्दील कर दिया है। अतः केदार जी ने बाजार के छल-छद्म को उजागर किया है। उनकी कविताओं में बाजार आता है बार-बार।

'यहाँ से देखो' में कवि का आग्रह था - 'आओ बाजार चलें'। बाजार में धूल है। इसलिए चलना है। यह 'धूल' दरअसल जमीन से, मिट्टी से उपजी है और कवि का उसके प्रति गहरा आकर्षण है। बाजार जाना अर्थात वस्तुओं को देखना है। उन्हें पहचानना है। यानी सचेतनशीलता और गहरे लगाव का परिचायक है बाजार जाना। परंतु यह क्या - 'बाजार में न धूल थी / न जनता / दोनों को साफ कर दिया था"। बाजार का सारा 'कॉन्सेप्ट' बदल गया है। आज बाजार हमारे ड्राइंग रूम तक ही सीमित नहीं रह गया है। पहले हम बाजार जाते थे। अब बाजार हमारे पास आ गया है। हममें आ बस गया है। वह हमें नियंत्रित करने लगा है। आज बाजार ही नहीं, हम अपना घर भी वस्तुओं से भरते जा रहे हैं। अप्रयोजनीय वस्तुएँ भी खरीदकर घर में ठूँसे जा रहे हैं। बाजार तो वस्तुओं से पटा पड़ा है। सामान बढ़ते जा रहे हैं। बैंकों के क्रेडिट कार्ड से हम बाजार के मुनाफा कमाने के काम में बढ़-चढ़कर सहायता किए जा रहे हैं। पूँजी और बाजार की साँठ-गाँठ में मनुष्य पिस रहा है। कमरे में आदमी की जगह पर वस्तुओं ने कब्जा कर लिया है। कवि ने लिखा है -

"वस्तुएँ
खुश हैं न उदास
सिर्फ वे बढ़ती जा रही हैं"

भावविहीन होकर बढ़ना भला किस काम का है?

कवि डाइजीन की टिकिया खरीदने बाजार गया था लेकिन उसे पता तक नहीं चला कि उसकी हथेली पर खरोंच कैसे आ गई। यह खरोंच उसे बाजार ने दी है। यह कैसे हो सकता है कि कोई आम आदमी बाजार जाए और उसे खरोंच न लगे। बहरहाल, कवि की दृष्टि अमरूद पर टिकती है। अमरूद के लिए बाजार में जगह न थी। बाजार तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामान से भरा पड़ा है। ब्रांड प्रॉडक्ट से चमक-दमक रहा है। ऐसे में मामूली देशी अमरूद के लिए बाजार में जगह कहाँ है? लेकिन, अमरूद भी हार कैसे मान ले? कवि ने लिखा है -

'अमरूद भी आ गए बाजार में
और यद्यपि वहाँ जगह नहीं थी
पर मैंने देखा छोटे-छोटे अमरूदों ने
सबको ठेल-ठालकर
फुटपाथ पर बना ही ली
अपने लिए थोड़ी जगह'

बाजारवादी अर्थव्यवस्था और उसके वर्चस्व की सत्ता को ठुकरा कर अपना विरोध प्रदर्शित करना और अपनी अस्मिता को स्थापित करने का यह अंदाज सचमुच अप्रतिम है। केदार जी इस पूँजीवादी-साम्राज्यवादी माहौल में साधारण के पास बिना किसी मध्यस्थ के सहारे पहुँचना चाहते हैं। प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना चाहते हैं। कवि के शब्दों में -

'मैं बिना किसी मध्यस्थ के
छिलकों और बीजों के बीच से होते हुए
सीधे अमरूद के धड़कते हुए दिल तक
पहुँचना चाहता हूँ'

इसी तरह कवि चावल से भी मिलना चाहता है। बाजार को अस्वीकार करते हुए, उसकी मध्यस्थता को ठुकराते हुए कहता है कि तमाम जरूरी चीजों से प्रत्यक्ष अंतरंग संबंध की आवश्यकता है -

'कैसा रहे
बाजार न आए बीच में
और हम एक बार
चुपके से मिल आएँ चावल से
मिल आएँ नमक से
पुदीने से
कैसा रहे
एक बार... सिर्फ एक बार'

ध्यान देने की बात है कि बाजार के लिए अमरूद, चावल, नमक, पुदीना आदि का बस एक बाजार मूल्य है। लेकिन कवि के लिए इनका बाजार मूल्य से भी बढ़कर एक बड़ा मूल्य है। महत्व है। अनाज से दाना बनने के पीछे जिस श्रम, सौंदर्य और संगीत का माधुर्य है, कवि उसे उद्घाटित करना चाहता है।

बाजार की महत्ता को अस्वीकार करने के बाद कवि ने सारी रात मोमबत्ती की रोशनी में कविता लिखी। बाजार और कविता में अहि-नकुल संपर्क है। कविता में संवेदना का महत्व है। प्रतिरोध का स्वर भी है। लेकिन, बाजार न तो कोई तर्क पसंद करता है और न ही कोई सवाल। वह चाहता है कि लोग आँखें मूँदकर उसके वर्चस्व को मान लें। उपभोक्तावादी संस्कृति को फलने-फूलने दें। तभी तो कवि ने लिखा है -

'जाना था बाजार
मोमबत्ती की रोशनी में
मैं लिखता रहा कविता
क्योंकि सारे हिंदुस्तान में
बिजली गुल थी
अब यह कैसे बताऊँ
लेकिन छिपाऊँ भी तो क्यों
कविता और बाजार की एक हल्की सी भी टक्कर
रोमांचित करती है मुझे'

'इस हल्की सी टक्कर' से 'रोमांचित' होने में युगीन यथार्थ के साथ-साथ युगीन माँग की व्यंजना समाहित है। अपने प्रिय कवि गालिब के बाजार से कुछ चिंगारियाँ लेकर लौटने का उल्लेख करने वाले केदार जी को बाजार से लड़ने की प्रेरणा मिलती है। दाने स्पष्टतया ऐलान करते हैं -

"नहीं
हम मंडी नहीं जाएँगे
खलिहान से उठते हुए
कहते हैं दाने
जाएँगे तो फिर लौटकर नहीं आएँगे
जाते-जाते
कहते जाते हैं दाने'

'बाजार में आदिवासी' शीर्षक कविता में अंकित निम्न दृश्य देखिए -

"भरे बाजार में
वह तीर की तरह आया
और सारी चीजों पर
एक तेज हिकारत की नजर फेंकता हुआ
बिक्री और खरीद के बीच के
पहले सूराख से
गेंहुअन की तरह अदृश्य हो गया'

कहना न होगा कि केदार जी ने समय की धड़कनों को सही ढंग से पहचाना है। मानवता-विरोधी बाजारवादी अर्थव्यवस्था के दुष्परिणामों को भली-भाँति महसूस किया है। आज कस्बों, शहरों आदि के विकास के सूचक के रूप में मॉल को आधार माना जा रहा है। मॉल कल्चर के चलते जीवन-मूल्य ढहते जा रहे हैं। मनुष्य को त्रासद स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। यह विकास के नाम पर विनाश है। यह संस्कृति उन्हीं लोगों के लिए है, जो खाए-पिए और अघाए वर्ग से आते हैं। ग्रामीण जन-जीवन के लिए मॉल कल्चर न तो उपयोगी है और न ही लाभकारी। 'काली सदरी' कविता में कवि ने धागों में छिपी छोटे कस्बे की धूल को महानगर में बचाए रखने का प्रयास किया। भले ही उस धूल को वह बचा न पाया परंतु जर्जर सदरी आज भी उसके पास है। संवेदनाओं और परंपराओं को क्षरित होने से बचा न पाने की पीड़ा कवि को होती है। गाँव के बूढ़े दर्जी को आज भी वह स्मरण कर रहा है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ कवि के भावों को व्यंजित करती हैं -

'बगल के मॉल में
मैंने घंटों तलाश की
पर इससे बेहतर उपहार
मुझे मिला ही नहीं
देश की राजधानी में'

'एक ठेठ किसान के सुख' कविता में किसान ने सादे कागज पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया तो उसे लगा कि वह सौ गुणा जिंदा हो गया। दरअसल आजीवन दुख को साथी बनाकर मुर्दे के समान जीने वाले किसान की ऐसी शक्ति से स्वयं कवि भी परम प्रसन्न हो जाता है। उसकी इच्छा है कि ठेठ किसानों में विरोध करने की शक्ति अर्जित हो।

केदारनाथ सिंह की कवि-दुनिया पर परमानंद श्रीवास्तव ने सही लिखा है - 'केदार की कविताओं की दुनिया एक ऐसी दुनिया है, जिसमें रंग रोशनी, रूप, गंध, दृश्य एक-दूसरे में खो जाते हैं पर यही दुनिया है जिसमें कविता का 'कमिटमेंट' खो नहीं जाता - वहाँ हमें कविता के मूल सरोकार, कविता की बुनियादी चिंता, कविता का कथ्य या संदेश (बेशक स्थूल अर्थ में नहीं) पूरी तीव्रता के साथ ध्वनित या स्पंदित रहता है। केदार की कविता किसी अर्थ में एकालाप नहीं, वह हर हालत में एक सार्थक संवाद है। वह एक पूरे समय की व्यवस्था और उसकी क्रूर जड़ता या स्तब्धता को विचलित करती है।' कवि की कविता में भाव संश्लिष्ट रूप में गुँथे हुए मिलते हैं। ऊपर से कविता पढ़कर सहज ही प्रतीत हो सकती है लेकिन कविता में उतरने के बाद स्पष्ट जाहिर होता है कि कवि ने अपनी चिंता और सरोकार को कितने सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है। हाँ, एक स्तर पर बहुत सरल लगने वाली कविता दूसरे स्तर पर बहुत जटिल लगती है। कहना न होगा कि कवि की यह विशेषता उसे श्रेष्ठत्व प्रदान करती है। एक बात और भी है कि कवि ने जिस संवेदनात्मक संबंद्धता को महत्व प्रदान किया, वह अन्यत्र अनुपलब्ध है।

 

(पाँच)

पिछले कुछ दशकों से सांप्रदायिकों, धार्मिक उन्मादियों, विघटनकारी शक्तियों तथा संकीर्णतावादियों की तादाद में बड़ी तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई है। इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता बाधित हो रही है। जनतांत्रिक मूल्य कलंकित हो रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों से भारतीयता खतरे में दिखाई पड़ती है। आतंक का राज जारी है। घोर अमानवीयता का माहौल उत्पन्न हो रहा है। ऐसे संकटग्रस्त समय में कवि का दायित्व बढ़ जाता है। सौहार्द्र तथा प्रेम, भाईचारे और शांति की स्थापना हेतु वह कटिबद्ध होता है। कवि राजनेता की तरह भाषणबाजी नहीं करता है। वह मानवीय संवेदना को काव्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है। अपने अनुभवों को वह विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करता है। देश को सांप्रदायिकता के जहर से बचाने के लिए वह प्रेम, विश्वास तथा मैत्री के सूत्र में मनुष्य मात्र को आबद्ध करने का प्रयत्न करता है। इस दृष्टि से केदार जी की कविता का महत्व स्वयंसिद्ध है। हाँ, यह सच है कि एतद्विषयक कवि की कविताओं की संख्या कम है। लेकिन, संख्या से कविता का महत्व प्रमाणित नहीं होता। इस संदर्भ में 'इब्राहिम मियाँ का हालचाल' कविता का उल्लेख किया जा सकता है। पीढ़ियों से बने और ठोस हुए संबंध को उकेरते हुए कवि ने परलोक सिधार चुके पिता के मित्र इब्राहिम मियाँ के बहाने सांप्रदायिक सद्भाव को स्थापित करना चाहा है। पिता की पहली पाठशाला के दोस्त थे इब्राहिम मियाँ। उन्होंने अपना हालचाल यूँ दिया है -

'कह देना पिता से सब ठीक-ठाक है
हवा है
पानी है
बस्ती के बाहर एक छोटा-सा कब्रिस्तान है
सब ठीक-ठाक है'

इसी तरह 'सन 47 को याद करते हुए' कविता के गेंहुए, ठिगने नूर मियाँ को भी स्मरण किया जा सकता है। कवि ने अपनी किशोरावस्था के साथी के बारे में खुद से पूछा है जो बेहद मार्मिक है -

'एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में
क्या तुम बता सकते हो?'

केदार जी की कविता सवाल करती है। सवाल करके खामोश नहीं रहती बल्कि वह मनन करने तथा आत्म-विश्लेषण करने के लिए विवश भी करती है। इब्राहिम हो या नूर, ये किसी दूसरे मजहब के न थे बल्कि वे अपने थे, आत्मीय। उनका बिछड़ना कवि के लिए आत्मीयों का बिछड़ना जैसा है।

(छह)

ओड़िया के प्रसिद्ध कवि सीताकांत महापात्र ने सूर्य पर केंद्रित कविता लिखी है। उनका सूर्य 'दिव्य पुरुष', 'सूर्यदेव', 'सर्वव्यापी', 'मायावी पुरुष' है। सीताकांत सूर्य को 'बूढ़ी माँ की मुरझाई आँख में, ओस की ढुलमुल बूँद में, कुआँ-कुआँ की पहली पुकार में' हर जगह देखते हैं। केदार जी ने अस्सी के दशक में एक कविता लिखी थी - सूर्य। दूसरी कविता को उन्होंने 'सूर्य : 2011' शीर्षक से अपने नव्यतम संग्रह में स्थानित किया है। पहली कविता की बानगी है -

'वह रोटी में नमक की तरह प्रवेश करता है
ताखे पर रखी हुई रात की रोटी
उसके आने की खुशी में जरा सी उछलती है
और एक भूखे आदमी की नींद में गिर पड़ती है'

'सृष्टि पर पहरा' की पहली कविता 'सूर्य : 2011' है। यहाँ सूर्य को ताप और ऊर्जा के स्वामी के रूप में देखा गया है। ऊष्मा - विशेष अर्थ में संबंधों की ऊष्मा है। कवि सूर्य को जानता ही है। उसे जलमुर्गियाँ, मछलियाँ आदि भी भली-भाँति जानती हैं। सीताकांत सर्वव्यापी कहते हैं तो केदार जी की कला और अभिव्यक्ति का नमूना देखिए -

"मैं कहीं भी जाऊँ
चाहे जिस भी शहर में
मिल जाता है वह दूर से हाथ हिलाता
और मुस्कराता हुआ
पहले प्रेम की प्रतिद्वंद्वी की तरह'

सूर्य को जानना - एक समकालीन का दूसरे समकालीन को जानना है। सूर्य को संभवतः इतनी आत्मीयता के साथ केदार जी ने पहली बार परिचित कराया है। कितनी सहजता के साथ बड़ी से बड़ी बात कह देने की कला केदार जी में है, इसे निम्नलिखित पंक्तियों से जाना जा सकता है -

'मैं उसे इसलिए भी जानता हूँ
कि वह ब्रह्मांड का
सबसे संपन्न सौदागर है
जो मेरी पृथ्वी के साथ
ताप और ऊर्जा की तिजारत करता है
ताकि उसका मोबाइल
होता रहे चार्ज'

'विद्रोह' शीर्षक कविता कवि के अन्य संग्रह में भी संकलित है। इस कविता के विद्रोह के मूल में अपनी जड़ से मिलने की प्रबल आकांक्षा है। कवि ने अपनी संवेदना को व्यापक बनाते हुए यह चित्रित किया है कि विद्रोह का ऐसा भाव केवल मनुष्य में नहीं होता है, बल्कि बिस्तर, कुर्सी-मेज, किताबें, शॉल, टीवी, नल से टपकती पानी की बूँदों में भी होता है। मनुष्य के कारागार से सभी मुक्त होना चाहते हैं। सचमुच, एक उम्दा कविता है यह।

आज के साहित्यिक वातावरण में कवि का व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए, इसे 'कवि कुंभनदास के प्रति' कविता से समझा जा सकता है। आज के रचनाकार को कुंभनदास की पंक्ति याद करनी चाहिए - 'संतन को कहा सीकरी सों काम'। आज के अधिकांश रचनाकार पुरस्कार पाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में इस कविता की अर्थवत्ता है। कुंभनदास के जमाने में एक सीकरी थी। लेकिन, आज दिल्ली में सीकरियाँ ही सीकरियाँ हैं, जितने मंत्रालय, उतनी सीकरियाँ। कविता का संबंध सीकरी से अच्छा नहीं हो सकता है। हो भी कैसे? कविता में विरोध होता है। यह विरोध सत्ता का भी हो सकता है। सत्ता को विरोध बिल्कुल पसंद नहीं है। उसे तो चापलूसी पसंद है। केदार जी कुंभनदास से पूछते हैं -

'यह कैसी अनबन है
कविता और सीकरी के बीच
कि सदियाँ गुजर गईं
और दोनों में आज तक पटी ही नहीं!'

'ईश्वर को एक भारतीय नागरिक के कुछ सुझाव' से कवि की दृष्टि और उसकी चिंता का आभास मिलता है। इस पर सविस्तार चर्चा किए बिना कवि के शब्दों को ही बिंदुवार प्रस्तुत किया जा रहा है-

(क) 'अणुबम को पृथ्वी से उठाकर / रख लेना स्वर्ग में'

(ख) 'पैसे को / दुनिया से ले लेना वापस'

(ग) 'बदल देना ब्रह्मांड का / जर्जर पहिया'

(घ) 'पृथ्वी के बच्चे / कभी-कभी क्रिकेट खेल आएँ / चाँद पर'

(ङ) 'जाति नामक रद्दी को / फेंक देना अपनी टेबुल के नीचे की / टोकरी में'

(च) 'दिल्ली को / ...यमुना और कुतुब समेत रख देना कहीं और'

उपर्युक्त उद्धरणों से साफ पता चलता है कि केदार जी की कविता प्रश्न के साथ-साथ उत्तर भी देती है। उनकी कविता न केवल व्यवस्था को बदलना चाहती है, बल्कि उत्तम व्यवस्था कायम भी करना चाहती है।

कवि की एक छोटी-सी कविता का उल्लेख करना बहुत जरूरी लगता है। इसका शीर्षक है - 'गमछा और तौलिया'। यूँ देखा जाए तो दोनों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। दोनों की उपयोगिता में बड़ा हेर-फेर नहीं है लेकिन कवि की दृष्टि में - 'जैसे दो संस्कृतियाँ'। गमछा में देशी गंध है तो तौलिया में विदेशी। पहले में भदेसपन है तो दूसरे में आभिजात्य। सृष्टि का नियम (जो कि गलत है) कि आभिजात्य बोलेगा तो देशी को सुनना होगा। कवि ने लिखा है -

"तू हिंदी में सूख रहा है
सूख
मैं अँग्रेजी में कुछ देर
झपकी लेता हूँ"

इस कविता में ही नहीं, केदार जी की अधिकांश कविताओं में संवाद शैली का प्रयोग हुआ है। इससे पाठक आंतरिक रूप से कविता से जुड़ता चला जाता है।

दक्षिण एशियाई मुल्कों में फैली बेरोजगारी की ओर इशारा करने वाली कविता 'वह बांग्लादेशी युवक जो मुझे मिला था रोम में' है। कवि की संवेदना अपने देश की भौगोलिक सीमा तक आबद्ध न रहकर व्यापक बनती है। देशकाल से परे मानव मात्र के लिए प्रसरित होती है। अपेक्षाकृत लंबी कविता की अंतिम तीन पंक्तियाँ किसी को 'स्टेटेमेंट' लग सकती हैं, लेकिन पूरी कविता पढ़ने के बाद ये तीन पंक्तियाँ पाठक को डिस्टर्ब करने की शक्ति रखती हैं। किसी भी देश में युवा-शक्ति सबसे महत्वपूर्ण होती है। युवा देश के गौरव होते हैं। लेकिन, उनका निर्वासन किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को 'प्रोवोक' और 'डिस्टर्ब' करने के लिए पर्याप्त होता है। बहरहाल, तीन पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं -

'एक युवा निर्वासन
जो काम की तलाश में
नाच रहा था रोम में'

नोबेल विजेता अमर्त्य सेन की मानें तो अकाल अप्राकृतिक है। व्यापारियों और महाजनों द्वारा फैलाया गया कृत्रिम मामला है। एक ओर लोग भूखे मरते हैं तो दूसरी ओर भारतीय खाद्य निगम में लाखों टन अनाज सड़ता है। प्रबंधन संबंधी समस्याएँ भी हैं, इसलिए केदार जी की एक कविता का शीर्षक है - 'अन्न संकट?' पूरे संग्रह में यह अकेला शीर्षक है जिसमें प्रश्नसूचक चिह्न लगा है। कवि ने अव्यवस्था का विरोध किया है। बेरोजगारी, भुखमरी आदि समस्याओं पर तमाम कवि कविता लिखते हैं, लेकिन जो रचाव और कसाव केदार जी की कविता में है, संवेदना का जो धरातल विद्यमान है, जो कहन शैली है, भाव-गांभीर्य है और जो शिल्प-निपुणता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। शहर में यह अफवाह है कि संसार के सर्ववृहत भंडार में अचानक दाने कम हो गए हैं। इसे सुनकर किसान के बेटे ने जो किया उसकी अभिव्यक्ति यूँ हुई है -

'विरोध में खोज लाया
कहीं घर के भीतर से राख में दबा
एक पुराना दाना
और पूरी ताकत से
उसे उस पर फेंका
जिधर से उठ रहा था शोर'

याद नहीं आता कि किसी ने ऐसा विरोध अपनी कविता में प्रदर्शित किया है। कवि ने, जो कुछ भी बचा है उसे बचाए रखने पर जोर दिया है। बचे हुए से संभावना के दरवाजे खुल सकते हैं। नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं। अतः कवि की कविता निराशा में विश्वास नहीं करती बल्कि दृढ़ संकल्प और मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। हाँ, कठिन समय में मुँह नहीं चुराती बल्कि उससे मुठभेड़ करती है -

'उस हवा को बचाकर रखने की कोशिश करो
जो तुम्हारे पहियों में है
हो सकता है लंबे समय तक
उसी पर जिंदा रहना पड़े'

(सात)

केदारनाथ सिंह ने उन्नीस शब्दों की कविता 'हाथ' लिखी है, बीस शब्दों के कलेवर वाली 'जाना' लिखी है, साथ ही, केदार जी ने 'त्रिनिदाद' , 'मंच और मचान', 'वह बांग्लादेशी युवक जो मुझे मिला था रोम में' जैसी बड़े आकार की कविताएँ भी लिखी हैं। 'बाघ' तो है ही। लेकिन, यहाँ उदयप्रकाश को समर्पित 'मंच और मचान' पर दो-चार बातें करना अनुचित न होगा। अक्सर लंबी कविता में भाव बिखर जाता है। सूत्र टूट-सा जाता है, क्रम गड़बड़ा जाता है। सहेजना आसान नहीं होता। लेकिन बड़े कवि की पहचान यह होती है कि वह भाव, भाषा, क्रम, संवेदना, शिल्प आदि में समन्वय साधित करता है। केदार जी इस दृष्टि से सफल ही नहीं सार्थक भी हैं।

'मंच और मचान' कविता की शुरुआत के पहले एक नोट है - 'चीना बाबा को - जो असल में एक वृद्ध चीनी भिक्खु थे - मैंने देखा था... उनकी स्मृति में एक छोटा-सा भवन यहाँ आज भी है - स्तूप से हटकर। बाकी सब - जैसे प्रधानमंत्री आना, बरगद का काटा जाना और भिक्खु का प्रतिरोध - अब वहाँ लोक-स्मृति का हिस्सा है"। 'मंच और मचान' कविता बहुआयामी है। इसके कई संदर्भ हैं। विविध परिप्रेक्ष्य भी। मंच सत्ता का प्रतीक है और मचान साधारण मनुष्य का। मचान के प्रतिरोध से सता की चूलें हिल जाती हैं। बरगद के काटने का प्रसंग पर्यावरण विमर्श है तो अपनी जड़ और जमीन से जुड़े रहने की प्रबल आकांक्षा का प्रतीक भी है। समकालीन कविता में 'घर' की याद प्रमुख रूप से आई है। यह भी इस कविता में मौजूद है।

इस कविता में कोरे आदर्श का चित्रण नहीं है। यथार्थ की खुरदुरी जमीन को भी चित्रित किया गया है। सच्चाई से आँखें मूँदकर बैठे रहने की भी बात नहीं है। सत्ता का आदेश था बरगद को काट डालना। भिक्खु ने विरोध किया। पर उस विरोध का कोई परिणाम न मिला। एक बुढ़िया की भी आवाज आई विरोध में पर वह आवाज सत्ता के प्रहार में दब गई। सत्ता का तो काम ही यही है कि आवाज दबा दी जाए। कवि ने लिखा है -

' - कि अचानक
जड़ों के भीतर एक कड़क सी हुई
और लोगों ने देखा कि चीख न पुकार
बस झूमता-झामता एक शाहना अंदाज में
अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद
सिर्फ 'घर' वह शब्द
देर तक उसी तरह
टँगा रहा हवा में'

संपूर्ण कविता की पठनीयता और विश्वसनीयता से पाठक आकर्षित होता है। शब्द-चयन में कवि से बरती गई सावधानी कविता को ठोस और संकेंद्रित बनाती है। जो लोग समकालीन कविता पर अमूर्तन, दुरूहता और अपठनीयता का आरोप लगाते हैं, उन्हें 'मंच और मचान' पढ़नी चाहिए।

'सृष्टि पर पहरा' कविता संग्रह में प्रो. वरयाम सिंह, कवि देवेद्र कुमार उर्फ बंगाली जी, निराला, त्रिलोचन आदि से जुड़े प्रसंगों की काव्यिक अभिव्यक्ति के साथ-साथ पत्नी की अट्ठाइसवीं पुण्यतिथि पर रचित कविता भी है। 'पिता के जाने पर' कविता कवि के अन्य संग्रह में भी संकलित है। इस कविता को पढ़कर सीताकांत की कविता 'चढेई रे तू कि जाणु' की याद आती है। केदार जी की कविताओं को गुना जाए, पढ़ा जाए तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे सही अर्थों में विशिष्ट कवि हैं।

केदार जी की अनेक कविताएँ कवि, कविता, कवि-कर्म को विषय बनाकर लिखी गई हैं। उन्हें मालूम है कि लिखने से कुछ नहीं होगा। लेकिन वे लिखना चाहते हैं। तभी तो उनकी अस्सी वर्ष की अवस्था में 'सृष्टि पर पहरा' कविता-संग्रह प्रकाशित होता है। उम्मीद है कि आगे भी वह कविता की दुनिया को समृद्ध करते रहेंगे। बहरहाल, कवि के शब्दों में -

'मैंने पहली बार जाना
मेरे समय की सबसे जानदार पंक्तियाँ
लिखी जा रही हैं पेड़ों
और पत्थरों की जबान में'

इसलिए, कविता की मृत्यु की उद्घोषणा के बावजूद कवि की सृजनशीलता जारी है। उसका विश्वास है कविता की शक्ति और सामर्थ्य पर -

'पता लगा लो - जो मारे जाते हैं जंगलों में
उन युवा होंठों पर
अक्सर होती है कोई न कोई कविता"

अपने नव्यतम कविता-संग्रह में केदार जी ने गजल लिखी है तो तुकांत शैली में कविताएँ भी लिखी हैं। छंदयुक्त और छंदमुक्त दोनों प्रकार की कविताओं से यह संग्रह समृद्ध हुआ है। पूरा संग्रह पढ़ जाइए, आपको लगेगा कि आप कविता नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि कवि की आवाज सुन रहे हैं, कविता आपसे संवाद कर रही है। जैसे-जैसे आप कविता में उतरेंगे आप चकित हो जाएँगे कि केदार जी किसी दुरूह कार्य को इतना सहज बना देते हैं।

पहले भी कहा गया है कि केदार जी ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। उन्होंने कविता की एक परंपरा स्थापित की है। सैकड़ों कवियों ने केदार जी से कविता के मंत्र अपनाए हैं। अरुण कमल, बद्रीनारायण, जितेंद्र श्रीवास्तव तथा श्रीप्रकाश शुक्ल ने केदारनाथ सिंह की काव्य-परंपरा की आगे बढ़ाया है। यह किसी भी कवि की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है।

इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि केदार जी ने कभी भी अपने को दोहराया नहीं है। प्रत्येक संग्रह में कुछ नयापन है। ताजगी है। नए सिरे से नए भावबोध और नई अभिव्यक्ति के साथ वे उपस्थित होते हैं। ऐसा बहुत कम कवियों में मिलता है। उदाहरण के तौर पर 'तीसरा सप्तक' में जीवन के हर्ष और उलास का महत्व है तो अगले ही संग्रह में बिंबधर्मिता। एतद्पश्चात आम आदमी को उसके अधिकार और दायित्व का अहसास दिलाना कवि का कर्म, धर्म और उद्देश्य बन जाता है। भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, बाजारवादी अर्थव्यवस्था, आवारा पूँजी आदि का विरोध भी केदार जी के कविता-लोक में मौजूद है। रही बात उनके नवीनतम कविता संग्रह की, तो इतना निश्चित कहा जा सकता है कि इसमें उन्होंने ताजा साक्ष्य और वैविध्य से भरपूर चित्र अंकित किए हैं। पारदर्शी भाषा संग्रह की खूबी है तो मनुष्य को संघर्ष हेतु भी आग्रह भी दिखाई पड़ता है। इसमें विस्थापन का दर्द है और प्रतिकूल परिस्थितियों में निरंतर संघर्षशीलता हेतु आह्वान भी। सृष्टि को बचाए रखने के लिए जागरुकता चाहिए। पहरे की जरूरत है दुनिया को बचाने के लिए। सचेतनशीलता जरूरी है मनुष्य जाति को जिंदा रखने के लिए। तभी तो कवि कहता है -

'जाऊँगा कहाँ
रहूँगा यहीं'

सृष्टि सुंदर है। कवि उसे सौंदर्य से परिपूर्ण देखना चाहता है। कवि की दुनिया शब्दों की है। शब्द परम् ब्रह्म होते हैं। अजर, अमर, अमिट। कवि ने लिखा है -

'ठंड से नहीं मरते शब्द
वे मर जाते हैं साहस की कमी से
कई बार मौसम की नमी से
मर जाते हैं शब्द'

कहा जा सकता है कि केदारनाथ सिंह की कविता उनके युग और अंतरमन का सर्जनात्मक दस्तावेज है। कवि के काव्य-संसार में लोक और शास्त्र, समय और समाज, गाँव और शहर, कल्पना और यथार्थ, भाव और शिल्प आदि का अद्भुत समन्वय साधित हुआ है। कवि के साठ से अधिक वर्षों के रचनाकाल में ठहराव नहीं बल्कि निरंतर गतिशीलता परिलक्षित होती है। केदार जी की कविता में कोई दुराव-छिपाव भी नहीं है। उनकी कविता और व्यक्तित्व में बड़ी भारी समानताएँ हैं। जैसा जीवन जिया, वैसा लिखा। उनकी कविता-यात्रा हिंदी की ही नहीं भारतीय कविता की भी अनमोल धरोहर है। उनके रचना-संसार से भारतीय कविता को नई दिशा प्राप्त हुई है। केदारनाथ सिंह समय, समाज, सौंदर्य, लोक तथा मानवता के अत्यंत प्रसिद्ध चितेरे हैं।

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