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सिनेमा

हिंदी सिनेमा का बाल पक्ष
महेश्वर


हिंदी सिनेमा अपनी शताब्दी वर्ष में है। हिंदी सिनेमा कई दौर से गुजर चुका है। हिंदी सिनेमा में बच्चों की भी एक दुनिया शामिल है जिसका मूल्यांकन होना अभी शेष है। देश में बाल सिनेमा को वह स्थान नहीं मिल सका है जो उसे मिल जाना चाहिए था, लेकिन इसके बावजूद भी बच्चों को लेकर जो फिल्में बनी हैं उन्हें कमोबेश स्वीकारा गया है। अन्य भारतीय भाषाओं के बनिस्बत हिंदी में बाल सिनेमा का निर्माण अधिक हुआ है। राजकपूर से लेकर आमिर खान तक ने बच्चों को केंद्र में रखकर बाल सिनेमा का निर्माण किया है। ये सिनेमा सिर्फ मनोरंजन ही नहीं कराते बल्कि बच्चों से जुड़ी समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित कराते हैं। 1980 के दशक में आई 'मिस्टर इंडिया' थी जो अदृश्य मानव को लेकर बनी थी लेकिन उस फिल्म के केंद्र में बच्चे ही थे। वह अपने समय में काफी पसंद की गई फिल्मों में से एक है। 'नन्हे जैसमेर', 'अपना आसमान', 'तारे जमीं पर', 'भूतनाथ', 'ब्लू अंब्रेला', 'बम बम बोले' आदि बाल फिल्मों ने बाल सिनेमा की अवधारणा को थोड़ा बदला है। नई भाव-भूमि पर उपजी ये फिल्में संभावना का नया धरातल पैदा करती हैं। इन फिल्मों में मानवीय संबंधों और सहयोग, बाल समस्या को बड़ी ही विविधता और खूबसूरती से फिल्माया गया है।

बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'भूतनाथ' जिसका निर्देशन विवेक शर्मा ने किया है, में बंकू और भूतनाथ के रिश्ते ने खोती जा रही संयुक्त परिवार की अवधारणा और भारतीय परिवारों के बिखर रहे मूल्यों के प्रति सचेत किया। हिंदी फिल्मों में बच्चों की मौजूदगी या यूँ कहें कि बच्चों की फिल्मों के प्रति हमारी धारणा फिल्म 'मकड़ी' से बदली। विशाल भारद्वाज की 'ब्लू अंब्रेला' ने भी संवेदना के स्तर पर बहुत प्रभावित किया।

इरफान कमल ने अपनी फिल्म 'थैंक्स माँ' में मुंबई की झुग्गी-बस्तियों के आवारा और अनाथ बच्चों के माध्यम से अधूरे बचपन की मार्मिक कथा दर्शाने की कोशिश की है। इस फिल्म में एक अनाथ बच्चा है। वह खुद को सलमान खान कहलाना पसंद करता है। दूसरे आवारा और अनाथ बच्चों के साथ वह पाकेटमारी कर अपना गुजारा करता है। उसकी एक ही इच्छा है कि किसी दिन अपनी माँ से मिले। बाल सुधार गृह से भागते समय उसे दो दिनों का एक नवजात बच्चा मिलता है। वह उस निरीह बच्चे को ले आता है और उसका लालन-पालन करता है। अपने दोस्तों की मदद से वह उस बच्चे की माँ तक पहुँचने में सफल हो जाता है, लेकिन जब उसे सच्चाई का पता चलता है कि उस बच्चे को उसकी माँ ने ही वहाँ छोड़ा था तो वह हतप्रभ रह जाता है। फिल्म के अनुसार देश में 270 बच्चे प्रतिदिन अनाथ छोड़ दिए जाते हैं। इन बच्चों की जिंदगी शहर की गुमनाम गलियों में गुजरती है और कुछ बच्चे आजीविका के लिए अपराध का रास्ता अपना लेते हैं।

हाल ही में आई फिल्म 'पाठशाला' के जरिए समाज और बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को दिखाने की कोशिश की गई है। टीचर्स और बच्चों के माता-पिता की आँखें खोलने वाली फिल्म है। इसमें स्कूली बच्चों से संबंधित ज्वलंत मुद्दों को उठाया गया है। पब्लिक स्कूलों के व्यावसायिक नजरिए को परखने की कोशिश की गई है।

प्रियदर्शन की फिल्म 'बम बम बाले' को भी बच्चों ने बड़े प्यार से देखा। इस फिल्म में दो छोटे भाई-बहन हैं। एक दिन गलती से भाई अपनी बहन के जूते गुम कर देता है। माँ-बाप गरीब हैं इसीलिए उनसे डांट खाने का डर है। दोनों भाई-बहन एक तरकीब सोचते हैं और सुबह जो जूता पहनकर बहन स्कूल जाती है वही जूता दोपहर में भाई पहन कर अपने स्कूल जाता है। परिवार और स्कूल के बीच का ये टाइम मेनेजमेंट दिलचस्प रंग लाता है। भाई इंटर स्कूल मैराथन रेस में पहले नहीं बल्कि तीसरे नंबर पर आना चाहता है क्योंकि तीसरा पुरस्कार जूते हैं जो उसकी बहन को चाहिए। लेकिन वह मैराथन रेस में प्रथम स्थान पा जाता है। उसे आगे की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिलती है, लेकिन वह खुश नहीं होता। बल्कि प्रथम स्थान पाकर वह दुखी हो जाता है कि उसे तीसरे नंबर का पुरस्कार 'जूता' जो उसका सपना और जरूरत है, अब नहीं मिल पाएगा। यह इस फिल्म का काफी मार्मिक प्रसंग है। वह जीत कर भी अपने आप को हारा हुआ ही मानता है। इसी कहानी पर प्रख्यात फिल्मकार माजिद मजिदी ने 'चिल्ड्रेन ऑव हेवेन' बनाई है। हिंदी में ही खालिद वाई बाटलीवाला ने 'सलाम बच्चे' नाम से यह फिल्म बनाई है।

आमिर खान की फिल्म 'तारे जमीं पर' डिस्लैक्सिया से पीड़ित एक मंदबुद्धि बच्चे पर आधारित है। इस फिल्म ने कई कीर्तिमान स्थापित किए और डिस्लैक्सिया से पीड़ित बच्चे के मनोविज्ञान को बड़ी गंभीरता और सजगता से व्यक्त किया। 'तारे जमीं पर' के गीतों ने भी एक अलग छाप छोड़ा। 'तहान' और 'रामचंद पाकिस्तानी' जैसी फिल्मों की स्क्रिप्ट में बच्चे कहीं पीछे छूट गए। बच्चों की पढ़ाई पर आधारित 'नन्हा जैसमलेर' की स्क्रिप्ट में कुछ नयापन तो था, लेकिन फिल्म की कहानी बॉबी देओल के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। विशाल भारद्वाज की 'ब्लू अंब्रेला' को तो नेशनल अवार्ड तक से सम्मानित किया गया। राहुल बोस की 'चेन कुली की मेन कुली', अनुराग कश्यप की 'बाल गणेश', 'माई फ्रेंड गणेश', 'रिटर्न ऑफ हनुमान' जैसी फिल्में भी काफी चर्चा में रहीं। अजय देवगन की 'राजू चाचा' भी ठीकठाक चली थी। कुछ वर्षों पहले संजय लीला भंसाली की 'ब्लैक' आई थी, जो एक छोटी अंधी और गूँगी-बहरी लड़की की कहानी थी। इसमें अमिताभ उस अंधी बच्ची के कठोर शिक्षक के रूप थे, को कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। इस फिल्म को काफी सराहना भी मिली थी। इसी तरह अमिताभ बच्चन अभिनित 'पा' में भी प्रिजेरिया रोग से ग्रसित एक बच्चों को दिखाया गया।

पीयूष झा की फिल्म 'सिंकदर' में कश्मीर के तनाव और दर्द को बच्चों की आँखों से देखने की कोशिश देखी जा सकती है। 'सिंकदर' एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसे फुटबाल से बेहद लगाव है और वो राष्ट्रीय स्तर पर फुटबाल खेलना चाहता है। पर एक दिन उसे सड़क पर एक बंदूक मिल जाती है, बस इसके बाद उसकी जिंदगी में सब कुछ बदलने लगता है। इस फिल्म में कश्मीरी बच्चों के दर्द को पर्दे पर उतारने की कोशिश की गई है।

'स्टेनली का डिब्बा' फिल्म की कहानी एक स्कूल में पढ़ने वो नौ वर्षीय स्टेनली की है। स्टेनली अपने दोस्तों के साथ पढ़ाई के साथ-साथ नॉर्मल जिंदगी जी रहा है। लेकिन एक दिन जब हिंदी के टीचर बाबूराम की नजर उसके और उसके साथियों के खाने के डिब्बों पर पढ़ जाती है तो उसकी मुसीबत आ जाती है। यही नहीं, बाबूराम को जब ये पता चलता है की दरअसल स्टेनली तो डिब्बा लाता ही नहीं तो उसकी मुसीबत और बढ़ जाती है। बाबूराम उस पर डब्बा लाने का दबाव डालता है और कहता है कि अगर वो डिब्बा नहीं लाया तो उसे स्कूल में नहीं घुसने दिया जाएगा। अंततः स्टेनली के डिब्बे की तलाश में मुहिम शुरू होती है और इस मुहिम में जो घटनाएँ घटती हैं उन्ही की बानगी है स्टेनली का डिब्बा। फिल्म 'स्टैनली का डब्बा' के अंत में जब दर्शकों को जानकारी मिलती है कि स्टैनली अनाथ है, उसके माता-पिता नहीं हैं और वह अपने खड़ूस चाचा के रहमोकरम पर जी रहा है, तो दर्शकों की आँखों से आँसू छलक जाते हैं।

यूटीवी स्पॉटबॉय और सलमान खान के सह-निर्माण में बनी चिल्लर पार्टी मासूम बच्चों के ऐसे समूह की कहानी है जो एक राजनेता के खिलाफ खड़े हो जाते हैं और एक आवारा कुत्ते की जिंदगी बचाकर सबका दिल जीत लेते हैं।

देश से सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रपति और मिसाइलमैन ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से मिलने के लिए एक बच्चा किस-किस तरह के जतन करता है यह फिल्म 'आई एम कलाम' की कहानी में है। जिसके निर्देशक हैं नीलना माधव पांडा। 'आई एम कलाम' एक गरीब राजस्थानी लड़के छोटू की कहानी है जो ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का बहुत बड़ा प्रशंसक है और उनसे मिलना चाहता है। फिल्म का कथ्य गरीबी रेखा के नीचे जीवन-बसर कर रहे नन्हें छोटू के ईद-र्गिद घूमता है, जो विपरीत परिस्थितियों में जोश और जज्बे को बनाए रखता है। छोटू की प्रेरणा पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हैं। कलाम के एक भाषण को सुनने के बाद जीवन के प्रति छोटू का नजरिया बदल जाता है। दिन भर बाल मजदूरी के बाद शाम को किताबों के साथ वक्त गुजार कर छोटू अपनी पढ़ाई पूरी करने की हर संभव कोशिश करता है। छोटू को यकीन है कि एक दिन वह कलाम जैसी बड़ी शख्सियत बनेगा।

हाल ही में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'फरारी की सवारी' सपने टूटने और सपने साकार होने के बीच तीन पीढ़ियों के संबंध और समझदारी की कहानी है। यह फिल्म पारिवारिक रिश्ते की डोर को बहुत ही प्रभावशाली तरीके से पेश करती है। कलाकारों ने 'फरारी की सवारी' को उल्लेखनीय फिल्म बना दिया है। फिल्म का मुख्य पात्र रूसी अपने प्रतिभाशाली क्रिकेटर बेटे केयो के लिए कुछ भी कर सकता है। अपने बिस्तर पर बैठे टीवी देखने में मशगूल मोटा पापा घर की हर गतिविधि से वाकिफ रहते हैं। मोटा पापा अपने किशोरावस्था में क्रिकेटर थे। रणजी खेल चुके थे, लेकिन नेशनल टीम में चुनाव के दिन दोस्त दिलीप धर्माधिकारी की साजिश की वजह से छँट गए थे। क्रिकेट में छल-कपट भुगत चुके मोटा पापा नहीं चाहते कि उनका बेटा क्रिकेटर बने। बेटा तो मान जाता है, लेकिन पोता क्रिकेटर बन ही जाता है। पोता केयो का चुनाव लार्ड्स के विशेष प्रशिक्षण के लिए होने वाला है। एक ही दिक्कत है कि चुने जाने पर उसे डेढ़ लाख रुपए की फीस भरनी होगी। सीमित आय के इस परिवार के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना मुश्किल काम है। रूसी अत्यंत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक है। बेटे के भविष्य के लिए वह एक बार अपनी ईमानदारी से डिगता है। उसे कुछ घंटों के लिए अपने पिता के संपर्क से सचिन तेंदुलकर की लाल फरारी किसी को उपलब्ध करवा देनी है, जिसके एवज में उसे डेढ़ लाख रुपए मिल जाएँगे। घटनाएँ कुछ यों घटती हैं कि वह सचिन तेंदुलकर को बताए बगैर उनकी फरारी लेकर निकल जाता है। फरारी की सवारी में पिता-पुत्र संबंध का मार्मिक चित्रण है। केयो के परिवार की स्थिति-परिस्थति देख कर आँखें भर आती हैं। फरारी की सवारी मध्यवर्गीय महत्वाकांक्षा और उसे पूरा करने के संघर्ष को दिखलाती है। फिल्म में सचिन तेंदुलकर और उनकी लाल फरारी को प्रतीक रूप से इस्तेमाल किया गया है। जो फिल्म को मार्मिकता प्रदान करती है।

क्षेत्रीय बाल सिनेमा पर ध्यान दें तो मराठी की 'श्वास' और सिंधी की 'हारुन अरुण' का नाम लिया जा सकता है। 'श्वास' में एक छोटा-सा बच्चा है जिसके आँखों मे कुछ तकलीफ हो गई है और उसे देखने में परेशानी होने लगी है। उसका पिता एक सड़क दुर्घटना के कारण विकलांग हो गया है और घर में बेकार बैठा रहता है। उसके दादा उसे डॉक्टर के पास ले जाते हैं लेकिन उसे शहर के डॉक्टर के पास ले जाने की सलाह देता है। उसके आँखों के इलाज को लेकर ही कहानी आगे बढ़ती है। संवेदना के स्तर पर यह फिल्म काफी कारुणिक दृश्य पैदा करती है।

'हारुन अरुण' का ताना-बाना स्वतंत्रता आंदोलन की घटना पर आधारित है। देश विभाजन के समय हजारों बच्चे भी प्रभावित हुए थे। यही इस फिल्म का केंद्रीय विषय है। हारुण और अरुण सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं। वे पक्के दोस्त हैं। सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देते हैं। अरुण की माँ हारुन को बहुत प्यार करती है, बल्कि उसे अपना ही बेटा मानती है। विभाजन की त्रासदी को भुलाकर हिंदू-मुस्लिम को इस फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है। यह हमारी सांस्कृतिक विशेषता है कि हम मानवता को सबसे पहले स्थान देते हैं। और अंततः हम सब एक हैं।

कहा जा सकता है कि बीते एक दशक में बच्चों को लेकर काफी फिल्मों का निर्माण हुआ है। बड़े परदे पर भी इन फिल्मों ने अच्छा खासा व्यापार किया जो देश में बाल सिनेमा के निर्माण को बल प्रदान करने में सहायक है। विदेशों की अपेक्षा देश में बाल सिनेमा को मुख्य धारा में गंभीरता से अभी तक नहीं लिया गया है। मुख्य धारा की सिनेमा में बाल सिनेमा को भी स्थान मिले तो निश्चत रूप से देश में बाल सिनेमा का भविष्य उज्जवल होगा और उसे एक नई दिशा मिलेगी। इसके लिए हमें क्षेत्रीय सिनेमा को भी प्रोत्साहित करना होगा और नए निर्माताओं को भी प्रोत्साहन और सहायता देनी होगी।

बच्चों को लेकर बनी ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक रूप से तो सफल रही हैं साथ ही इनका सकारात्मक प्रभाव भी समाज पर पड़ा है - न सिर्फ बच्चों पर बल्कि वयस्कों भी। बाल मनोविज्ञान तथा बच्चों की समस्याओं से जुड़ी इन फिल्मों का बड़ी संख्या में निर्माण होना चाहिए। हमारा समाज अब तक डिक्सलैक्सिया और प्रिजेरिया जैसी बीमारियों से अभिज्ञ था लेकिन तारे जमीं पर और पा जैसी फिल्मों के कारण हम उनसे परिचित हुए। इन फिल्मों ने हमारी सोच को काफी गहरे तक प्रभावित किया है। कह सकते हैं कि इन फिल्मों के कारण बच्चों के प्रति हमारा नजरिया बदला है। बाल फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से आँकना सही न होगा। जरूरत इस बात की है कि हम पश्चिम से कुछ सीखें। बॉलीवुड की यह त्रासदी है कि यहाँ बच्चों की फिल्मों को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना उसे मिलना चाहिए और न ही उसे गंभीरता से ही लिया जाता है। इस मामले में सिनेमाकारों को शिक्षाविदों और मनोचिकित्सकों का भी सहयोग लेना चाहिए ताकि बच्चों से जुड़े विषयों पर स्तरीय और महत्वपूर्ण फिल्में बन सकें। मुख्य धारा की सिनेमा में बाल सिनेमा को भी स्थान मिले तो निश्चत रूप से देश में बाल सिनेमा का भविष्य उज्जवल होगा और उसे एक नई दिशा मिलेगी।


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