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कविता

यातना-शिविर
मत्स्येंद्र शुक्ल


आश्रम-द्वार के सम्‍मुख
पंक्तिबद्ध बैठे भिखारी मौन देख रहे
पथ पर उड़ती बारीक ताजी धूल
ड्रम में सनकता गाढ़ा लसीला धुआँ
आदमी वो- भी जो पिघले डामल से
पाट रहे सड़क पत्‍थर का नुकीला चेहरा
भिखारी निहारते उन्‍हें
जो चल-फिर रहे राज पथ पर
कोई उत्‍सुक नहीं भिक्षार्पण के लिए
उनके मस्तिष्‍क में खास योजना नहीं
केवल रोटी सब्‍जी के टुकड़े
पेट भरने के निमित्‍त
फटा-पुराना वस्‍त्र ढँक सकें तन
परिवार की समृद्धि का स्‍वप्‍न भी नहीं
दिल-दिमाग में
भिखारी उपेक्षित माँगते रहेंगे सदैव भिक्षा
यह संसार यातना-शिविर अभावी व्‍यक्ति के लिए


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