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कविता

आदिम राग
मत्स्येंद्र शुक्ल


अरण्‍य में कहीं दूरऽऽ
तिर-तिर बज रही बाँसुरी
हवा मंद-मंद डोल रही
पुरवा रस घोल रही
कौन वह
नाच-थिरक
टेर रहा बाँसुरी
बेचैन हुआ जा रहा मन
झन-झन बज रहा तन
प्रकृति में द्वंद्व प्रति द्वंद्व -
ब्राह्मांड का महास्‍वर यह
- आदिम राग
बजा रहा वही
रचता जो सृष्टि गगन-छाँव
महाप्रलय के उपरांत


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