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कविता

जनता की भीड़ में
मत्स्येंद्र शुक्ल


उस रोज शब्‍दों के हुजूम को देख स्‍तब्‍ध रह गया :
इतने अधिक शब्‍द क्‍यों चमक रहे रचकर पुष्‍ट व्‍यूह
औसत हवा रसीली धूप के फैलाव में घबड़ाया-सा
फूल पत्‍तों से लदी बनखेर लताओं
झोंझ में अँटके सड़े दानों खिसक कर उड़ते पंखों
मोथ की गुलाबी ठोंठ कचनार की समृद्ध टहनियाँ खुजलाता रहा
उपलों की आड़ में बैठी बातूनी किलहटी पीत मुख
सुना रही अगवानी के मांगलिक लोक-छंद
अरुणाभा से विभूषित पीपल के कंधे से झाँक रहा सूर्य
अकंपित वातायन लोहित वर्ण शिशु दमकता ललाट
रस-घट भर लेटी कुमुदनी जल-मंडप पर तना वितान
गगन में कोलाहल नहीं। छने चोकर ज्‍यों उड़ते कुंकुम-कण
कठफोड़वा दाँत साफ कर कुट-कुट खोदता चंदन की लकड़ी
मक्‍के की बाल तोड़ कौवा बैठा कुएँ की छत पर
सोन चिड़िया सम्‍हाल रही केले की कली
काकुन की बाल उठा तोता दाबता पंजे के छितरे नाखून
मुझे हाथ झुलाता बिल्‍कुल खामोश देख कहा परिचित कुछ लोगों ने -
आकाश और दिनों से ज्‍यादा साफ। क्‍या तलाश रही आँखें
घन-गर्जन नहीं किसी इलाके में उपल वृद्धि
जमीन का नक्‍शा टटोल निकल जाओ गाँव की गद्दी पर
ज्‍वार का अधपका भुट्टा सहला पूछा कुछ देख नहीं रहे क्‍या ?
शब्‍द है उड़ रहे पंख खोल। प्रश्‍नों से घिरा ऐसे में कहाँ जाऊँ
बिंब प्रतिबिंब से अपरिचित जन बात सुन चेहरा झाँकने लगे
और बैलों को टिटकोरते चल दिए उन दुरसे खेतों की तरफ
जहाँ नीलगायें सूँघ रहीं सरसों के कच्‍चे फूल
दो क्षण बाद महसूस किया श्रृंखलाबद्ध आ रहे बोलते शब्‍द
कि जोड़ कर लिखो शताब्‍दी की सार्थक कविता काल-गाथा
सशक्‍त कविता ही स्‍थापित करेगी तुम्‍हें जनता की भीड़ में


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