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कविता

जीते गा समूह हारे गा तानाशाह
मत्स्येंद्र शुक्ल


सर्प के मुकाबले में तनी बिल्‍ली का सावधान पंजा देख
ठहाका मार हँसता बाघ-बघर्रों से भरा जंगल
जो असंभव उसे भी संभव बना देता चापलूस माहौल
हाथी भालुओं का पता-ठिकाना नहीं साधारण पशु
जाबिड़ कुत्‍ते लुहार आखेटक ताड़ रहा सियारों की चौकड़ी
चतुर शशक का वट की आड़ में शरीर छिपाने का कौशल
फुफकारता दाँत बजा ऐंठता मौत का फरेब रचता सर्प
धैर्य और साहस में कम नहीं जड़ के खोपे में छिपे चूहे
जल से धुले पत्‍थर पर चकित हैं मोर मोरनी पंख तान
मेढकी उछल-कूद सूँघ रही गाढ़े जल का पीला फेन
जलाशय सुरक्षित नहीं सुअरों की धमाचौकड़ी
उजबंक भैसा मथता तट का गँदला पानी
गर्द गुबार से परिपूर्ण सुका पीपल अल्‍प दृष्टि
कच्‍चे सूत के आसन से खास संकेत दे रही नीली चिड़िया
धूप से झुँझलाया कुत्‍ता खाँसता तराई के पुट्ठे पर
लसोढ़े के पत्ते पर आखिरी साँस ले रहा रेमू का जोड़ा
मट्ठा मथ झोंपड़े से झाँकती अहिरिन जंगल में क्‍या हुआ ?
वृत्‍त बना सर्प को नए सिरे से घेर रहे चू‍हे खरगोश लोमड़ी
नवजात की सुरक्षा में बिल्‍ली अकेली नहीं अरण्‍य-विप्‍लव में
जनतंत्र में अभिनव मंत्र से प्रेरित खड़े सतर्क सब
जीतेगा समूह हारेगा तानाशाह हो-हल्‍ला नहीं कहीं
हरेक ललकार रहा निज की भाषा में
हम एक हैं रहेंगे सदैव संघबद्ध क्रूरता के विरुद्ध
क्रोध के बुल्‍ले छोड़ साँप लोटता दूब की सूखी चटाई पर तिरष्‍कृत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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