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कविता

समी की आड़ में कुपुटता पत्तियाँ
मत्स्येंद्र शुक्ल


शुरू में उम्‍मीद न थी कि नाराज होने पर
भाषा और व्‍याकरण के बीच झंझटे पाल
काट कर समेट लेगा वह डीह के पुराने फलदार पेड़
यद्यपि हथेली पर उग आए थे रोयेंदार गझिन काँट
रक्‍ताभाव में काँपती गठीली देह अधर निर्लिप्‍त
गर्द गुबार जमें पथ से गुजरता काँपता अधेड़
केवल रोशनी की वापसी को नहीं मानता उद्देश्य
सभ्य होने के गुमान में तोड़ता नहीं शब्‍दों के घौद
वाक्‍य मटमैले रहें जड़ समेत उखड़ जायँ मंदार की गाँठे
भाषा के अतिरिक्‍त कसाव से अक्‍सर घबड़ाता स्‍वावलंबी
आक्रोश और प्रतिक्रिया की अवधूत मुद्रा में
पहुँचता वह उस शिला-खंड के निकट
जहाँ वनमानुष चिमगादड़ पखेरुओं के अतिरिक्‍त
पड़ाव डालने की हिम्‍मत नहीं पालता प्राणी
गूँगे-सा पछोरता दुपट्टे का विदीर्ण मुख पंकिल जल
समी की आड़ में नचाता पत्तियाँ घिसता भुजाली की नोक
बस, इतने में तन जाता अड़ियल हिंसक अंधकार
घाटी के सिरहाने पत्‍थर पर सुस्‍ताता तापहीन सूर्य
कंधा उचाक थका जोगी ठोंकता सारंगी की अंतिम खूँटी
जा रहा उस ठौर जहाँ रात भर बजती तनावमुक्‍त वीणा
देर तक गुफाओं में घन-घन बजता घंटा हिंसा के संकेत
छौने बगोड़ती बंजारिनें इशारे से समझातीं अभी टूटेंगे और शिखर
लड़कियाँ केश के डोरे खोल देख रहीं कालेपन में डूबता भुजंग पर्वत


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