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कविता

पवित्र शब्दों के विरुद्ध
मत्स्येंद्र शुक्ल


कौन घोल रहा जहर गाँव के आखिरी कुएँ में
कब्रगाह मे चहकते भ्रूण पर उजबक छिड़क रहे गर्म राख
उपले में धँसे रक्‍तश्‍लथ छुरे का रोमांचक क्षेपक
वस्‍तुएँ जो गिद्धों के पंजे से नष्‍ट सधी नहीं अंत तक
सुरक्षा के नाम पर खड़ा जो चौराहे पर भरोसेमंद नहीं नपुंसक प्रदर्शन
अँजुरी भर अन्‍न मुट्ठी भर लावा का सपना सँजो
रुकमी टहल रही भिखारियों की संगत
विश्‍वसनीय हवा जो गर्म चूम रही ओंठ की हरीतिमा
चुर-मुर टूटते संवेदना के अवयव अचूक अपमान
पवित्र शब्‍दों के विरुद्ध हो रहा शक्ति का विलक्षण प्रयोग
चूने के फेन-सा फफकता देह का खून
करिहारी खा कुछ-भी करने को तत्‍पर अधेड़ औरतें
पंगुल बसूले की धार से शीशम की जड़ पर खोदता निशान
ताल की सूकरी चमक रही कीचड़ की माँग में सड़ी काई
तिराहे पर उदास देख मुझसे कहता बौझक एक आदमी
तुम्‍हें कुछ मालूम है मैं किस तरफ जाना चाहता हूँ ?
एक बटेर तीन तीतर मिल छेद रहे पहाड़ का गुंबद
नदी की ठुड्डी पर उछल वह तोड़ता फटी कमीज की बटन
पुरानी इमारत की तमाम घटनाएँ सोच मैं निहारता अपलक
तेजस्‍वी चेहरा सिर के छँटे बाल सफेद बाल
माथे पर उठी सलवटों से झरते सत्‍ताइस प्रश्‍न
जिनके उत्‍तर आसान नहीं
कबूतर की गर्दन पर टेंगारी भाँजना समय का संकल्‍प नहीं
मौलश्री की तिहरी झाड़ से कहाँ-तक जूझेगा चिड़ी का बच्‍चा अकेला


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