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कविता

क्या तुमने देखा
अच्युतानंद मिश्र


जब वह बाँस की महीन खपचियों से
बुन रही थी टोकरी
वह देख रही थी सपना
क्या तुमने देखा ?

जब वह तपती धूप में गोबर से
लीप रही तीन आँगन वाले
तुम्हारे घर को
वह लिख रही थी एक लंबी कविता
क्या तुमने देखा ?

जब वह पछिट रही थी
तुम्हारे असंख्य जोड़ी कपड़े
वह धरती को
थपकाकर सुला रही थी

क्या तुमने देखा ?

नहीं तुम नहीं देख पाओगे
वह सब कुछ
आखिर दुनिया घृणा की
बंद आँखों से नहीं
स्नेह की खुली आँखों से देखी जाती है

यकीन ना हो तो पूछना
अपनी बुढ़िया दादी से
भेद वाली वह बात
जब पैदा होने को थे तुम्हारे पिता
तो नाल काटने को बुलाया था उसे

उसके हाथ में था ब्लेड का एक टुकड़ा
बंद कमरे में बेहोश थी दादी
और किलक रहे थे पिता


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