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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


आखिर एक दिन बिहारीमोहन कुंज बिक गया। पंडे और दलाल के हाथों से बचकर जो रकम ठाकुर साहब के हाथों में आयी, उसका भी एक हिस्सा आलमगढ़ी को देना पड़ा। अपने दादा द्वारा राधा-दामोदर को पहनाये गये सोने के गहने, सोने की वंशी आदि निकालकर ठाकुर साहब चाहते, तो अपने पास रख सकते थे। कृष्ण की आँखें और पोशाक का सौदा करने वाले एक परिचित व्यापारी ने उनसे कहा था, 'साहब छाती पर पत्थर रखिए, नहीं तो गुजारा करना कठिन हो जाएगा। यह पहले का ब्रज नहीं है। आजकल लोग मूर्ति के कपड़े उतारकर बाजार में बेचने लगे हैं।'

किन्तु ठाकुर साहब छाती पर पत्थर नहीं रख सके। सोने के गहने और वंशी वे किसी प्रकार भी उतारकर न ला सके। कुछ दिनों से उन्हें आत्मग्लानि हो रही थी। यह मन्दिर उनकी वंश-परम्परा का एकमात्र स्मृतिचिह्न था। दादा मरते समय कह गये थे, 'भीख माँगने की स्थिति आ जाने पर भी मन्दिर को हाथ न लगाना और ट्रस्ट के पैसों के प्रति कोई लोभ न रखना। अन्यथा तुम्हारा अशुभ होगा।'

ठाकुर साहब का परिवार राधेश्यामी बुढ़ियों वाली एक कोठरी में जा टिका। दादा के दिनों में इस कोठरी में ताँगे के घोड़े की रसद रखी जाती थी। बिना खिड़की वाली इस अँधेरी कोठरी में आ जाने के बाद ठाकुर परिवार को एक अन्य मानसिक दुश्चिन्ता लग गयी। मृणालिनी अब कोठरी के बाहर कच्चे फर्श पर पड़ी रहने लगी। राधेश्यामी बुढ़ियों की तरह बाजार के आस-पास चक्कर लगाती। आश्रम और चुंगी के आस-पास राधेश्यामी बुढ़ियों की तरह घूमकर वह टीन के डिब्बे और लकड़ी के टुकड़े इकट्ठे कर गृहस्थी जमाने की चेष्टा करती।...किन्तु आस-पास के लोग धीरे-धीरे कहने लगे कि इस कोठरी में आने के बाद से मृणालिनी का मानसिक सन्तुलन अपनी माँ की तरह बिगडऩे लगा है।

खाली टीन, बोतल, टीन के ढक्कन आदि से उसने इस अँधेरी कोठरी का एक हिस्सा पूरी तरह भर दिया।

मन्दिर में रहते समय ठाकुर साहब छड़ी के सहारे थोड़ा इधर-उधर घूम-फिर लेते थे। कभी-कभी बाजार की ओर की सीढ़ी पर भी जा बैठते थे। अब वे बाहर नहीं निकल पाते। क्योंकि अन्धे साहब की लाठी अब काम नहीं देती थी। टूटी ईंटों का फर्श, गड्ढों और कूड़े के बीच लाठी बेकार हो गयी।

वे इस अँधेरे कुएँ में पड़े दिन पर दिन बिताने लगे।...इस बीच गर्मी के भयंकर कड़े दिन आ गये। कोठरी के बीच इन तीनों का दम घुटने लगा। दिन की धूप और रात को दीवारों से निकलने वाली गर्मी उनको भूनने लगी।

ब्रज की चार हजार आश्रयहीना राधेश्यामी बुढ़ियों, विशेषत: पूर्वांचल से आयी हुई स्त्रियों को गर्मी सहने का अभ्यास हो गया था। वे नंगी देह रहकर भी भीषण गर्मी सह जाती थीं।

किन्तु ठाकुर साहब के परिवार के लिए यह स्थिति भयानक हो उठी। तीनों आक्रामक पशु जैसे हो गये। बीच-बीच में कोठरी से अश्लील गाली-गलौज भी बाहर सुनाई पड़ने लगी। ठाकुर साहब की मानसिक विकारग्रस्त पत्नी का स्वर सुनाई पड़ा, 'तुम्हारे कारण हमारी यह दुर्दशा है। मुझे सब मालूम है तुम किस समय किस रंडी के पास गये थे। मुझे सब याद है। मुझे और भी बहुत सी बातें याद हैं। 1966 ई. में वेश्यावृत्ति-विरोधी कानून के अनुसार कलकत्ता में पाँच लोगों पर केस हुआ था और 1967 में 19 लोगों पर। 1966 ई. में केन्द्रीय मन्त्री ने वेश्याओं के एक समारोह में उन्हें आश्वासन दिया था कि उनके ऊपर पुलिस के अत्याचार बन्द होंगे।'

एक विशेषज्ञ की तरह बातें करती हुई ठाकुर साहब की पत्नी खीं-खीं कर हँस उठीं। फिर वह ठाकुर साहब की ओर उँगली उठाकर चीख उठीं-'मैं और भी बातें जानती हूँ। 1962 ई. में मेरी जन्मभूमि के लोगों ने विलायती शराब पी थी। 276823 लीटर और 1964-65 ई. में 3420748 लीटर, यह संख्या ठीक है या नहीं, मुझे याद नहीं है। किन्तु तुम किस समय किस दुकान पर गये थे इसका भी हिसाब मैं रखती हूँ।'

ठाकुर साहब ने काफी स्निग्ध स्वर में कहा, 'जाओ बाहर हवा चल रही है। कुएँ के पास चटाई बिछा कर बैठो।'

'तुम नीम के पत्तों को देखकर समझ रहे हो कि हवा चल रही है। दरअसल यह बन्दर के कारण है। देख नहीं रहे, वह भारी मुँह और टेढ़ी गरदन वाला बन्दर कैसे छलाँग लगा रहा है। इसलिए तो नीम के पत्ते हिल रहे हैं।'

बन्दर की ओर देखकर ठकुराइन हँस पड़ीं। इसके बाद बन्दर देखने के लिए कुएँ के पास आकर खड़ी हो गयीं। यह सुयोग पाकर अन्धे ठाकुर साहब टटोलते-टटोलते बाहर का दरवाजा बन्द करने के लिए बढ़े। किन्तु हिंसक बाघिन की तरह ठकुराइन लौटीं।

'तुम दरवाजा बन्द नहीं कर सकते। सब सड़-सड़ कर मरेंगे। पूरा खानदान तबाह होगा। अब कंठी माला पहनने से क्या होगा? तुम तो पाप में गले-गले तक डूबे हुए हो।'

उन्होंने अन्धे ठाकुर साहब को लाकर फिर से टीन की कुर्सी पर बिठा दिया। चौकी पर बैठे-बैठे उन्हें पत्नी की बातें सुननी पड़ीं।

मर्मस्पर्शी कंठ से ठकुराइन ने कहा, 'मुझे मालूम था, भगवान मुझे यह सुअवसर देगा। बहुत दिन पहले जब तुम शराब और छिनाल औरतों के साथ मशगूल थे, तब मैंने भगवान से यही प्रार्थना की थी कि तुम इस तरह टीन की कुर्सी पर बैठकर मेरी हीरा-मोती जड़ी बातें सुनोगे। मेरी जवानी कभी की खत्म हो चुकी है। तुम भी अब बुढ़ा गये हो और हमारे बीच हैx ये रत्न जटित बातें। अब मुझे और कोई दुख नहीं है। केवल तब दुख होता है, जब तुम कहते हो कि किसी ने लाठी मारकर तुम्हें ब्रज भेजा है।'

ठकुराइन की होठों पर हँसी की रेखा फूटी। धीरे-धीरे उनकी हँसी क्रन्दन में बदल गयी। वह अँधेरी कोठरी की दीवारों पर सिर पटक-पटक कर रोने लगीं। इसके बाद मृणालिनी इकट्ठे किये हुए टीन के डिब्बे आदि ठाकुर साहब के ऊपर फेंकने लगी।

कोठरियों में घुसी हुई राधेश्यामी स्त्रियाँ बाहर निकल आयीं, 'यह तो बूढ़े को मार ही डालेगी। इसे पकड़ो कोई।'

किन्तु कोई भी पास जाने की हिम्मत न कर सकी। इस अद्भुत दृश्य के सामने राधेश्यामी बुढिय़ाँ एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी रहीं।

ठकुराइन ने कपड़े खोल दिये और अपने सूखे स्तन स्वयं ही चबाने लगी, खून की कुछ बूँदें छलक उठीं, किन्तु कोई भी राधेश्यामी स्त्री उसके पास जाने का साहस न कर सकी।


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