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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


ब्रज में त्योहार का रंग छा गया।

स्वामियों का त्योहार- इनमें से कई जैसे स्वामी रघुनाथ मन्दिर के जोगी वाहन स्वामी, परकाल स्वामी, बारामुनि स्वामी और काँचीपुर स्वामी। इन सब स्वामियों का त्योहार। गोदम्मा की मूर्ति की शोभा यात्रा के साथ सम्मिलित की गयी। कुछ दिन के बाद ही अश्विन मास में, तेरहवीं नक्षत्र के दिन नवरात्रि का त्योहार प्रारम्भ हुआ। स्वर्णिम स्तम्भों के आँगन में फिर से गोदम्मा की शोभायात्रा का निर्माण हुआ।

शशि और आलमगढ़ी नवरात्रि त्योहार की समाप्ति तक साथ रहे। फिर उसने वनखंडी की एक छोटी-सी झुग्गी में जाने का निर्णय लिया, जहाँ कुछ राधेश्यामी निवास करते हैं।

आलमगढ़ी ने भी बिहारीमोहन कुंज छोड़ दिया। उसने अपना निवास यमुना के किनारे स्थित एक टूटे-फूटे भवन में बदल दिया, जहाँ एक भविष्यवक्ता रहा करता था, जो ताँबे की कौडिय़ाँ फेंककर किसी का भी भविष्य बताया करता था। दोनों आदमी साथ-साथ रहने लगे। नौकरी के तौर पर उसने निर्णय किया कि नियमित नौकरी मिलने तक वह आनेवाले लोगों की सेवा में रहेगा। कुछ समय के लिए वह एक वक्त के भोजन पर ही गुजारा करने लगा।

शशि के लिए वनखंडी में रहना मुश्किल हो गया। क्योंकि कुछ मनचलों के झुंड उसकी झुग्गी के सामने नियमित रूप से जमने लगे और वे भद्दी फब्तियाँ कसने में मशगूल होते थे।

जब गोदम्मा की शोभायात्रा गरुड़ स्तम्भ के चारों ओर ले जायी गयी, शशि झुंड में श्रीमती सेठ का चेहरा उत्सुकता से देखने लगी। कौन जानता है, शायद वे अपने गोपाल की मूर्ति की सेवा हेतु उसे लगा लें। शायद यह उसका दुर्लभ भाग्य हो। प्रतिदिन नरसिंह स्वामी एवं शठकोप स्वामी के त्योहार के समय शशि स्वामी रघुनाथ मन्दिर के सिंहद्वार के पास खड़ी हुआ करती थी। पर हाय, वह महिला देखी न जा सकी। न तो उसकी सवारी या पालकी का कोई निशान मिला और न उसकी परिचारिकाओं के झुंड का अतापता ही लग पाया। वह हताश और निराश हो गयी।

नवरात्रि के उत्सव के समय भी वह पस्त रही। एक रात उत्सव से वह अपनी झुग्गी में जल्दी लौट आयी और बिस्तर पर लेट गयी। उस समय वह पूर्णत: चिन्ता ग्रस्त थी। उस समय केसीघाट के रामलीला के प्रदर्शन से नि:सृत रावण की ऊँची आवाज के उद्गार ब्रज के वातावरण को बोझिल कर रहे थे। कविता पाठ के स्वर उसके कानों तक पहुँच रहे थे।

उस समय पास के सायबानों में रहने वाले अधिकांश राधेश्यामी प्रदर्शन का आनन्द उठाने बाहर गये हुए थे। जो थोड़े बचे थे, वे गहरी नींद में सोये हुए थे। शशि उनके खर्राटों को सुन पा रही थी।

अचानक शशि ने ठहाके की भयंकर आवाज सुनी, जिसने उसे उसके बिस्तर के किनारे उठ बैठने पर मजबूर कर दिया। फिर दरवाजे पर खटखटाने की आवाज से वह सहम-सी गयी। फिर एक आवाज आयी।

'दरवाजा खोलो, मैं कहता हूँ, दरवाजा खोलो।'

'पर तुम कौन हो?'

'पहले दरवाजा खोलो, फिर तुम जान जाओगी कि मैं कौन हूँ।'

'अपना नाम बताओ, अन्यथा इतनी रात गये मैं किसी अजनबी के लिए दरवाजा नहीं खोलती,' शशि ने कहा।

'शेखी का कोई फायदा नहीं, यदि मैं चाहूँ तो लात मारकर दरवाजा खोल सकता हूँ। आलमगढ़ी का दोस्त समझो। मैं जानता हूँ तुम कितनी दुर्दशा में हो। मैं थोड़ी-सी मदद करने आया हूँ। मैं इस रास्ते से रामलीला देखने आया, किन्तु सोचा यहीं उतर जाऊँ।'

फिर उसकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बिना उस आदमी ने दरवाजे पर लात जमाना शुरू कर दिया। शशि पसोपेश में थी। किसी भी समय खर्राटे भरने वाले राधेश्यामी जाग जाएँगे। फिर वे उसे झुग्गी को छोडऩे के लिए मजबूर कर देंगे। वाकई यह तो कोई फायदे की चीज नहीं होगी।

अत: खतरा लेते हुए उसने दरवाजा खोल दिया और देखा कन्धे पर साफ-सुथरा गमछा डाले हुए उस अजनबी को। उस आदमी ने कहा, 'सच मानो, आलमगढ़ी ने तुम्हारे पास मेरा आना स्वीकार कर लिया है। यह पूर्णत: तुम पर है कि तुमने अपने को उससे अलग कर लिया या नहीं, किन्तु मैं यहाँ एक प्रस्ताव के साथ आया हूँ। मेरा भी एक मन्दिर है और मुझे मदद के लिए एक औरत चाहिए। तुम मुझे भी मदद दे सकती हो जिस तरह आलमगढ़ी को तुमने दी। यदि जरूरत पड़ी, तो तुम मेरे साथ सो सकती हो। सच मानो, आसपास के सब लोग तुम्हारी भयावह स्थिति जानते हैं। वे तुम्हारी कठिनाइयों का फायदा उठा सकते हैं और मैं स्वयं ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ कि तुम्हारा रूखा जवाब बर्दाश्त कर सकूँ। मैं अपनी पूरी शक्ति लगा दूँगा।'

जैसे ही उस आदमी ने बोलना शुरू किया, उसके मुँह से बदबू निकलने लगी। शशि ने जान लिया कि उस आदमी ने काफी मात्रा में देशी शराब का नशीले पदार्थों के साथ सेवन कर रखा है। उस अजनबी ने शशि की ओर उँगली उठाकर कहा, 'मेरे प्रस्ताव को ठुकराओगी तो पछताओगी। तुम निराश्रित मर जाओगी। तुम्हें भिखारी या उससे भी बुरी स्थिति के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। इससे पहले कि वो लालची भेड़िए तुम पर काबू पा लें-मैं शान्त पुरुष हूँ। मैं लोभी नहीं हूँ। क्या तुम नहीं जानती कि एक लोभी भेड़िया अपने शिकार की हड्डी-चमड़ी कैसे गटक लेता है!'

उस गुंडे ने अपने माथे की पसीने की बूँदों को पोंछा, फिर कहने लगा, 'अब तो सुबह होने ही वाली है, शायद रघुनाथ मन्दिर का सुप्रभात खत्म ही हो गया हो। हो सकता है वहाँ वे विश्वरूप दर्शन (भगवान का अपने मुखगह्वïर में सम्पूर्ण विश्व का अर्जुन के लिए प्रदर्शन) कर रहे हों। यह बड़ी शर्म की बात होगी कि सबेरे-सबेरे बूढ़े राधेश्यामियों की झुग्गी-झोपडिय़ों के पास मटरगस्ती करें। अत: अब मैं जाऊँगा। किन्तु मुझे जो कहना था कह दिया। अब इसके बारे में तुम सोच लो।'

वह आदमी बहुत पी गया था। शशि ने जैसे ही उस आदमी ने जगह छोड़ी यह देख लिया था। उसके असन्तुलित कदम उसकी दशा को जाहिर कर रहे थे।

इसी समय सिंहद्वार के स्वामी वृन्दावननाथ का जुलूस बाहर आ निकला। मूर्ति के सामने प्रार्थना के स्वर, साथ में शंखनाद, घंटी के स्वर वंशीगोपाल एवं राधादामोदर के मन्दिरों से तिरते आ रहे थे। शशि ने उस युवा स्वामी को रथ के ठीक पीछे नंगे पाँव अभिभूत जुलूस में चलते देखा। उसे स्मरण आया, पिछले साल रथयात्रा के समय वह इस युवा स्वामी के पास खड़ी थी, जब वह रस्सी खींच रहा था।

उसने कई बार कई मौकों पर इस युवा स्वामी को देखा। गजेन्द्र मोक्ष उत्सव में गजग्राही लीला के समय, झूलन उत्सव में, राधा एवं भगवान की लीला के समय, गरुड़ उत्सव के समय, गजेन्द्र मोक्ष कुंड में नाव-दौड़ के समय, स्वर्णस्तम्भ की प्रदक्षिणा के लिए गोदम्मा को ले जाते समय, इसके अतिरिक्त अन्य अनेक मौकों पर अन्य अनेक स्थानों पर भी। प्रत्येक मौके पर उसने उसको देखा, एक अजनबी आनन्द के सिहरन ने उस बीस ग्रीष्मों के नरम युवा आकार को सिहराया है। उसने जितना अपनी आत्मा को दबाया उतना ही अधिक उसे देखने की प्रबल, बगावती लालसा जाग उठी।

अब जुलूस चीरहरण की सीढ़ियों की यात्रा करके यमुना पहुँचा। पास ही की टूटी सीढ़ी पर शशि ने अड्डा जमाया और पूजा के लिए पवित्र जल लेते हुए उस युवक स्वामी को उद्देश्यपूर्ण ढंग से घूरा। मन्त्रोच्चारण एवं शहनाई के सुरों ने किनारों को भर दिया। पानी के किनारे से स्वामी लौट आया और विशाल झाँप के चंदोवे के नीचे बैठ गया।

कुछ समय के बाद वह अपनी बसेरे में लौटी। उसने अपने दरवाजे पर दो राधाश्यामियों को खड़े देखा। जैसे ही उनके पास वह पहुँची, वे कहने लगीं, 'दो आदमी तुमसे मिलने आये थे। उनके कंठ में तुलसी की मालाएँ नहीं थीं। उनका कोई गूढ़ प्रयोजन होगा।'

उन्होंने उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी। उन्होंने उससे कहा, 'ऐसा लगता है तुमने आलमगढ़ी के पास लौटने का निर्णय ले लिया है।'

'नहीं, मैं नहीं जाऊँगी,' उसने अशिष्टता से कहा।

दोनों राधेश्यामियों ने बड़ी निराशा अनुभव की। क्योंकि शशि का वहाँ रहने का अर्थ होगा, उन्हें भी उसके युवा शरीर के लोलुप ब्रज के लोभी भेड़ियों का सामना करना है। दोनों गाते हुए और चिल्लाते हुए निकल गयीं।

उनके जाने के बाद झुग्गियाँ वीरान हो गयीं। पीछे छूटी शशि ने अपनी माँद में विक्षुब्ध आत्मा-सी प्रवेश किया।


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