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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


ब्रज में शरद काल था, चमेली के फूलने का समय। सुबह-सुबह ब्रज एक रहस्य के परदे में छुपा हुआ था। अपनी माँद से निकलकर गायन के समय दूसरों के हाथों को पकड़े रहना-यह प्रचलन राधेश्यामियों के बीच कम ही देखने को मिलता था। अन्यथा वे सड़क पर डगमगा जाते थे। अब कुछ समय से सौदामिनी ने अपने पिता के अस्पताल में काम करना बन्द कर दिया था। उसने यमुना में स्नान करना ही करीबन बन्द कर दिया था। भगवान रघुनाथ के उत्सव में भी उसे मुश्किल से ही देखा जा सकता था।

बहुत कम समय में ही डॉक्टर के रूप में रायचौधुरी का नाम प्रसिद्ध हो चुका था। लोग जहाँ कहीं उन्हें देखते, आदर से सिर नवाते थे। उनसे इलाज के लिए आने वाले रोगियों की संख्या बढ़ने लगी। गली-गली से वे आने लगे, अमीर-गरीब समान रूप से। इतनी भीड़ रोगियों की बढ़ गयी कि मन्दिर के सूने कमरों का उपयोग करना पड़ा। किन्तु वे ब्राह्मणों एवं अछूतों के लिए पीने के पानी का केवल एक घड़ा चलाने में पूर्णत: असमर्थ रहे। अत: उन्हें आवश्यकतानुसार पीने के पानी के दो घड़े अस्पताल के अहाते में रखवाने पड़े।

सौदामिनी के व्यवहार में परिवर्तन लाने की पिता की तीव्र चाह पूर्णत: झुठला गयी। उसका अस्पताल के प्रति प्रारम्भिक उत्साह अब नहीं रहा। फिर भी वे जानते थे कि अपमानित एवं घायल एवं गरीब और दोनों के लिए उसके मन में तीव्र सहानुभूति का अन्त:प्रवाह बहता रहता है। डॉक्टर रायचौधुरी ने अपने पूरे व्यावसायिक जीवन में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं देखा था, जैसा उनकी पुत्री ने एक महिला कुष्ठ रोगी की सेवा में असाधारण प्यार एवं सावधानी दर्शायी, जिसे उन्होंने एक अँधेरी सँकरी गली से निकाला था।

नहीं, अब कुछ भी नहीं बचा। सारी आशा, लगता है, अब समाप्त हो गयी। इन सात रातों ने इस अजनबी जगह की धरती पर उसे एक बूढ़ी औरत बनाकर उतार दिया। अब तो वह स्वयं अपने लिए अजनबी बन गयी। अक्सर वह अपने दिमाग में किसी दीप्ति को प्रकाशित होते देख पाती। ऐसा लगता है क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ा हुआ वंशीवट ज्ञानगुदरी और बिल्वमंगल के परे गोवर्धन की ओर इसका रास्ता है। यह दीप्ति एक नाम है, जो कम द्वेष एवं प्रार्थना का ध्रुवीकरण करता है। यमुना के चमकते वक्षस्थल पर भीड़ के समय इस दीप्ति को तिरते हुए खोजा है। कोई और उसके समान इस अमूल्य दीप्ति से रूबरू शायद ही हो पाये।

एक रहस्यपूर्ण प्रकाश 'लखपति राज' की समाधि पर व्याप्त है। मथुरा के वे स्थान, जहाँ कभी बौद्ध स्मारक एवं उज्जैन के चित्रकारों की चित्र प्रदर्शनी के स्थान हुआ करते थे, आज वे कँटीले आलूबुखारे के पौधों की दुर्गम वृद्धि के कारण पटे पड़े हैं। वहाँ भावुक कानों में दु:ख से भरपूर अर्जी की आवाज प्रतिध्वनित होती रहती है। सौदामिनी को यह भान हो गया है कि देर-सबेर उसकी आत्मा भी इसी सर्वव्यापक एकान्त का अभिभाज्य अंग बन गयी है।

यह बात नहीं है कि यह एकान्त उसके लिए पहले अनभिज्ञ था। किन्तु जब वह सुब्रत से मिली, उससे उसका विवाह हुआ, तो यह भावना जाती रही। सचमुच में एक पहेली है। उसे कैसे समझाएँ, क्या तुम उसे प्यार कहोगे? वह प्यार जो अस्तित्व के उस कारागार से मुक्ति दिला दे, जहाँ आत्मा स्वयं अजनबी हो अपने लिए। इसे तुम मुक्ति कहोगे? या कुछ और शक्ति?

नहीं, उस स्वतन्त्रता का कुछ नहीं छूटा। उस दैवी आभा के क्षण का कोई संकेत नहीं छूटा। हर एक चीज मौन एवं धीमे समय के साथ लुप्त हो चुकी थी।

और वह ईसाई युवक, उसके बारे में क्या? अक्सर वह यह अनुभव करती थी कि उसका दिमाग एक अँधेरी गुफा से गुजर रहा है। और कभी-कभी वह अपने आप से कहती कि उस उज्ज्वल प्रकाश से वह अँधेरा ही भला।

और किसी और ने ऐसे आध्यात्मिक धर्मसंकट से कब सामना किया होगा? ऐसी किसी महिला ने पहले ब्रज का दर्शन किया था?

एक दिन सौदामिनी अपनी नींद से सूखे पत्तों की सरसराहट की आवाज से चौंककर उठ बैठी। या खुरदरे पोस्टर के टुकड़े से, कौन-से पोस्टर? उन कलंक के कागजों का बाँकेबिहारी के मन्दिर की दीवारों पर उसने सिर उठाया और टूटे शहतीर की अँधेरी सँकरी दरार से सरकते एक नाग के दृश्य से वह भयभीत हो गयी। उसकी दुबली-पतली पीली आकृति चमक रही था। प्रकाश के एक टुकड़े के समान, किन्तु उस साँप ने मनुष्य की उपस्थिति की गन्ध सूँघ ली थी। शायद उसने लगातार अपने आपको छत की दरार में छुपाया और उसकी नजर से ओझल हो गया।

क्या दिवस की पहली वस्तु के रूप में उसे देखना सम्भावित दुर्भाग्य की पूर्व सूचना हो सकती है? उसे क्या करना चाहिए? उसने धीर-समीर, या निकुंज वन या लाला जी के मन्दिर घूमने जाने का सोचा। किन्तु उसकी माँ उसे सबेरे-सबेरे अकेली बाहर न जाने की चेतावनी देती रही है। क्योंकि ब्रज पहले जैसा था, अब न रहा। युवतियों के लिए ब्रज में सुरक्षा की कोई गारंटी न रही। वास्तव में परिस्थितियाँ इतनी गम्भीर हो गयी थीं कि सौदामिनी की माँ ने तो राई का पहाड़ ही बना दिया था। अभी पिछले दिन ही एक राधेश्यामी महिला ने उसे बताया कि एक ईसाई युवक चीरहरण घाट की सीढ़ियों पर बैठा देखा गया।

तब से वह इतनी आतंकित हो गयी कि उसने यमुना में स्नान का आनन्द छोड़ दिया। इतना ही नहीं, पूजा के रूप में बेलपत्रों को चढ़ाने के लिए गोपेश्वर जाना भी त्याग दिया।

सौदामिनी ने दरवाजा खोला और बाहर निकल आयी। वह अपने विचारों की तन्द्रा में अभी भी खोयी हुई थी। आजकल ब्रज में प्रत्येक व्यक्ति संकटपूर्ण बना हुआ है। अब यह पुरातन स्वर्ग-सा सुरक्षित न रहा। वह ब्रज के पुराने समय की रेत में खो गया। आज प्राचीन स्थान की गली-गली में मानव लोथड़े के लालची भेड़िए थे। कोई महिला सुरक्षा के बिना घर से बाहर जाना सुरक्षित नहीं समझती थी। कितना अपमानजनक!

अपने दुपट्टे से उसने सिर एवं मुँह को ढक लिया। अकेले इस समय बैठे रहना वास्तव में एक कठिन कार्य था। प्रत्येक गुजरते दिन के साथ ही उसके अकेलेपन की भावना, जो उसकी आत्मा को घेरे हुए थी, तीक्ष्ण रूप से बढ़ती जा रही थी।

उसने ब्रह्मकुंड के पास से छोटा रास्ता लेने का निर्णय लिया। पूर्व में क्षितिज प्रकाशित हो चुका था और वह धीरे धीरे बढ़ रही थी। कुछ दूरी पार करने के बाद ब्रह्मा के मन्दिर के पास अचानक वह स्तम्भित एवं हकबकी खड़ी हो गयी। अपने घूँघट को चेहरा छुपाने के लिए और थोड़ा खींच लिया, क्योंकि मन्दिर के पास के लैम्पपोस्ट के नीचे खड़े उस व्यक्ति के दृश्य ने उसे आन्दोलित कर दिया था।

और उसी के सामने एक और सड़क पर लेटा हुआ, जो जीवित की अपेक्षा मृत दिखाई दे रहा था। वह पूर्ण नग्न सुबह के धुँधलके में वास्तविक भूत-सा दिखाई दे रहा था।

किन्तु सौदामिनी वापस नहीं जाएगी। वह मन्दिर की टूटी दीवार के साथ-साथ सरकती गयी और नजदीकी जगह से उस आदमी को देखा और जैसे ही उसने उस आदमी को पहचाना, उसके मुँह से चीख निकल गयी। उसने उसके हृदय को दो भागों में चीर दिया। लैम्प के खम्भे के नीचे का वह और कोई नहीं, उसके पिता श्री रायचौधुरी स्वयं थे।

सौदामिनी ने अपने पिता को उस आदमी का नखशिख परीक्षण करते देखा। दूसरे ही क्षण उन्होंने कुछ असामान्य-सी हरकत की। ब्लैंकट, जो वे ओढ़े हुए थे, उससे उस आदमी को ढक दिया और उसे अपने हाथों में उठाकर तेज-तेज इस तरह चलने लगे मानो वे साठ वसन्तों को पार करने वाले वृद्ध नहीं बल्कि कोई युवक हों।

सचमुच यह सब अजीब, बड़ी अजीब बात थी। सौदामिनी, जो अपने पिता की करुणा से पूर्णत: घिरी थी, क्या वह उन्हें इस युग की महान आत्मा कहकर बुलाये। शायद वह ब्रज के गोस्वामी और शम्भूराम अवस्थी के आखिरी प्रतिनिधि थे!

सौदामिनी मन्दिर की टूटी दीवारों के पीछे के अपनी छुपने वाली जगह से खुले में आ गयी। उस समय हवा खूब तेज बह रही थी।

सौदामिनी ने धीरे-धीरे चलना जारी रखा। मन्दिर के सिंहद्वार पर भूखे-प्यासे भिखारियों ने खड़ा होना शुरू कर दिया था। उनकी लाइन जूते रखे जाने वाले शेड तक बढ़ चुकी थी। आज शुक्रवार होने से मन्दिर वेंकटेश्वर तिरुभंजन उत्सव मनाता है। सौदामिनी ने उसके खत्म होने तक मन्दिर के किसी कोने में बैठ जाने का सोचा। अपने शून्य घर में लौटने से यह अधिक अच्छा होगा। यदि कर सकती, तो वह उस उजाले के विस्तार के चहल-पहल वाले दिन में चारों ओर निरुद्देश्य घूम सकती थी। उसने अपने को मुक्त पाया-हर प्रतिबन्ध से मुक्त, अपने अस्तित्व की वह स्वामिनी थी।

अपने से थोड़ी दूरी पर सौदामिनी ने किशोरों का एक झुंड देखा, जो ब्रह्मचर्य पालन की पहल कर रहे थे। उनके कन्धों से भिक्षुक की झोली लटक रही थी। सूर्य के सामने नतमस्तक उसी की प्रशंसा के मन्त्रोच्चारण कर रहे थे। सौदामिनी ने उन्हें आसानी से पहचान लिया। वे सब उत्तर काशी के स्वामी ब्रह्मानन्द की नयी संस्कृत पाठशाला के छात्र थे। अभी कल की ही बात है, जब मथुरा के धार्मिक सम्मेलन में इन सबको, जिन्होंने संस्कृत को मातृभाषा कहने का साहस किया, प्रत्यक्ष रूप से लोगों के सामने लथाड़ा था। उन्हें विश्वास है कि ब्रज में अभी भी संस्कृत एक जीवित भाषा है।

ब्रह्मानन्द स्वामी के छात्रों के कन्धों से भिक्षा झोली लटक रही है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, क्योंकि यह प्रचलन था। ब्रज के धर्मतन्त्र कालेज के विद्यार्थी भी अपनी आजीविका भिक्षा माँगने के द्वारा ही कमाते थे। कुछ सिक्के कमाने के लिए रामचरितमानस एवं केशवदास की रामचन्द्रिका के दो पदों वाले दोहों का पाठ करते थे। उनमें से कुछ वासुदेव के ब्रह्म सन्देश, रामतत्त्व, भास्करमाधुर्य और केलीकन्दविनी के भी पदों का पाठ करते थे। नवागत यात्रियों के लिए यह अनुभव सर्वथा नवीन था। वे वाचकों की थैलियाँ फूलों और सिक्कों से भर देते थे।

सौदामिनी ने यह महसूस किया कि उसके कपड़ों में यहाँ-वहाँ टाँके लगे हुए हैं। अब और अधिक समय तक वह उन्हें नहीं पहन पाएगी। रायचौधुरी जी, कई रोजों से अनुपमा-उसकी माँ उसे यह बता रही है कि शाहजी की लड़कियों की शाला में कोई जगह खाली है। कोशिश करो। ज्ञानगुदरी के लक्ष्मीबाई गर्ल्स कालेज में तुम्हारे लिए कुछ पाने की उम्मीद है। तुम कोशिश क्यों नहीं करती? क्या तुम समझती हो कि अपने पास न समाप्त होने वाला खजाने का भंडार है। तुम्हारे पिता तुम्हें इस अस्पताल की फालतू चीजों के सिवाय कुछ जायदाद देकर नहीं जा सकेंगे।

हाँ, उसने महसूस कर लिया है कि उसकी माँ सही है। किसी ने भी धन का भंडार उसे नहीं दिया है। विश्वविद्यालय की डिग्री का खर्रा किसी ट्रंक में कहीं मुड़ा-तुड़ा पड़ा होगा। अब उस डिग्री का उपयोग ही क्या है। उसने आखिर पढ़ाई की ही क्यों? क्या ज्ञान की इच्छा में या सुरक्षित भविष्य के साधन के रूप में? अपने आपसे अनेक बार यह प्रश्न पूछा।

किन्तु विश्वसनीय उत्तर उससे सदा कतराता है। कई अन्य भी इस प्रश्न का उत्तर पाने में असफल रहे हैं।

और फिर तेजी से गुजरते समय के भय ने उसे उद्वेलित कर दिया। पिछले कई दिनों से वह अनुभव कर रही है कि कोई उसके कान में फुसफुसा रहा है। पंख वाले तीर के समान समय तीव्र गति से भाग रहा है। उसे आगे बढऩे देना यानी एक कँटीले चक्करदार रास्ते में प्रवेश करना, जिसके बाद कोई निर्गम नहीं है।

क्या उसे तिरुभंजन उत्सव के निपटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए? ऐसा उत्सव जिसमें ढाई मन दूध भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति पर उँड़ेला जाता है। ऐसे समय उस मोहल्ले के बच्चे और आस-पास कुली-कबाड़ी उन कुंडों के अन्त में, जहाँ से जल्दी ही दूध बहना शुरू करेगा, पंक्तिबद्ध खड़े हो गये। भिखारी भी आपस में एक बढिय़ा- सा स्थान पाने की के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे।

उसे छोड़ देना चाहिए, सौदामिनी ने निर्णय ले लिया। वह यमुना के किनारों की ओर बढऩे लगी। रेत में परमार पक्षियों का अपना झुंड बनाना देखा जा सकता था। फिर उसके मन में अचानक चन्द्रभानु राकेश एवं उसके वर्कशाप का खयाल आ गया। उसने तुरन्त गाली-गलौज करने वाली राधेश्यामियों की अपेक्षा उसके साथ समय बिताना अच्छा समझा। राकेश के स्थान पर उसकी मुलाकात कुछ विदेशी यात्रियों से हो गयी, जो वहाँ पहले से ही थे। वे जमीन पर पालथी मारकर बैठे हुए थे। उनमें से एक दस्तकार, जो चन्द्रभानु से अष्टधातु के डिजाइन की कला में शिक्षण ले रहा था, एक कोने में गम्भीरता से कार्य कर रहा था। भेंटकर्ताओं के चेहरों पर बहुत अधिक उत्सुकता देखी जा सकती थी। वे अनेक प्रश्न पूछने लगे।

भक्तिमार्ग में ब्रज का स्थान क्या है? भक्तिमार्ग का साहित्य, राम, ब्रज और औरंगजेब से सम्बन्धित सवाल। ब्रज में तुलसी और मीरा और आश्चर्यजनक साहित्य। वेणीमाधव का गोसाईं चरित। इन सब पर उनके पास पूछने के लिए प्रश्न थे।

किन्तु बीसवीं सदी के गोसाईं चरित का मूल्यांकन है कि वह एक रहस्यात्मक भ्रम का बेतुका मिश्रण और धर्मपरायण मिट्टी का छलछलाना मात्र है। आज के चिन्तक उसे इस रूप में सोचते हैं। आपका मत क्या है?

मीरा बाई ने तुलसी से एक बार पूछा, क्या मैं अपराधी नहीं, मैंने अपने विवाहित पति को अलग (त्याग) दिया।

इस प्रकार के उदाहरण हैं। और कई। मुक्ति के लिए प्रहलाद ने अपने पिता को त्यागा, विभीषण ने अपने भाई को, भरत ने अपनी माता को, बली ने अनुदेशक को, ब्रज की नारियों ने अपने पति को। उनके क्रियाकलापों ने उन्हें महान सुधारक सिद्ध किया है।

ऐसा तुलसी ने जवाब दिया। यह उत्तर अब जगजाहिर है, किन्तु आधुनिक विचारक मीरा के तुलसी के साथ बने पवित्र सम्बन्धों पर कलंक लगाते हैं।

किन्तु ये विचारक चाहे जितना सुनिश्चित हों, सौ वर्षीया बूढ़ी महिला रामायणी, जो यमुना के दक्षिण में स्थित तुलसी मठ में निवास करने वाली पवित्र आत्मा है, इसका विश्वास नहीं करती। चित्रकूट एवं काशी के अग्नि घाट की प्रौढ़ पीढ़ी- वह भी आज के शिक्षाविदों के मत को नहीं स्वीकार करती, इस पर एक मुलाकाती ने पूछा, 'फिर किसका विश्वास किया जाए?' शायद वह ब्रज का एक गहरा अनुसन्धान करने पर उतारू है।

अन्य प्रश्न भी उठे-अन्य काव्य जैसे-कृष्ण गीतावली, बरवै रामायण एवं जानकी मंगल ने कैसे प्रभावित किया ब्रज को? और कैसे गायत्री की कविता?

उन्हें आसानी से विश्वास नहीं दिलाया जा सकता था। वे स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं कर रहे थे। वे विविधता को देख रहे थे। और प्रश्न पूछे गये-ईस्ट इंडिया कम्पनी के दिनों में ब्रज पर कैसा गुजारा था? और इसके पहले अकबर के दिनों में? और राजाओं, करौली, अयोध्या, धुर, टिहरी और इसी के समान अन्य के जमींदारों का क्या योगदान रहा है। और कासिम बाजार, अहल्याबाई सीकरी, बोनोबाबरी, शाह जी और आश्रम, जो दाग्बी दासी कहलाती थी, के बारे में इतिहास क्या कहता है?

वे और प्रश्न पूछते हैं। उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करना करीब-करीब मुश्किल था। उन्हें ब्रज के भूत, वर्तमान, उसके इतिहास, उसकी संस्कृति के बारे में विस्तृत रूप से बताना ही पड़ेगा।

'और,' उन्होंने फिर से पूछा, 'उन धार्मिक प्रवृत्ति वाली वेश्याओं, दो सौ साल पहले जिन्होंने मन्दिर और मठ ब्रज में बनवाये थे, के बारे में कौन-से विवरण हैं?' वे उन्हें भूत की विस्मृति से सुरक्षित रखना चाहते हैं?

अत: खत्म न होने वाले प्रश्न लगातार वे पूछते रहे, पूछते रहे। फिर उन्होंने राकेश से जोरदार विदाई की और पीपा पुल की दिशा में चल पड़े। उनमें से अधिकांश नंगे पाँव थे। लम्बे अव्यवस्थित बाल, उनका रंग पीला था। कुकुरमुत्ते के समान कन्धों पर पुस्तकों एवं कपड़ों की झोली लटकाये हुए थे। वे भूखे दिखाई दे रहे थे।

जैसे ही वे गये, सौदामिनी पास गयी और राकेश के पास खड़ी हो गयी। उसने कहा, 'प्रिय, स्वागत है। मैंने तुम्हें दूर से कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठे देख लिया था। तुम्हारे यहाँ आने के पहले एक सुन्दर-सा मोर अपने पंख फैलाये था।' फिर थोड़ा रुक कर राकेश ने कहा, 'जब अपने कंठ में चमेली का हार पहने भिन्न-भिन्न मन्दिर और देवालय देखने जाती हो, तो बहुत अधिक पवित्र युवती-सी, जैसी कि तुम वास्तव में हो, दिखाई देती हो।' सौदामिनी शरमाती हुई बोली, 'धन्यवाद, किसी कलाकार के द्वारा इस तरह प्रशंसित होना भी बहुत मुश्किल ही है।'

राकेश ने अपने बालों की लम्बी लटों को व्यवस्थित किया। फिर राकेश ने एक राधेश्यामी सहायक से दो कप चाय परोसने को कहा।

एक बूढ़े राधेश्यामी ने ऊपरी मंजिल से नीचे देखा। इसके पहले की भेंट के समय भी सौदामिनी ने उसी महिला को उस कलाकार की देखभाल करते देखा था।

सौदामिनी ने चाय का स्वागत किया, क्योंकि उसने सबेरे से कुछ भी नहीं लिया था।

राकेश ने अपने आपको एक नये चित्र बनाने के लिए वस्तुओं को व्यवस्थित करने में मग्न कर दिया। जब वह यह कर रहा था, उसने सौदामिनी से पूछा, 'तुम ब्रज में कितने दिन तक रहने की सोच रही हो?'

सौदामिनी के पास कोई उत्तर नहीं था। वह क्या कह सकती थी! उसके सामने कोई लक्ष्य नहीं था। वह केवल डोल रही थी। कोई उत्तर मुश्किल से ही सम्भव था।

उस कलाकार ने बड़ी आलोचनात्मक ढंग से उसके चेहरे की प्रतिक्रियाओं को पढ़ने की कोशिश की। फिर कुछ मिनट चुप रहा। ऐसा लगता था कि उसकी सच्चाई छुपाने की चुप्पी के तले दोनों ही एक दूसरे को खोजने और समझने की चेष्टा कर रहे थे।

'तुम एक पढ़ी-लिखी लड़की हो। यदि तुम चाहती हो तो शाहजी के स्कूल में शिक्षिका पद के लिए खोज कर सकती हो। निश्चित रूप से यह ब्रज में तुम्हारे स्थायी रूप से निवास पर निर्भर करता है।'

इस बार भी सौदामिनी ने कुछ नहीं कहा। राधेश्यामी ने उसके लिए चाय ला दी। वह अष्टधातु प्रशिक्षणार्थी कारीगर भी उसके साथ हो लिया। उसने राधिका की मूर्ति तराशने का अपना काम उस समय छोड़ दिया।

'आखिरकार इन दिनों प्रतिदिन तुमने दो जून का खाना पा लिया है।' सौदामिनी ने चन्द्रभानु से अचानक पूछा।

राकेश मुस्कराया और कहा, 'तुम जानती हो, दु:ख हर युग में कलाकार के लिए पर्याप्त है। दसवीं शताब्दी में कलाकारों ने अत्यधिक दरिद्रता झेली थी। अधिकांश भिखारी तक बन गये। आज भी औसत कलाकार ठीक उसी प्रकार दशा भोग चुका है। तुम इन दिनों मेहमूद वगैरा जैसे आश्रयदाता को नहीं पा सकती। तुम्हें मालूम है वह आश्रयदाता था। राजपूती चित्रकला शाला का, जो चित्रकला की अपभ्रंश शैली का एक नवीन तरीका है आज कोई भी नहीं है जिसकी आत्मा में प्रतिध्वनित हो उस कला का प्रेम, जिसने सम्राट हुमायूँ की बेचारी आत्मा को युद्ध स्थल पर भी उन कार्यों को ले जाने के लिए प्रेरित किया, जिनमें चित्रमय उदाहरण थे। कभी-कभी, बहुत कम ही यात्री उस स्थान पर आते हैं। किन्तु वे हमेशा इतनी कम संख्या में आते हैं, मानो महासमुद्र में एक बूँद। उदाहरण के लिए, अभी उस दिन एक भद्र महिला, जिसने अपना परिचय महाराष्ट्र के राव परिवार से सम्बन्धित के रूप में दिया। जिस वंशानुक्रम में वहाँ के सेनाधिकारी हुआ करते थे। उन्होंने उस स्थान को देखने के लिए वाहन किराये पर लिया। मैं उनके पूर्वजों को जानता हूँ। ब्रज में कदम्बखड़ी नामक उनका बगीचा था। अब तो उसका निशान भी नहीं है। उस महिला ने मोगल शैली के चित्र बहुत बड़ी रकम के एवज में चाहे थे। केवल दो मुगल शैली के चित्र।

यह कहकर उस कलाकार ने ठहाका लगाया। उसके प्रशिक्षणरत सहायक ने चुटकी ली, 'तुम, दिखता है, अत्यन्त भावुकता के मूड में हो आज!'

'ओह हाँ, सचमुच में मैं हूँ, मैं पूरे रूप से प्रशंसात्मक भाव से भरा हूँ।' आज उस महिला ने जो कहा, याद करने से मुझे खुशी होती है। उसने कहा, मुझे और मेरी कला के बारे में वह सब कुछ जानती है। और ऐसे उद्गार भी व्यक्त किये कि मैं मुगल शैली की चित्रकला का अन्तिम जीवित चित्रकार हूँ। किन्तु वे ईश्वरी प्रसाद के बारे में कुछ नहीं जानती थीं। बड़े खेद की बात है। और फिर एक कलाकार कुछ दिन पहले यहाँ आया और ब्रज के मध्य में घोषणा की-यदि आप मुगल शैली की चित्रकारी के अन्तिम प्रतिनिधि को देखना चाहते हो तो काशी की अँधेरी गली में जाओ, जहाँ आप एक क्षीणकाय बूढ़े व्यक्ति के केवल हड्डी एवं चमड़ी के ढाँचों को पाओगे। यह एक बूढ़ा आदमी है, जो अपने रास्ते दोनों ओर की परवाह किये बिना जाता रहता है। उसकी उलझे बालों की फसल एवं दाढ़ी है, वह मुश्किल से ही अपनी आँखों एवं मुँह को साफ रखता है। जुकाम टपकता रहता है। कमर पर केवल एक मैला-सा टुकड़ा, धोती का। कभी-कभी कैनवास के जूते पहनता है। पर नंगे पाँव ही चलता है। अकसर। किन्तु वह अविलम्ब पहचाना जाता है। और तुम भी पहचान सकते हो। उसके सिर पर गांधी टोपी की निशानी पहचान की सबसे अच्छी निशानी है। अपने कन्धों पर साफ शाल का टुकड़ा डाले रहता है।

'अत: मुगली शैली के अन्तिम जीवित चित्रकार को पहचानने में किसी को कठिनाई नहीं होती। उमर खय्याम का चित्र, जिसे उसने बनाया, यूरोप के कलाकारों को भी अभिभूत कर दिया। और आज इस महान कौशल का कलाकार अपने दिन इस प्रकार की ऐसी गहन दरिद्रता में काट रहा है, जो भिखारियों की-सी है।'

'यहाँ एक क्रान्ति की नितान्त आवश्यकता है।' उन विदेशी यात्रियों ने कहा। 'हम परिवर्तन चाहते हैं। तुम विरोध क्यों नहीं करते, विद्रोह क्यों नहीं?' उन्होंने पूछा द्वारकाधीश मन्दिर में जमा हुए उन भूखे लोगों से। भूखे और बीमार, जो विभिन्न मन्दिरों जैसे बाँकेबिहारी, भगवान गोविन्द, भगवान रंगनाथ, और शाहजी और अन्य जगहों के आसपास एकत्र होते रहते हैं। खासकर अष्टधातु के कारीगर और चित्रकार चन्द्रभानु से-उनके ओठों पर केवल एक मात्र प्रश्न था। 'तुम यह सब ऐसे छोड़ क्यों देते हो-यह दुख और यह वंचना - इतना घृणित। तुम विद्रोह में खड़े क्यों नहीं होते?'

'अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भी ऐसी ही परिस्थिति का निर्माण हुआ था। कलाकार, जो कभी बादशाहों के द्वारा दयालुता से संरक्षित थे, दरबारों के दोस्तानों कोनों को छोड़ कर अपनी आजीविका के लिए भीख माँगने पर मजबूर कर दिए गये। और वह भी दू- दराज के ऐसे स्थानों में, जैसे कांगड़ा, चम्बा, नूरपुर, ग्वालियर, और यहाँ ब्रज के गुप्त एकान्त कोनों में।

'विदेशियों ने चेतावनी दी कि विद्रोह अनिवार्य है। क्या आपने एक बात महसूस की? क्या आपने उन लड़कों और लड़कियों की इन दिनों की पीढ़ी को देखा, जो इन जगहों, जैसे-मथुरा, उत्तर काशी, कटक, भुवनेश्वर, और तो और आगरा में पैदा हुए और जिनका पालन-पोषण हुआ। वे सब जड़ दिखाई देते हैं। उनके चेहरे इतने भावहीन हैं जैसे उनमें भावनाओं को क्षय हो गया हो। कहना पड़ता है वे क्रोधित नहीं है। कुछ भी उन्हें नहीं उकसाता। फिर आप कैसे सोच सकते हैं कि विद्रोह होगा। मैं सचमुच इन यात्रियों की, इन विदेशियों की प्रशंसा करता हूँ, क्योंकि ये चारों दिन वे रातें मन्दिरों के खुले आहतों में बिताते रहे; पंक्तिबद्ध बैठे रहे। भिखारियों और फकीरों के साथ प्रसाद के लिए। वे नंगे पाँव चलते रहे। उनके कपड़े फटकर चिथड़ों में रह गये। वे सदा भूखे रहे। पर क्या तुम लोगों ने उनकी आँखों की ओर देखा? ऐसी उत्सुक और जिज्ञासु दृष्टि हमारे छात्रों में मुश्किल से ही तुम पाओगे। यदि आपको विश्वास नहीं हो रहा है, तो मथुरा के द्वारकाधीश के मन्दिर के सामने कुछ समय के लिए अड्डा जमाओ और गलियों से गुजरने वाले लड़कों और लड़कियों की निगरानी करो। तुम्हें अनिवार्यत: निराश होना पड़ेगा। ऐसी सुस्त और खाली दृष्टि और उनका रंग भी कोई अच्छा नहीं है। उनकी त्वचा का रंग भी उतना ही बुझा हुआ है, जितना खजूर के सूखे पत्तों का। और ये लोग क्रान्ति शुरू करेंगे? इनके साथ मुझे कतई धैर्य नहीं है। पिछले साल, अपनी आजीविका की खोज में तंजौर से भुवनेश्वर आ रहे सैकड़ों लड़के-लड़कियों से मैं मिला। मैंने उनकी आँखों में झाँका और खालीपन के अलावा कुछ नहीं देखा। एक नीरस दृष्टि उन सबने मेरी ओर फेंकी। ऐसा लगा, वे सब किसी रचना, कोई विचार या कोई चीज के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। केवल एक अपवाद है। वह कटक में है। वहाँ मैं दो आदमियों से मिला। उनकी आँखों में अपवादात्मक दृष्टि विद्यमान थी। किन्तु दोनों बेकार युवक मात्र थे। हताशा से भरे किसी नौकरी की तलाश में लापरवाही से चक्कर काटते रहते थे और दिन में निरुद्देश्य घूमा करते थे। भूख मानो उनकी अँतड़ियों को फोड़े दे रही थी। फिर ऐसे युवकों में उत्सुकता की दृष्टि किस काम की। यह तो मात्र बेकार का आभूषण मात्र है। जैसे बन्दर के गले में सोने का हार।'

जैसे ही इन विचारों को चन्द्रभानु ने व्यक्त किया, लगने लगा वह मानो भावना से ओत-प्रोत हो गया। अन्त में उसने जोरदार ठहाका लगाया, लगा इस राधा की पीटकर बनायी गयी वह मूर्ति, जिसे उस अष्टधातु कला सीखने वाले ने उकेरा था, पास ही के कोने में हिलकर रह गयी।

पीपे के पुल के खम्भे सुबह के चमकीले सूर्य के प्रकाश में चमक रहे थे। जैसे यमुना की रेत में बड़ा-सा तोप पड़ा हुआ हो। वह अष्टधातु कारीगर अपने मालिक का चेहरा देखने लगा और शर्माते हुए कहने लगा, 'लम्बे समय के बाद जाकर आज आप तरो-ताजा दिखाई दे रहे हो। किन्तु वह महिला शायद आपसे कुछ पूछना चाहती थीं। आपने उन्हें जरा-सा भी मौका नहीं दिया। आप तो अपने ही विचार में खो गये।

चन्द्रभानु ने सौदामिनी से कहा, 'हाँ, सुबह आज मैंने तुम्हें कदम्ब के नीचे बैठे देखा, तो समझ गया कि निश्चित रूप से तुम्हें मुझसे कुछ पूछना है।'

उस कारीगर ने इस बीच अपना सामान एवं औजार एकत्रित कर लिया। एक थैली में उन्हें रख दिया और चला गया। बूढ़ा राधेश्यामी भी आया और उनके चाय के बरतनों को हटाने लगा।

चन्द्रभानु ने आगे कहा, 'वे कहते हैं कि तुम्हारे पिता ने पूरे ब्रज के दिल और दिमाग को जीत लिया है। एक दिन तुम चाहती तो उनका स्थान ले सकती हो। क्या तुमने इस पर कभी विचार किया है? इस संक्रमण के समय ब्रज में आपके पिता के समान व्यक्तियों की बड़ी आवश्यकता है। उदार बनो। छोटी-छोटी सोच को त्याग दो और अपने पिता के अस्पताल को लेने को तैयार हो जाओ।'

सौदामिनी के लिए चन्द्रभानु की यह सलाह सर्वथा अनपेक्षित थी। घायल-सा उसके चेहरे ने अपना पूरा रंग खो दिया। वह अपने को बुरी तरह निराश महसूस करने लगी। उसने कहा, 'यदि ऐसी महानता मैंने अर्जित की होती, तो मैं अपने को भाग्यशाली समझती, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में सारी यातनाएँ और अपमान एवं मानसिक बेचैनी मेरे हृदय की गहराइयों में बेहद यन्त्रणा देती हैं। विश्वास करो मैं अभी भी हाड़-माँस की मात्र औरत ही हूँ। सांसारिक आवेशों और इच्छाओं से धूसरित हो गयी हूँ। इसके बाद भी मैं किसी प्रकार व्यवहार परिवर्तन दूर-दूर तक नहीं देख रही हूँ। मुझमें महान कार्य करने का आत्मविश्वास है ही नहीं। बचपन से ही एक खास किस्म की खिन्नता मेरा पीछा कर रही है। मेरे अस्तित्व का एक भाग बन कर, मानो मेरे अस्तित्व का अभिन्न श्वास हो, मेरी आशाओं और भयों में, मेरे सुखों और दुखों में। केवल एक साल के छोटे से अर्से में मैं इससे राहत ले पायी हूँ। और वह एक साल मेरे मन के अन्तरंग भाग में आज भी झकाझक चमकता है। केवल उस वर्ष के दरम्यान मेरी आत्मा स्वयं उसकी मालिक रही और आज मैं मन्दिर-मन्दिर भटक रही हूँ। केवल अपने उस भाग्यवान जीवन के अमूल्य कुछ दिन वापस पाने के लिए। दिन गुजरते जा रहे हैं और मेरा शरीर और आत्मा शुष्क एवं बदरंग होती जा रही हैं, जैसे मेरे पुराने वस्त्र।'

सौदामिनी बोलती रही, 'एक समय था जब मैं एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहना पसन्द करती थी। मुझे ऐसा लगता है, मानो मैं कई युगों को पार कर चुकी हूँ और वहाँ आ पहुँची हूँ, जो पूर्णत: मेरा जाना-पहचाना नहीं है। हर चीज बदल गयी है अब। यहाँ अब ऐसा कोई भावुकता से भरा तार मेरे हृदय में नहीं है। समय था जब मैं अपने सिर के ऊपर आसमान को देखने का साहस नहीं करती थी। किसी और को ऐसा अनुभव कहाँ हुआ है कि जो उसे इतना डरा दे कि वह आसमान को भी देखने का साहस न जुटा सके। आप एक कलाकार हैं। महाशय, आप भावना को समझने के काबिल हैं। आप मेरी स्थिति की प्रशंसा करेंगे। उत्साह की लहरें और लालसा आज भी मेरे दिमाग को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। वे लेश मात्र भी कम नहीं हुईं। कुछ दिन पहले मैंने एक युवा जोड़े को देखा, स्वास्थ्य एवं शक्ति से भरे हुए। घुमावदार रास्ते के किनारे वाले पेड़ के नीचे लेटे हुए। मेरे लिए उन्होंने युवावस्था की सुगन्ध फैला दी, इच्छा एवं जीवन की भी। यमुना के पानी से भी दुर्लभ सुगन्ध रिसने लगी। कसाई की दुकान के ताजा मांस की गन्ध नहीं-नहीं ऐसा नहीं था, कुछ अपनी साँस से अपने आपको बचा जाने की स्थिति की वह मधुर इन्द्रियगत सुख की खुशबू भरी-सी नदी पास में बह रही है और आनन्दित जोड़ी एक बड़े पेड़ की छाया में पिघलती जा रही है। इस दृश्य ने मुझे पूर्णत: सुलगा दिया। मैंने अपने पर नियन्त्रण पूर्णत: खो दिया। रेत पर पागल की तरह मैं लोटने लगी। मेरे वस्त्र अव्यवस्थित हो गये। मैंने रेत के कणों की अपने मांस में चुभने की अनुभूति की। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी दशा की आप प्रशंसा करोगे। इन उद्धत घंटों में भी मेरे दिमाग में ढेर सारे शब्द तारों-से झिलमिलाते मेरे पास थे-फ्रेम में मढ़ लेने योग्य।'

अपने विचारों को व्यक्त करती सौदामिनी चुकी-सी लग रही थी। उसने कलाकार की आँखों में देखा। होठों के वक्र बता रहे थे कि वह आँसुओं में खो जाएगी।

राकेश ने कहा, 'सोचता हूँ वह ईसाई युवक तुम्हें कुछ सान्त्वना दे सकता है।' इस प्रश्न ने सौदामिनी को और अधिक दुखी बना दिया। पर उसने अपने पर काबू पा लिया और कहा, 'हाँ, सचमुच-अपने अनुभवों में आप सही हैं। वह अकेला ही मुझे आराम और आशा का आश्वासन दे सकता है। इस संसार में कोई और नहीं। मैं, जो मन्दिर-मन्दिर घूम कर राहत खोज रही हूँ। मुझे लगता है, एक बार मैं उसके बाजू में खड़ी हो जाऊँ। नहीं, शायद मैं गलती कर रही हूँ। बात इतनी सरल नहीं है। कम गम्भीरता जो उसने मुझमें ला दी, शायद एक रहस्य है। कभी तो लगता है कि उसने तो मेरे पथ को प्रकाशित एवं संजीदा बनाने की अपेक्षा अधिक अन्धकारमय बना दिया। आप तो कलाकार हो। कृपया बताओ, मेरे जैसी किसी अन्य आत्मा ने इतना भोगा है? क्या कभी किसी औरत ने ब्रज की इस पवित्र मिट्टी पर पैर रखा है?'

कलाकार ने अपना सिर झुका लिया। क्षण गुजरते गये। दोनों ही शान्त थे। फिर कलाकार ने उस युवती को बताया, 'तुम अपने आपकी दोस्त भी हो और दुश्मन भी हो। इस जीवन की यात्रा में साथी भी। मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरे मतलब को समझ रही हो।'

कलाकार ने एक बार फिर अपना सर झुका लिया और शान्त हो गया। इसी बीच सूर्य प्रखर होता गया। पीपा के पुल के खम्भे सूर्यप्रकाश में जंगली भैंसों की चमकती त्वचा से चमकने लगे। सौदामिनी को लगने लगा कि वह कलाकार का काफी समय ले रही थी। अत: वह उठ खड़ी हुई। फिर अन्त में वह उसे बताने लगी, 'यदि ब्रज में आने वाली मेरे जैसी कोई औरत मिली, तो मुझे बताने में जलोगे नहीं। मैं उससे कुछ प्रश्न पूछूँगी। विश्वास कीजिए मुझ पर, मुझे कुछ गम्भीर बातें उस औरत से पूछनी हैं।' इसके बाद वह वहाँ से चल दी-नदी की रेत में अपने पद-चिह्नों को छोड़ते हुए।

बढ़ते दिन के साथ-साथ नदी का किनारा आवाजों से भरने लगा। लहरों के ऊपरी सिरों पर तब फेन (झाग) और चमेली की फूल मालाएँ तैरती देखी जा सकती थीं।

राकेश की झोपड़ी के सामने एक कदम्ब का वृक्ष था, जिसके चारों ओर एक ऊँचा चबूतरा बना हुआ था। एक युवा लड़की बहुत पहले से प्रतिदिन उस स्थान को झाडऩे-पोंछने के लिए लगायी गयी थी। वह यह मुफ्त में ही करती थी। उसका लक्ष्य था यह देखना कि कोई भी मैली-कुचैली संन्यासिनी उस पलस्तर किये बढ़िया स्थान पर या उस देव या देवी की बदसूरत मूर्ति के साथ अतिक्रमण न करे। उस स्थान पर वह हमेशा सजग नजर रखती थी। क्योंकि मुश्किल से ही कोई जगह बची थी, जिसे संन्यासिनियों के झुंड ने दूषित न किया हो। उन्होंने घुड़साल के जलाशयों की दीवारों तक को नहीं छोड़ा था, जिन्हें वे बसने को सुविधाजनक पाती थीं।

आज, जैसा कि राकेश ने पाया, बड़े आश्चर्य के साथ कि उस जगह को रगड़-रगड़ साफ करने की जगह वह उस वृक्ष के नीचे नाच रही थी। राकेश उस घटना का गवाह है, जिसे गुजरे ज्यादा समय नहीं हुआ। यही लड़की, जो उसके सामने नाच रही थी रघुनाथ जी के मन्दिर में प्रवेश कर मूर्ति पर हार चढ़ाना चाहती थी। किन्तु द्वार पर लाठी से लैस सिपाही ने भारी-भरकम हाथों से उसे भगा दिया। कोई अस्पृश्य भला पवित्र आरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने का एवं उसकी पवित्रता को भंग करने का साहस कैसे कर सकता है। निश्चित रूप से वह अच्छी पिटाई के उपयुक्त है। खूब शोरशराबा मचा (उठा) और वहाँ भीड़ जमा हो गयी और बेचारी उस लड़की का धक्का-मुक्की के साथ पीछा किया गया और अभियोग लगाया गया। पीछा करने वालों में से एक ने उसके पेट पर ऐसी जोरदार लात मारी कि वह प्रवेश द्वार से रथ रखने के स्थान तक लुढक़ती चली गयी। युगों पहले नीची जाति के लोग ताम्रपानी नदी के किनारे से आकर ब्रज में बसे थे।

यह वह समय था, जब अर्जुन के सारथी कृष्ण का आविर्भाव वृन्दावन के कृष्ण मुरलीधर के रूप में हो चुका था, जो अपनी प्रेमिका राधा और गोपियों के झुंड के द्वारा घिरे रहते थे और ब्रज में पवित्रता से छेड़छाड़ करते हुए उस स्थान की मिट्टी को पवित्र कर रहे थे। और यह उस समय की बात है, जब इस लड़की की वह नीची जाति इस स्थान पर आ बसी थी। युगों पहले।

वे अलग-थलग बसे थे। अस्पृश्य काँटों भरी झाडिय़ों से घिरे जंगल के फैलाव में वे कई गुना बढ़ते गये। और समय गुजरने के साथ उन्होंने कई वर्गों में अपने को बाँटा।

उस लड़की के नृत्य की गति बढ़ती ही गयी। उसका जूड़ा लटक गया। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गये। उसका पल्ला नीचे सरक गया फिर भी बिना रुके वह नाचती चली जा रही थी। विविध भंगिमाओं में, और अब नितम्बों के बल बैठकर सिर को नीचे झुकाकर वृत्त में घूमते हुए और बीच-बीच में अपनी कमर को झुकाते हुए और उसने पूरी-पूरी एक सौ आठ मुद्राओं का प्रदर्शन किया। शायद उसने अपने पूर्वजों से परम्परागत रूप से उन्हें ग्रहण किया था।

सम्भवत: वे सब ब्रज के कात्यायनी के पुजारी रहे होंगे। फिर अत्यधिक भावातिरेक के कारण उसने राकेश के घरेलू राधेश्यामी से एक गिलास पानी की प्रार्थना की। उसने लड़की के प्रति दया का लेशमात्र प्रदर्शन करने की बजाय कटुता से दुत्कारा या झल्लाया।

'तुम तो वेश्या के समान व्यवहार कर रही हो। पहले पल्लू को सही तरीके से ओढ़ो। समय बीत गया, जब अकबर महान सम्राट था, तब तुम जैसी कामुक औरतों को बेलगाम सिपाहियों के बीच फेंक दिया जाता था।'

कलाकार राकेश औरत का अपमान और अधिक देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। उसने कहा, 'बस बहुत हो गया। अब अपनी जुबान काबू में रखो। लड़की को पीने के लिए थोड़ा पानी दो और शान्ति से उसे यहाँ से जाने दो।'

असहाय लड़की ने, जो स्वयं पछतावे में थी, अपने कपड़ों को व्यवस्थित किया और अपने आपको अपने पल्लू में ढकने की कोशिश की। अब तक उसने अपने आप पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया था। उसे खुद अचरज हो रहा था कि कुछ पल पहले उसे क्या हो गया था। वह कहाँ थी। वह क्या कर रही थी। क्या उस पर मीरा के समान सादगी भरे प्रयास की बेहोशी का दौरा था? ब्रज में प्रत्येक है प्रकृति और पुरुष है केवल कृष्ण।

'तुम्हारे लिए पानी है, पी लो,' चन्द्रभानु राकेश ने उस अचरज से भरी लड़की से कहा।

'मेरा विश्वास करो, मैं अपने होश में नहीं थी कि मैं तुम्हारी उपस्थिति में अर्धनग्न नाच रही थी। मुझ पर धिक्कार है। उसका मुझे ज्ञान भी नहीं था। मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे मेरी विवेकहीनता के लिए माफ कर दो।'

'क्या तुम विवाहित हो?'

'मैं विधवा हूँ।'

'क्या तुम फिर से विवाह करने की नहीं सोचती? ऋग्वेद में ऐसा कहा गया है कि तुम्हारी परिस्थिति में रहने वाली स्त्री एक देवता, जिसका नाम विश्वबसु था, के कब्जे में थी। इस देवता की प्रशंसा में एक ऋचा कहती है।-वे लड़कियाँ, जो अपनी स्त्रीत्व तक नहीं पहुँचीं और वे औरतें जो अपने माता-पिता के साये में रहती हैं, उनकी इच्छा करो हे प्रभु-उन्हें अपनाओ। उनमें तुम अपनी महानता और अपना सौभाग्य पावोगी।'

'मैं कहता हूँ तुम जग लो और पानी पियो?' राकेश ने दोहराया।

'अनुग्रही, क्या आप पानी ढाल कर नहीं दे सकते? छू नहीं सकती। मैंने आपको बता ही दिया था कि मैं अछूत हूँ।'

'मैं जाति और नस्ल की परम्परा में विश्वास नहीं करता। यह बात पूरा ब्रज जानता है कि कलाकार की कोई जाति नहीं होती।'

'तुम मुझे माफ करो पर मैं तुम्हारे जग को छू नहीं सकती।' यह कहकर वह लड़की जमीन से, जहाँ वह बैठी थी उठी और सीधे तालाब की ओर बढ़ी। राकेश ने उसे रोका और कहा, 'अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ो और जल पाओ।' लोग आजतक छूत- छात के रोग से ग्रस्त हैं। इसी से तो रामानन्द, जायसी और कबीर जैसी महान आत्माओं को कभी भी शान्ति नसीब नहीं हुई। उसका हृदय उस लड़की के प्रति सहानुभूति एवं दु:ख से धक-धक करने लगा।

अपने कंठ को भिगोकर उसने अपने मुँह को पल्लू से पोंछा और एक झटके से कहा, 'मैं आपसे बहुत प्रभावित हूँ। आप सचमुच में विशालहृदय हैं। ब्रज में आप जैसे ज्यादा नहीं हैं।'

राकेश ने कहा, 'लगता है, तुमने वही रास्ता अपने लिए चुन लिया है, जो रघुनाथजी के मन्दिर में नृत्य करती पुरानी युवतियों का हुआ करता था। क्या सही-सही तुम तलवार एवं ईश्वर को गले लगाना चाहती हो?'

प्रश्न ने, लगता है उस लड़की को खुश कर दिया। क्योंकि उसके ओठों पर मुस्कुराहट झलकने लगी और उसने कहा, 'मैं मूढ़ि नृत्य में कुशल हूँ, जो मुख्यत: देवीजी को प्रसन्न करता है। मैंने उन सारी मुद्राओं जैसे भागा, फटाका, गोमुख, और असिबोल्लिका और शेष एक सौ आठ मुद्राओं पर अधिकार पाया है। मैंने अपने आप नृत्य किया, क्योंकि मुझे मन्दिर में प्रवेश करने और देवीजी को हार चढ़ाने का अधिकार नहीं है। गोपी के समान कात्यायनी देवी की पूजा में साष्टांग पड़ गयी ताकि ब्रज के प्रभु को पा सकूँ। मैं स्वयं भी अपने पति की अच्छाई के लिए समर्पित हो गयी और जब से मेरे पति को मृत्यु हो गयी तब से ब्रज के प्रभु को अपने मालिक के रूप में पा लिया। देवीजी की दया को धन्यवाद, वे यहाँ ब्रज में रहते हैं और उन्होंने मुझे भी अपना लिया है। क्या तुम मेरे होंठों पर उनके होंठों के चिह्न नहीं देख सकते?'

'अपना लिया, प्रभु ने तुम्हें अपना लिया, तुम्हारा मतलब क्या है।'

'कुछ समय ही पहले तुमने एक भक्त, जो विश्ववसु कहलाता था का उल्लेख किया-एक दिन मैंने एक भक्त को झुग्गी में कहते सुना, जहाँ हरिजन रहते हैं। अठिल्ला पहाड़ियों के शिखर पर, जहाँ उनका स्थान है, इस गरीब व्यक्ति ने, जो अपनी जीविका कमाने के लिए पुराणों की कहानियों का पाठ करता था, उद्गार व्यक्त किये कि प्रेम विचार एवं भावना की चीज है। ऐसी चीज, जो केवल आनन्द से भी अधिक है। उन्होंने जताया कि उनके वेदों और उपनिषदों के पाठ ने उनके विचारों को पक्का कर दिया। मैं गोकुल के प्रभु के द्वार ठीक उसी तरह अपना ली गयी हूँ जैसे अपने पति के द्वारा अपना ली गयी थी। यह वह प्रभु हैं, जिन्होंने मेरे थके हुए अस्तित्व में एक अर्थ भर दिया। यदि ऐसा नहीं होता तो मेरे जीवन और मृत्यु के बीच क्या अन्तर रह जाता, मालिक?'

जैसे उसने अपने विचार व्यक्त किये, सौदामिनी की आँखें नम हो गयीं। ठीक उसी समय उसके होंठों के कोनों पर मुस्कान उभर आयी, फिर अचानक वह कलाकार उससे क्या कहना चाहता है, इसकी परवाह किये बिना उसने अपनी थोड़ी-बहुत वस्तुओं को उठाया और शाहजी मन्दिर से सटी अँधेरी गली की ओर भागी।

दिन गर्म हो चुका था। पानी के चिह्न के ऊपर रेतीले किनारों पर बड़े-बड़े कछुओं को रेंगते देखा जा सकता था। दूसरे किनारे पर विदेशी पर्यटक टहलते देखे जा सकते हैं। कोई उसके कानों में फुसफुसाया, 'अब समय आ गया। मानव का यह जीवन बहुत अमूल्य है। अभी और समय है, आगे बढ़ो और तेज चलो। आगे शाश्वत बनो, पुत्र।'

राकेश भावुक हो उठा। कुछ देर पहले उसने रेत में अनेक पदचिह्नों को देखा था, किन्तु क्षण भर में हवा के एक झोंके ने उन सबको मिटा दिया। उस लड़की के, विदेशी पर्यटकों के, राधेश्यामियों के और भक्तों के झुंड के पदचिह्न रेत के नीचे दब गये। घनी चमकीली रेत की परत के नीचे सफेद हवाई चादर-सी दिखाई देती है। राकेश स्थिर खड़ा रह गया। इतना स्थिर, मानो कोई घायल प्राणी हो। उसकी दृष्टि उन पद चिह्नों की ओर घूम गयी, जो ऊँचे और नीचे लोगों के; ब्राह्मण और अस्पृश्यों के हैं। सब मुलायम, सूखी रेत की फैलाव के नीचे ढँकी रह गयीं। शून्यता के विचार ने भावुक आत्मा को आश्चर्य में डुबो दिया।


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